भारतीय समाज कृत शिष्टाचार

हर देश समाज के अपने जीवन जीने के तरीके होते है उन्हे नियमो पर चल कर ही हम अपने समाज को सुन्दरता से और व्यवस्थित तरीके से चला सकते है। शिष्टाचार से ही देश समाज की पहचान होती है। ठीक इसी तरह भारतीय समाज के भी अपने कुछ मान-दण्ड स्थापित किये गए है जीससे हमारे समाज को महान बनाने मेै मदद मिलती है।

शिष्टाचार——शिष्टाचार का तात्पर्य है कि सही ठंग से सलीके के साथ दुसरो के संग व्यवहार करना दुसरो का यथायोग्य आदर सम्मान पूर्वक व्यवहार करना।

भारतीय समाज के कुछ शिष्टाचार जो हर कोई निभाना अपना फर्ज अपना धर्म समझता है वह है—–

भारतीय समाज मे बचपन से ही शिष्टाचार सिखाने शुरु कर दिये जाते है जैसे (1 ) अपने से बडो के सामने जाने पर उनके पैरो को छूना और जीनके पैर कोई छूता है तो वह पैर छूने वाले को आशिर्वाद ( गुड वलेसिंग ) देते है( जीते रहे, सदा सुखी रहो, तुम्हारी लम्बी आयु हो,महिला हो तो उसे सदा सुहागन रहोया दूधो नहाओ पूतो फलो ( तुम्हारा घर संतान से आवाद रहे ), तुम्हारा जीवन खुशियो से भरा रहे आदि शुभ कामना वे बडो जीनके पैर कोई छूता है तब वे अपने पैर छूने वाले को आशिर्वाद स्वरुप इन आषिश से सम्बोधित करते है।इसी तरह जब कोई अपने से छोटा सामने आता है तब उसे बडो शुभ आषिश के साथ प्यार भरी नजरो से देखते है और उनके सिर पर हाथ रख कर अपने प्यार प्रदान करते है।

(2) जब कोई किसी से मिलने (रिस्तेदार,दोस्त-मित्र,भाई-बंधु,सम्बंधी,गुरु,बहन) के घर जाते है तो उनके लिए उपहार स्वरुप फल,फूल, मिठाई जरुर लेकर जाते है। खाली हाथ किसी से मिलने जाना बुरा माना जाता है। इसी तरह जब कोई अपने से मिलने आए तो उनका दरवार पर जा कर आदर सूचक शब्दो ( आईए आपका हमारे घर मे स्वागत है,आप हमारे घर पधारे, आप घर के भीतर प्रवेश कर के हमे अनुगृहीत करे, सुस्वागत ,आप आए घर मे हमारे अहोभाग्य आदि शब्द ) के साथ उन्हे अपने घर के भीतर आने का आग्रह करते है। इस तरह मेजवान और मेहमान दोनो एक दुसरे के गले मिलते है,हाथ मिलाते है,हाथ जोडते है यथा योग्यतानुसार जैसे मित्र भाई-बंधु हो तो गले मिलते है हाथ मिलाते है। चीर-परिचित हो तो हाथ जोड कर ही अपनी मौजुदगी का अहसास करवाते है कोई अनजान हो तो भी हाथ जोड कर अभिनन्दन करते है।

