माँ की व्याख्या ( ज्ञान धारा )

माँ शब्द सुनते ही कानो मे रस घुल जाता है। एक ममतामई छवि साकार हो सास्वत प्रकट हो जाती है। ऐसी छवि जो अपने आँचल की छाव मे हमे गौंद मे ले कर बैठी हमारी सुरक्षा करती प्रतित होती है। जी हाँ आज हम और आप आज की इस मुलाकात मे माँ के भेद विषय पर प्रकाश डालने का प्रयास करते ह। चलिए तो अपनी अग्रीम यात्रा के लिए प्रस्थान करते है। आज जानने की कोशिश करते है क्या माँ सारे संसार मे एक समान होती है या इन मे भी विभिन्नता होती है। शायद नही असलियत यही है कि माँ भी दुनिया मे अलग-अलग प्रकृति की होती है।–

माँ शब्द का महत्व ————-

माँ हम उसे कहते है जो हमे अपने कोख से पैदा करती है पालन-पोषण करती है। माँ की कोख मे पलने वाला बालक निर्भिक होता है उसे मालुम होता है, कि मुझे अगर कुछ तकलिफ आएगी तो माँ स्वयं मुझे सम्भाल लेगी। माँ होती भी ऐसी ही है खुद बालक को कितना भी पीटले पर दुसरा तनिक भौंए भी टेडी कर दे बालक पर माँ उसे माफ नही करती। माँ अपने ममता के आँचल मे सुरक्षित रख कर हमारे लिए छतर-छाया करती है। कहने को बहुत कुछ है माँ पर कहने के लिए पर आप सभी इस विषय मे सब कुछ जानते ही है इस लिए इस तथ्य को यही समाप्त करते है आगे गंतव्य मे प्रस्थान करते है।

माँ के भेद ——–

माँ को हम दो भागो मे रख कर देखते है कि दोनो तरह की माँ मे अंतर कितना है। एक अच्छी और नेक माँ तो दुसरी अनुभवहीन, स्वार्थपरता मे लीन तामसी माँ। माँ का काम केवल बालक को पैदा करना ही नही है, बलि्क बालक मे अच्छे गुणो की नींव रखना उसे सही मार्गदर्शन देकर एक आदर्श और नेक नीतिवान संतान बनाना भी होता है। इस कार्य मे धैर्य,हिम्मत,लगन इन सबकी आवश्यकता होती है।

स्वार्थपरता मे लीन माँ की पहचान तमो गुणी माँ ————

माँ जब अपने कर्तव्य कर्म से च्यूत ( कर्तव्य परायनता का अभाव ) हो जाए। ऐसी माँ बालक का सही से मार्ग दर्शन नही कर सकती। इस तरह की माँ को अपने हीत के आगे दुसरो की कोई अहमियत नही होती। ये जो सोचती है, जो करती है, वही सही है इस तरह की इनकी सोच होती है। इन्हे इस बात से कुछ मतलब नही कि उसके किये जाने वाले कर्म बालक मे दुर्गुण पैदा कर रहे है। ऐसी माँ की संतान यही समझिए कि वह बालक गंदे कट्टर से पैदा हुआ है और अपने दुर्गुणो से संसार मे बदबु ( दुसरो को कष्ट पहुचाना मनशा,वाचा.कर्मना सभी तरह से )) फैला रहाँ है।

जब माँ बालक को कोख मे धारण किए होती है उस समय भी ऐसी माँ दुसरो के अहीत करती है या अहीत करने के भाव मन मे पाले रहती है। परिवार आस-पडौस पता नही किस-किस से ये द्वेश रखती है, मन ही मन उन पर कुंठीत होती है। यह है बालक की प्रथम सीढी कि वह अपनी माँ से सिख ग्रहण कर रहाँ होता है गर्भावस्था मे। बालक पैदा होने के बाद भी ऐसी माँ अपनी गंदी बुद्धि का ही प्रयोग करती है। वह दुसरो से द्वेशतावश ऊँचा-नीचा व्यवहार करती है। दुसरो की निंदा करना इनका पैसा होता है।ये खुद को सुपिरियर समझती है और दुसरो मे कमिया ही निकालती रहती है। चुगलियाँ तो ऐसे करती है कि यही दुनिया मे माहिर है दुसरे सब बुरे, मुर्ख है। ऐसी माँ की नजरो मे सभी दोषी, सभी दुष्ट, सभी बुरे है बस यही सत्यवान सावित्री की घनिष्ट प्रिय संतान है।

