प्राणायाम ( योगिग क्रिया )

आप सबने सुना व पढा ही होगा कि हमे प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायाम करने से शरीर तंदरुस्त बनता है। रोग दुर होते है। आत्म शोधन होता है। शरीर को नई ऊर्जा मिलती है। शरीर हष्ट-पुष्ट बनता है। शरीर की ब्लाॅकेज दुर होती है। प्राचीन काल मे लोग योग व प्राणायाम करते थे तभी वह तंदुरुस्त रहते थे। प्राचीन काल मे लोग बीमार इसी कराण से नही होते थे। पहले का मानव मेहनती होता था सभी काम अपने हाथो से करते थे। तो बीमारी दुर रहती थी। खान-पान,रहन-सहन सभी शुद्ध व पवित्र होता था तो बीमारी नही आती थी। आजकल एक कोरोना जैसे जीव ने दुनिया को अपने बश मे कर लिया है। सभी जगह इस नन्हे जीव ने अपने आतंक से भयभीत कर दिया है। जो अपने को बहुत बडा दादा समझते थे वे भी इस कोरोना से डर कर खुद को चार-दिवारी मे कैद करके बैठ गए है। प्राचीन मानव ऐसा डरता नही था क्योकि तब आचार-विचार सभी शुद्ध होता था।

नाडी शोधन प्राणायाम ———-

नाडी शोधन प्राणायाम मे शुद्ध हवा वाले स्थान पर खडे हो जाए या बैठ जाए पालथी मार कर। अपने दाहिने हाथ को नाक के पास लाए। अंगुठे से दाहिने नथुने को दबाये और सबसे छोटी अंगुली ( कनिष्ठा ) को बाए नथुने को दबाए। अब बाए नथुने से अंगुली हटाए और अंगुठे को दाहिने नथुने के अच्छे से दबा कर रखे। बाए नथुने से श्वास को भीतर ग्रहण करे। जब श्वास पूर्ण ग्रहण कर लेवे तब बाए नथुने को अंगुली से दबा लेवे और अंगुठे को हटा लेवे और दाहिए नथुने से श्वास को धिरे-धिरे छोडते जाए। यह पहली क्रिया बाए से दाए तरफ अब दुसरी क्रिया करे दाहिने से बाए की तरफ। दाहिने नथुने से अंगुठा हटा लेवे और बाए नथुने पर अंगुली से दबा लेवे। अब दाहिने नथुने से श्वास भीतर ले जावे और अंगुठा फिर से नथुने पर लगा लेवे श्वास भीतर भरते हुए और बाए नथुने से अंगुली हटाते हुए श्वास को धिरे-धिरे बाहर छोडे। इन दोनो क्रियाओ की पुनरावृति करे यानि इन क्रियाओ को 5 से 7 बार दोहराए मात्र एक मिनिट से दो मिनिट का समय लगता है इस नाडी शोधन प्राणायाम को करने मे।

नाडी शोधन प्रणायाम के लाभ ———-

नाडी शोधन प्राणायाम करने से शरीर की नाडियो के विकार दुर होते है। रक्त-संचरन सुचारु होता है। रक्त शुद्दि होती है। नाडियो के ब्लाॅकेज दुर होते है। मान्सिक शांति प्राप्त होती है। मस्तिष्क को बल मिलता है। भुख अच्छी तरह लगती है। याद करने की शक्ति बढती है। नैत्र ज्योति सुधरती है।

भ्रस्त्रिका प्राणायाम ———

भ्रस्त्रिका प्राणायाम को करने के लिए शुद्ध हवा वाले स्थान मे खडे हो कर या आसन मे पालथी मार कर स्थिति ग्रहण कर लेवे। अब फैंफडो को हवा ( वायु ) भीतर लेते हुए फैंफडो मे वायु भरते हुए फैंफडो को फुलाए इस तरह श्वास भीतर लेते रहे। जब श्वास को भीतर ग्रहण कर लेवे तो धिरे धिरे श्वास को छोडते जाए फैंफडो का संकुचन ( फैंफडे ढिले छोडते जाए ) करते हुए भीतर ग्रहण किये श्वास को बाहर निकाल देवे। इस तरह 5 से 7 बार इसी क्रिया को दोहराये।

भ्रस्त्रिका प्राणायाम के लाभ ———–

भ्रस्त्रिका प्राणायाम करने से फैंफडो को बल मिलता है। फैंफडो मे जमे मल का शोधन होता है। फैंफडो मे श्वास सम्बन्धित अवरोध दुर होते है। इससे दिल की धडकने सुचारु होती है। रक्त धमनिया सही से काम करती है।