(3) जब किसी के घर मे विवाह होता है तो वह अपनी संतान के विवाह मे अपने रिस्तेदारो,चीर-परिचितो,आस-पडौस,मित्रो,भाई-बंधुओ को विवाह मे आने के आमंत्रित करने उनके घर जाते है उनको विवाह का निमंत्रण-पत्र ( शादी का कार्ड ) और हल्दी मे रंगे पीले-चावल दे कर विवाह मे आने का आग्रह करते है। विवाह मे कुछ नजीदीकी रिस्तेदार होते है जैसे भाई-बंधु,बहन,बेटी आदि के घर जब विवाह का आमंत्रण देने जाते है तो निमंत्रण-पत्र,पीले चावल के संग फल,फूल,मिठाई भी भेट करते है इनके घर खाली निमंत्रण-पत्र नही दिया जाता नही तो इसे निमंत्रण पाने वाले का अपमान समझा जाता है और वह इस कारण रुष्ट भी हो सकता है।जब किसी संतान का विवाह पर उस वर-वधु की माता जी अपने भाई-बंधु यानि पीहर वालो को निमंत्रण देने जाती है तो वहाँ भी वे निमंत्रण पत्र के संग फल,फूल,मिठाई लेकर जाती है इसे शुभ समझा जाता है। यही पीहर वाले फिर बहन-बेटी के घर उसकी संतान के विवाह पर जाते समय अपनी बहन-बेटी के परिवार और नए वर-वधु के लिए यथा योग्य अपनी स्थिति के अनुसान वस्त्र ,गहने आदि उपहार स्वरुप भेट करते है। बहन-बेटी के ससुराल वालो के संग अपनी हैसियत के अनुसार उपहार या सगून देकर मिलनी करते है। फिर बहन बेटी भी अपने भाई-बंधुओ को यथा योग्य अपनी हैसियत के अनुसार वस्त्र आदि उपहार भेट करती है। और इसी तरह वधु पक्ष के परिवार वाले माता-पिता भाई-बंधु कोई भी वर के घर पर फल,फूल मिठाई के संग निमंत्रण-पत्र भेट करके विवाह मंडप पर समय पर पहुचने का अनुग्रह (विनती ) करते है। जब वर पक्ष के लोग विवाह मंडप पर पहुचते है उनका खुब आदर-सत्कार करते है। वधु के परिवार वाले वर के परिवार वालो से मिलनी करते है उनसे गले मिल कर स्वागत करते है और कुछ वस्त्र,गहने आदि अपनी हैसियत के मुताबिक भेट करते है इसे मिलनी कहते है। वधु को उसके परिवार और सभी रिस्तेदार,परिचित भेट स्वरुप वस्त्र,गहने या कोई उपहार (गिफ्ट ) भेट करते है। फिर वर पक्ष से वधु के लिए गहने कपडे व वधु की बहनो सहेलियो के लिए शगून दिये जाते है और वधु पक्ष की तरफ से वर के परिवार और रिस्तेदारो मित्रो,बारातियो को उपहार भेट किये जाते है। वधु पक्ष की तरफ से वर पक्ष के रिस्तेदारो माता-पिता बहन-भाईयो को वस्त्र हो सके तो जैबर भी भेट किये जाते है। वर और वधु को दोनो पक्ष मिल कर गहने कपडे उपहार भेट करते है। सब उनके नई गृहस्थि की शुभ आषिश प्रदान करते है।

(4) भारतीय समाज मे मेहमान को भगवान का ही स्वरुप माना जाता है तो उनका आदर भाव से व्यवहार किया जाता है,उनके भोजन पानी व रहने की व्यवस्था उचित तरीके से की जाती है यह खास ध्यान रखा जाता है कि उनके सम्मान मे कोई कमी ना रह जाए।इसी तरह मेहमान भी मेजवान का पुरा आदर भाव से व्यवाहर करते है कही मेजवान को तकलीफ ना हो परेशानी ना हो। भारतीय समाज की परम्पारा मे एक स्लोगन है अतिथि देवो भव यानि आने वाला मेहमान देवता तुल्य होता है उसका सही ठंग से आदर सत्कार करना परम धर्म समझा जाता है।

(5) गुरु-शिष्यो मे भी शिष्टाचार निभाया जाता है जब गुरु (टीचर,अध्यापक ) सामने आते है तो उनका झुकर पाव छूकर उनको आदर दिया जाता हैऔर बदले मे गुरु शिष्यो को शुभ आषिश प्रदान करते है। पहले गुरुकुल हुआ करते थे आजकल वे स्कूल मे बदल गए जहाँ कुछ घण्टे ही गुरु,अध्यापक के सानिध्य मे रहना होता है प्राचीनकाल मे गुरुकुल होते थे तो सदैव गुरु के सानिद्य मे ही रह कर ज्ञान अर्जन किया जाता था। उस समय गुरु की आज्ञा मिलने पर ही भोजन करना खेलना,भ्रमण करना आदि क्रियाए की जाती थी गुरु की आज्ञा नही मिलती तो भुखे ही दिन बीत जाता था। आजकल स्कूल है सो एक कालाॅश तक ही एक गुरु होते जब अध्यापक कक्षा मे आते है तब शिष्ट (छात्र ) अपने स्थान पर खडे होकर अध्यापक का स्वागत करते है फिर अध्यापक उनको बेठना की अनुमति देते है तब शिष्य अपने स्थान पर बेठ जाते है और अद्यापन कार्य शुरु करते है।

(6) भारतीय समाज मे दुख सुख मे एक दुसरे की मदद करना शिष्टाचार है। अपने जान-पहचान वालो,चीर-परिचितो,रिस्ते-नाते वालो के दुख की घडी हो या सुख का माहौल हो वहाँ जा कर उनके दुख-सुख मे काम आता शिष्टाचार माना जाता है। ऐसे मे यथा योग्य तन,मन,धन जैसा हो सके एक-दुसरे की मदद करते है। इसे कहते है काम आने पर यानि जरुरत पडने पर काम आने वाले हीतेशी। यहाँ दुसरो के सुख-दुख को अपना ही दुख-सुख समझा जाता है। पर आजकल लोग स्वार्थी होते जा रहे है केवल जीनसे मतलब यानि जरुरत पुरी होती हो उन्ही के दुख-सुख मे काम आते है वाकि तो दूरी बना लेते है लोग।