ऐसी माँ जब भी बालक के करीब होती है, बस यही काम कि दुसरो के प्रति बालक के मन मे मैल पैदा करके राज करती है। परिवार जनो मे किसी कमजोर की तो खेर नही ऐसी माँ के होते। यह तो उस कमजोर, लाचार के लिए गढा खोद कर ही दम लेती है। जो भी मिले उसकी निंदा करके चेन की सांस लेती है। उदाहरनार्थ — परिवार मे नन्द है उस से अगर यह मन मे बेर रखती है, तो पति को तो अपनी बहन के खिलाफ रखती ही है, मगर अपने बालको को भी ये नही छोडती उनके कान मे भी ये उस नन्द के प्रति द्वेश भाव पैदा कर देती है। ऐसा माहौल्ल पैदा कर देती है, कि परिवार युद्ध स्थली है और नन्द के संग ये जंग करेगी और जीत हांसिल कर लेगी। इतना ही नही इनके बालक तो इनसो भी दो कदम आगे बढ कर रहते है।

जब भुआ ससुराल से घर आ जाए तो कोई ना कोई बहाना ढुंढ ही लेते है। माँ की सुपर पावर बन भुआ को दुखी करके रुला कर घर से रवाना करके ही दम लेते है। जहाँ भी जाए वही ये बालक अपनी माँ के संग मिल कर भुआ की निंदा मे जुट जाते है। इनको यह कोई मतलब नही कि तुम्हारे पास अब भुआ नही आने वाली पर नही जी ये तो फिर भी घुम-घुम रिस्तेदारो मे पडौस मे समाज मे हर कही भुआ के लिए जहर परोस ही देते है। अरे भई ये गंदे गट्टर की पैदाईश ही तो है गंदगी इनकी सोच मे समझ मे हर कही फैली हुई है। ये उदहारण है पर ऐसे लोगो की पता नही किस-किस से दुश्मनी ढनी हुई होती है। सब के संग इसी उदाहरण की तर रवईया रखते है। इसी तरह अन्य जगह पर ये ऐसा ही माहौल्ल बना ही लेते है।

मजे की बात तो तब कि इन लोगो को इनके जैसे मिल ही जाते है। जिनका इन मसलो से कोई लेना-देना नही होता पर ऐसी माँ उसकी पैदाईश बहुत सारे दंत-धावक ( पर निंदा मे आनन्द लेने वाले ) बना लेते है। ऐसी माँ दुष्ट, निर्लज, दयाहीन, कठोर हद्य, मुर्ख, आततंताई, समाजिकता का हनन करने वाली संतति तैयार कर समाज के समुख परोसती है। लिजिए जी ये तो हुई गंदे गट्टर की पैदाईश की बात इस यात्रा मे इस पडाव को पार करते हुए चलते है एक ऐसी माँ की यात्रा सफर मे जो समाज मे आदर्णिय होती है।

एक अच्छी सदगुणी माँ ———-

अच्छी सदगुणी माँ जब संतान कामना मन मे रख कर संतान प्राप्ति के लिए प्रयत्न करती है बस वही से ये अच्छे संस्कार बालक के अस्तित्व मे पैदा करने शुरु कर देती है। इसके बाद जब बालक गर्व मे आता है, तभी से यह ऐसे कर्म करने लगती है कि बालक सदगुणी व ज्ञानवान हो। जब बालक गर्भ मे होता है तो यह माँ भले कितनी भी बुरी परिस्थिति मे क्यो ना हो यह किसी पर दोषारोपण नही करती सदैव शांत चित मन से नेक कर्म करती रहती है। परिवार मे लोगो द्वारा ऊँचा-नीचा व्यवहार करने पर भी यह आक्रामक नही होती बदले के भाव मन मे नही रखती केवल शांत मन चित से अपने कर्तव्यो का निर्वहन करते हुए सभी नैतिक क्रियाए करती रहती है।