भ्रामरी प्राणायाम ———–

भ्रामरी प्राणायाम करने के लिए शुद्ध वायु वाले स्थल मे कपडा बिछा कर पालथी मार कर बैठ जाए, स्थिति बनाए अपने दाहिने हाथ के अंगुठे से दाहिने कान को और बाए हाथ के अंगुठे से बाई तरफ के कान को ढक लेवे। दोनो हाथो की पहली अंगुली ( तर्जनी ) से देनो आँखो को ढक लेवे। दोनो हाथो की दुसरी अंगुली ( मध्यमा ) से दोनो नथुनो को ढक लेवे। शेष बची दोनो अंगुलियाँ ( अनामिका,कनिष्ठा ) से मुँह ( होंठ ) को ढक लेवे। अब नाक की अंगुलिया हटाते हुए श्वास को भीतर ग्रहण करे और अंगुलियो से नथुनो को पुनः ढक लेवे।

इस तरह स्थिति मे आने के बाद श्वास को भीतर घुमाने के लिए धिरे धिरे गुंजार करते जाए। जिस तरह से भवरे गुंजार करते है ठीक उसी तरह हुम-हुम का गुंजार करते रहे और श्वास को भीतर ही धारण करे रहे। जब इस क्रिया को आधा मिनिट से एक मिनिट तक कर लेवे तो मुँह से अंगुलियाँ हटाते हुए मुँह को गोल करके सिटी बजाने जैसी स्थिति मे लाते हुए धिरे धिरे श्वास बाहर छोडते जाए। इस तरह श्वास बाहर निष्काशन के बाद नाक से अंगुली हटाए फिर आँख से और फिर कान से अंगुली हटा लेवे। आँको को धिरे से खोलते जाए। ध्यान रहे एक दम से कुछ भी नही करना सब कार्य धर्य से करने है। आँखे भी धिरे से खोलनी है।

भ्रामरी प्राणायाम के लाभ ———–

भ्रामरी प्राणायाम करने से गले के सभी विकार दुर होते है। गले व गंठ की मसल मजबूत होती है। वाणी दोष दुर होता है। चेहरे पर रौनक आती है गाल माशल बनते है। थाईराइड की समस्या सु मुक्ति मिलती है। सभी प्रकार के हारमोन संतुलित होते है।

प्राणायाम करने से कितने लाभ यह तो जान ही लिया अब बस जरुरत है लगन और धर्य की तभी हम रोज इन प्राणायामो को करके इनका लाभ ले सकेगे। इन मे से केवल नाडी शोधन व भ्रस्त्रिका प्राणायाम भी कर लिया जाए तो भी हीतकर रहता है।

प्राणायाम करने के नियम ————

प्राणायाम करने के लिए कुछ नियम है जब हम इन नियमो का पालन करेगे तभी हम इसका लाभ ले पाएंगे। प्राणायाम करने के नियम है कि प्राणायाम करने से पहले मल मूत्र का त्याग करके। सोच से निवृत हो कर स्नान करके शुद्ध धुले पवित्र वस्त्र धारण कर लेवे तभी प्राणायाम करे क्योकि अपवित्र स्थिति मे हमारी औरा मंडल को प्रभावित करने का काम होगा। प्राणायाम हमेशा खाली पेट ही करना चाहिए। प्राणायाम करने के लिए शुद्ध व पवित्र वायु वाले स्थान मे ही प्राणायाम करना चाहिए,जैसे–बागिचा,पेड-पौधो के निकट, नदी ,झील संमुन्द्र के किनारे, खुले हवादार घर के आँगन मे या घर की बालकाॅनी मे,घर की खुली छत पर बस यह ध्यान रखना है कि वह जगह किसी भी तरह से दुषित वायु वाली ना हो यानि सोचालय के नजदीक,बंद कमरे मे,यातायात के साधन के धुए से भरी ना हो।

प्राणायाम करने के आधा एक घम्टे तक कुछ भी खाना नही चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो प्राणायाम सुबह सूर्योदय से पहले या सूर्योदय तक कर लेना श्रैष्ट रहता है क्योकि उस समय वातावरण मे डीजल,पेट्रोल आदि के धुए वायु मे नही घुले होते वायु काफी हद तक शुद्ध होती है। प्राणायाम के श्रैष्ट लाभ लेने के लिए अगर घर पर प्राणायाम करते है तो घर पर पेड-पौधे लगा सकते है। जगह कम हो तो गमले मे पौधे लगा सकते है शुद्ध आकॅसिजन के लिए।

थोडी सी मेहनत सेहत भरपुर रोज बस 5-7 मिनिट अपने लिए निकाल लिया जाए तो भी बहुत 5-7 मिनिट का प्राणायाम बहुत लाभदायक हो जाता है। पुरे दिन शरीर मे ऊर्जा समाहीत होती रहती है।

जय श्री राम

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