(7 ) भारतीय समाज मे क्षमा और माफी ( सोरी) का महत्व होता है अपनी भुलो को सुधारने के लिए क्षमा का उपयोग किया जा सकता है और क्षमा मांगने वालो को माफ करना यही सभ्यता का हीस्सा होता है शिष्टाचार का अभिन्य अंग है क्षमा और माफी। इसके लिए एक कहावत है कि ( क्षमा बडन को चाहिए और छोटन को उत्पाद ) का अपमान करना अशिष्टता कहलाता है और दुसरो का आदर सत्कार करना मान सम्मान देना शिष्टाचार कहलाता है।

( 8 ) सत्य आचरण रखना यानि सच्चाई पर चलना और सच्च बोलना ही शिष्टाचार है झूठ से बच कर चलना ही भारतीय शिष्टाचार का हीस्सा है।चोरी चकारी करना अशिष्टता मानी जाती है ईमानदारी शिष्टता की निशानी।

( 9 ) दण्ड और ईनाम भारतीय समाज के हिस्से है अगर समाज के नियमो को मानना जाए तो समाज मे शिष्ट कहलाता है ऐसे इंसान को समाज पुरस्कृत करता है और समाज के नियमो को तौडने वालो को समाज दण्ट भी देता है।

( 10 ) बडो का आदर सत्कार करना उनको सम्मान देना शिष्टाचार माना जाता है। वृधो की मदद करना शिष्टाचार

(11) परिवार के युवा अपने परिवार की परम्परा के अनुसार चल कर ही अपना जीवन जीते है परिवार की अनुमति से ही विवाह बंधन मे बंधते है। युवायो के विवाह के लिए उनके माता-पिता परिवार-जन ही उनके लिए जीवन साथी का चुनाव करते है यही शिष्टाचार है। युवा अपनी मर्जी से जब विवाह करते है वे समाज की मर्यादा को भंग करते है उन्हे अशिष्ट माना जाता है विवाह के लिए जीवन साथी का चुनाव जात-विरादरी से ही किया जाता है जात-विरादरी के बाहर जा कर विवाह करना यानि समाज के नियमो को तौडना इस मे समाज दण्ड भी दे सकता है ऐसे लोगो का समाज से बाहर भी किया जा सकता है।

(12 ) कर्तव्यो को निर्वहन करना शिष्टता की निशानी है। भारतीय समाज मे सभी के अपने कर्त्वय होते है शिष्टतापूर्वक वह सभी अपने कर्त्वयो को निभाये समाज यही आशा करता है। अपनी जीमेदारियो को भलिभांति निभाना भी शिष्टाचार माना जाता है।

(14 ) बडो के सामने अदब से पेश आना शिष्टाचार माना जाता है। बडो के सामने शर्म से अदब से बैठना बडो के सामने वेअदबीपूर्ण बाते करना अशिष्टता मानी जाती है। घर की बहु-बेटियो का घर के बडो के सामने अदब से बैठना उनका सम्मान करना ही शिष्ट कहलाती ही उनकी शर्म लिहाज करना यानि जीतना बोलना मर्यादा हो जैसे व्यवहार करना मर्यादा हो तो यह शिष्टाचार की श्रेणी मे आता है। बडो के सामने जोर-जोर से बोलना,चिखना-चिल्लाना,जोर-जोर से हँसना आदि बहुत सी बाते है जो वेअदबी की श्रेणी मे आती है।

(15 ) दुसरो से बात चित करते समय जी शब्द का प्रयोग करना जैसे हा जी,ठीक है जी, सम्बोधन करते समय भी जी का प्रयोग करते है जैसे मम्मी जी,पापा जी, अंकल जी, आँटी जी, किसी के नाम या कर नेम का उच्चारण करते समय भी जी का प्रयोग करते है जैसे किसी का नाम मान लो शरद है तो उन्हे पुकारते समय शरद जी का उच्चारण किया जाता है। सरनेम जैसे मल्होत्रा है तो मल्होत्रा जी इस तरह से शिष्टाचार निभाया जाता है।

(16 ) भारतीय समाज मे किसी से मित्रता पूर्वक सम्बोधन करने मे भी रिस्तो के रुप मे उच्चारण करते है जैसे कोई पुरुष हो तो उन्हे भईया -भाई ,महिला होगी दीदी-बहन, अंकल- आँटी, भईया जी-भाभी जी इस तरह किसी को नाम से उच्चारण करना अशिष्टता माना जाता है। भारतीय समाज मे हर किसी के रिस्ता मान लिया जाना ही शिष्टाचार है।

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