जो भी खाने को मिले उस से संतुष्ट हो जाती है अगर कोई उस के हाथ से भोजन छिन भी ले तो भी वह शांत मन प्रभु की लिला मान चुप रह कर प्रभु का मन मे ध्यान करती है। कभी पर निंदा नही करती, दुसरो मे कमियाँ नही ढुंढती, बस अपने मे अपने करमो पर ही ध्यान रखती कही गलती से भी कुछ ऊँच-नीच ना हो जाए। यह माँ गर्भ काल मे ही नही बल्कि अपनी जीन्दगी भर ऐसी ही होती है। ससुराल वालो के द्वारा सताए जाने पर, पीहर के रुस्ख व्यवहार पर,आस-पडौस के आरोप-प्रत्यारोप होने पर भी यह पल्टवार मे आक्रामक नही होती पर उनकी आलोचना को चुप चाप सहन करती रहे ऐसा भी नही इस लिए यह अधिकतर एकांत मे रहना पसंद करती है।

बालक गर्भ मे है इस लिए अच्छी ज्ञानवर्धक पुस्तके पढती है। परिवार के बडो का यथायोग्य आदर करती है। बडे-बुढो के पास बैठ ज्ञानवर्धक रोचक जानकारिया सुनती है। कलात्मक कार्य करती रहती है। अपने दैनिक क्रियाओ को समपुर्ण करने के बाद आराम करती है, कुछ अच्छी बाते सोचती है। जब बालक पैदा हो जाता है तो वही शांत-चित भाव से लालन-पालन करती है। संतति योग्य बने घर, परिवार, देश, समाज सब का उत्थान करने वाली बने इसके लिए यह बालको को सही मार्ग दर्शन करती है। बालको को नैतिक ज्ञान,सामाजिक व्यवहार, धार्मिकता के गुण,मननशील बनाती है।

हर प्रकार से बालको के उत्थान के करम करती हुई समाज को एक आदर्श बालक सेवा मे प्रदान करती हुई समाज को गौरवांवित करती है। ऐसी माँ के उदाहरण के लिए एक आदर्श माँ का नाम जीजाबाई ने वीर छतरपति शिवाजी को अपनी कोख से पैदा कर उसे आदर्शमान ज्ञान दिया जिसको पा बालक देश, समाज, परिवार सब का उत्थान करता बना। माँ वही अच्छी जो अपनी संतित को दुसरो के खिलाफ मुँह खोलना ना सिखाए बल्कि सदकर्म करना सिखाए। जो माँ अपनी संतति को नेक राह पर चलाती है वास्तव मे माँ कहलाने की हकदार वही है। जो माँ हो कर अपने बालको मे दुसरो के प्रति द्वेश भावना पैदा करे वह सही मायने मे माँ नही बस बालक पैदा करने की मशींन मात्र होती है।

जो माँ अपने बालको को नेक राह पर चलना सिखाए उसमे आदर्श समझाए वह माँ गंगा की पावन धारा के समान और उसके बालक पवित्र गंगाजल के समान मिठास भरे अपनी खुशबु से जंग को महकाते है और दुर्गुणो का रोपण करने वाली माँ गंदे गट्टर का बदबुदार कादा और उसके बालक गंदे गट्टर की पैदाईश बदबुदार दुर्गुणी जो केवल अपने दुर्गुणो रुपी बदबु से समाज,देश सब का माहौल खराब करते है। आदर्श माँ बनिये अपने बालको को उच्च आदर्श दिजीए जिससे वह महान बन सके।

जय श्री राम

http://चित्रा की कलम से

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