राजस्थान का लोक-पारम्परिक त्यौहार गणगौर ( धार्मिक लेख )

भारत वर्ष मे बहुत से त्यौहार मनाए जाते है। जिसमे कई पुरे भारत मे और ऐसे त्यौहार होते है जो केवल क्षेत्र विशेष मे ही मनाए जाते है। इस तरह से राजस्थान मे एक बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसको गणगौर के नाम से जानते है। आईए ले चले आपको गणगौर के पावन पर्व इस अवसर पर गणगौर की झांकी देखते है———-

गणगौर त्योहार को मनाने का कारण————-

गणगौर पूजन की परम्परा राजस्थान मे प्राचीनकाल से चली आ रही है। इस त्यौहार को मनाने का एक कारण है कि मान्यतानुसार माँ पार्वती ने तपस्या कर के शिव को वर के रुप मे प्राप्त किया। माँ पार्वती ने अपने मन चाहे वर को पा कर बहुत प्रसन्न हुई और इसी खुशी मे उन्होने दुनिया की सभी महिलाओ को सुहाग दान किया। माँ से अपने सुहाग की लम्बी उमर पाने हेतु सुहागनो ने व्रत किया और अपने सुहाग की आयु पाई। माना जाता है कि कोई कुवारी कन्या गणगौर को पूजती है तो उसे मन पसंद वर ( पति ) मिलता है। इस लिए सभी महिलाए चाहे वह सुहागन हो या कुवारी सभी गणगौर का बहुत चाव से पूजन करती है।

इस त्यौहार को मनाने का एक कारण यह भी है कि मान्यतानुसार माँ पार्वती शिव से विवाह करने के बाद कुछ समय अपने पीहर आई थी। वह अपने पिता हिमालयराज के पास शिव की आज्ञा से आकर पुरे 16 सोलह दिन तक रही और 16 सोलवे दिन भगवान शिव माँ पार्वती को पुनः ले जाने घरती पर हिमालयराज के पास आए। हिमालयराज ने अपनी पुत्री माँ पार्वती को शिव जी के संग बडी धुम-धाम के साथ विदा किया। इस लिए महिलाए सोलह दिन तक माँ पार्वती की पूजा करती गीत गाती मंगलाचार करती है। शिव को ईशर के रुप मे और माँ पार्वती को गणगौर ( गौरा ) के रुप मे पूजते है।

गणगौर का त्यौहार —————-

गणगौर की पूजा करने के लिए होलका को जलाने के बाद जो उस होलका की राख बनती है। उसे महिलाए अपने घर ले जाती है, और होलका के अगले दिन सुबह स्नान आदि दैनिक क्रिया से निवृत होने के बाद वह सुन्दर थाल सजा कर गीत गाती हुई अपने सखियो, सहेलियो संग टोली बना कर बगिया से पुष्प ( फूल ) व दुर्वा लेने जाती है वहाँ से वह मंदिर मे जा कर माँ पार्वती का हार श्रृंगार करती है। गणगौर पूजन करती है। पूजन करे गीत मंगलाचार गाती हुई पुनः घर लौट आती है। यह क्रम हर रोज सोलह दिन तक चलता है। कुवारी कन्याए शाम के वक्त अपनी सखियो संग गणगौर के मांडने आंगण मे मांडती है उसे प्रशाद भोग लगाती है मिल कर गीत गाती नाचती है।

जब सोलह दिन हो जाते है तो ईशर के संग गणगौर को विदा कर दिया जाता है। तीसरे वनरात्रि की शाम को गमगौर और ईशर को भोग-प्रशाद खिला कर गाते-बजाते महिलाए अपने सिर पर रख कर कुए, बाबडी आदि पर पानी पिलाने ले जाती है।यू तो पुरे राजस्थान मे ही गणगौर बडी धुम-धाम से मनाई जाती है। जयपुर मे राज-घराने की गणगौर की सवारी निकाली जाती है। रथ, ऊँट, घोडे आदि सजा कर उस पर गणगौर को विराजमान करके पुरे नगर भर मे प्ररिक्रमा करवाते है। नाचते-गाते आदमी- औरते संग चलते है। भव्य दर्शन का नजारा देखते ही बनता है।

बीकानेर मे तो गणगौर बहुत जोर- शोर से मनाई जाती है। इसके लिए महिलाए तीसरे नवरात्रि की शाम को गणगौर-ईशर को पानी पिलाने कुओ पर ले जाते है। अगले दिन चतुर्थ नवरात्रि के दिन सुबह भोग प्रशाद बनाए जाते है, मंगलाचार होते है। शाम को सभी गणगौर रानी माँ के चरण छुने राज-महल मे जाती है। इसमे सभी अपनी गणगौर को सुन्दर नए-नए वस्त्र श्रृंगार से सजाते है और लकडी की चौंकी पर रख कर लोग अपने घरो से दौडते हुए पैदल ही राज-महल तक जाते है। पुरे शहर मे मैला लग जाता है।

महिलाए सज-सवर कर सडको, चौराहो पर एकत्रित हो कर गीत गाती है और आने वाली सभी गणगौर का स्वागत करती है।लोग दौड लगा कर सबसे पहले महल पहुच कर अपनी गणगौर को रानी माँ के आशिर्वाद की कामना से प्रथम आने की हौड रखते हुए भागते जाते है। जो गणगौर रानी माँ के पास पहले पहुंच जाती है रानी माँ उन्हे ईनाम देती है। इस तरह रानी माँ के महल मे आशिर्वाद पाने वाली सभी गणगौर को रानी माँ चाँदी का सिक्का और नारियल उपहार स्वरुप देती है। जो गणगौर पहले पहुचती है, वह बडा ईनाम ले जाती है।

राजस्थान मे सबसे ज्यादा धुम-धाम बीकानेर की गणगौर पर ही देखने मे आती है। भव्य मनमोहक झांकिया नैयनाभिराम नजारा सुखद अनुभव उत्पन्न करते है। लोग गणगौर को अपनी पुत्री और ईशर को दामाद मानते है। माना जाता है कि पुत्री विवाह होने के बाद अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आती है कुछ दिन रह कर दामाद के साथ वापस विदा हो जाती है। इस लिए गणगौर भी विदा हो जाती है। जैसे घर आई पुत्री को गहने,वस्त्र,मिठाई आदि दे कर विदा करते है ठिक इसी तरह गणगौर को नए वस्त्र-आभूषण पहनाकर विदा करते है।

जय गणगौर,ईशर

जय सियाराम

http://चित्रा की कलम से

2 thoughts on “राजस्थान का लोक-पारम्परिक त्यौहार गणगौर ( धार्मिक लेख )

  1. आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है चित्रा ।
    गणगौर पूजा के लिए कलश में पानी लेने के लिए जब जाते हैं तब जयपुर में दो कुँवारी लडकियों को दूल्हा-दुल्हन की तरह सजा कर भी ले जाया जाता हैं ।आपके लेख ने मेरी गणगौर पूजा व मेले की बहुत सारी स्मृतियाँ याद दिला दी 😊

    Liked by 1 व्यक्ति

    1. आप भी गणगौर पूजन मे सामिल होती थी बहन। कितना आनन्द आता जब गणगौर को सहेलियो संग पूजने जाते मंगलाचार गीत गा-गा कर शाम को मांडना मांडने सहेलियो के संग जाते वो दिन अब कहाँ बचपन के, जय गणगौर माता

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