मृत्यु के पश्चात की यात्रा सफर ( ज्ञान धारा )

इंसान मृत्यु के बाद शरीर को छोड कर अपने अगले गंतव्य की तरफ प्रस्तान करता है। जिस इंसान के जैसे कर्म होते है उसे उन्हे के अनुसार अपनी मृत्यु के बाद आत्म-रुप मे मार्ग पर चल कर अपने अगले गंतव्य की ओर बढना होता है। माना किसी ने अनुशासनात्मक जीवन निर्वहन किया है तो उसे ऊपर के सात लोको मे से एक लोक की तरफ प्रस्थान करना होता है। जो अपना जीवन अनुसाशनात्मक ढंग से नही जीते उन्हे नीचे के सात लोको मे से एक लोक की तरफ प्रस्थान करना पडता है। ऊपर के सात लोक की तरफ जाने के अनेक मार्ग है।

एक मार्ग ऊपर के सप्त लोक के लिए सीढियाँ इन पर अधिकांश ज्ञान- भक्ति पर चल कर जीवन निर्वहन करने वाले लोग होते है। यह लोग भक्ति मार्ग पर चलने के लिए ज्ञान को प्राप्त करते है और मृत्यु पश्चात यह स्वर्ग, बैकुंठ आदि लोको मे जाने के लिए सीढियो पर चल कर अपने गंतव्य तक पहुच जाते है। दुसरा मार्ग पहाड आदि की चढाई करके लोग ऊपर के सप्त लोको मे पहुचते है। पहाड पर अधिकांश वह लोग अपना गंतव्य मार्ग पाते है जिन्होने शिव की उपासना की होती है। वह मरने के बाद पहाड की चढाई करते हुए शिव लोक तक पहुच जाते है। तीसरा वह लोग जो भक्ति करते है। नेक जीवन जीते है। यह लोग धरती मे नदियो नालो,आदि को पार करते हुए पीतर लोक मे पहुचते है।

जो लोग नीचे के सात लोको की तरफ प्रस्थान करते है उनको तपती बालु रेत पर चल कर धरती के अन्दर से गुजरते हुए निचले सात लोको मे पहुचना होता है। यह सप्त लोक है-सूतल,वितल,पताल,तलातल,अतल,रसातल आदि सात मार्ग यही से पाप कर्म करने वाले लोग अपने गंतव्य पर पहुचते है। इसे नरक आदि नामो से जानते है।

जो लोग अपना सारा पाप-ताप त्याग कर केवल ईस्वरमय हो कर अपना जीवन निर्वहन करते है वह लोग आकाश मार्ग से उडते हुए उडन खटोलो पर बैठ कर अपने गंतव्य स्थल पर पहुचते है। ऐसे लोग अधिकतर ऋृषि,मुनि,संत-समाज व पुन्यसील होते है। ऋृषि-मुनि, ऋृषि लोक आकाश मे वायु को आधार बना कर हवा मे चलते हुए अपने गंतव्य को प्राप्त करते हुए पहुचते है।

कुछ लोग अपने पूर्व जन्मो के कारण इस धरती पर सुख तो भोगते है मगर आहार-विहार,विचार की शुद्धता नही रखते इन्हे पूर्व जन्मो के सिंचित पुन्य प्राप्त होने से अपने जीवन काल मे कभी ना कभी कोई पुन्य कर्म कर जाते है इस लिए इनके इस जन्म मे हुए पापो के यही समाप्त करने हेतु ईश्वर की प्रेरणा से देव गणो द्वारा इनके अंतिम दिनो मे इनको निराहार रखा जाता है या सात्विक भोजन दिया जाता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोगो को मरने से कई दिनो, महिनो तक भोजन मे खिचडी,फल,दुध,ज्यूस आदि ही खाने की सलाह डाॅक्टर देते है। बस यह इनके पूर्व कर्मो से इस जन्म के पाप को धोने का रास्ता मात्र है। कई लोगो को भोजन बिलकुल बंद हो जाता है। वह चाह कर भी कुछ निगल नही सकते इसके पीछे भी यही कारण है कि इस जीवात्मा ने इस जन्म मे थोडा बहुत कोई गलत कार्य किया अभक्ष्य का भक्ष्ण कर लिया है तो उसकी आत्म शुद्धि के लिए देव गण उस प्राणी के भोजन पाचन चक्र को रोक देते है।

जय श्री राम

http://चित्रा की कलम से

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