सिखा गई सीता जीना कैसे है इस दुनिया मे हमे ( काव्य रचना )

सिखा गई सीता जीना कैसे है इस दुनिया मे हमे, शिक्षिका थी महान, आर्दश अपने समझा गई।

राजा के हो ठाठ-बाठ या जंगल के हो घनघौर गलियारे, आँशु बहाये नही कभी, खुद पर इतराई भी नही वो कही।

पहना उसने बहुत रेशम बन कर राज-रानी, संयासनी की वेश-भूषा मे भी खुदको निखार गई।

पहना था स्वर्ण-मुकुट का ताज कभी, सिर पर धारन करके दिखा गई जंगलो मे उगी कंटिली झाडिया भी।

सिखा गई सीता जीना कैसे है हमे इस दुनिया मे, वह शिक्षिका थी महान, आर्दश अपने समझा गई।

बिछते थे पाव के नीचे मखमली जाजम ( गलिचे ) भी कभी, कांटो मे चल घायल-लहुलुहान पाव भी दिखा गई।

जीती थी कभी पकवानो पर, भुखे पेट रह कर भी गहरी नींद सो जाती थी, मिला जो खाने को उसी मे आनन्द पा जाती थी।

महलो की स्वर्ण मंडित अटालिका मे सकून पाती थी कभी, पर्ण कुटिया मे रह कर भी जीवन निभा गई।

सिखा गई सीता जीना कैसे है हमे इस दुनिया मे, वह शिक्षिका थी महान, आदर्श अपने समझा गई।

सैंकडो दास-दासिया दौडे आते एक आवाज-भर, खुद पीस कर भोजन पकाने की कला भी बतला गई।

थी जनक की दुलारी आँख मे आशु आने ना दिया पिता ने लाडली के कभी, रावण की अशोक-वाटिका मे रह आँशु की झडी लगा गई।

जिस के लिए त्यागे राजसी वैभव सभी, फिर भी उसी पति राम से ठुकराई गई, बाल्मिकी के आश्रम मे शरण पा गई।

सिखा गई सीता जीना कैसे है हमे इस दुनिया मे, वह शिक्षिका थी महान, आदर्श अपने समझा गई।

अपने धर्म निभाती रही हमेशा ही बडी लगन से, पर करी नही उसने अपने दुख-सुख ही परवाह कभी।

भोली थी, प्यारी थी सब जग से नियारी थी, तभी तो अपनी जगह सबके दिलो मे बना गई।

कहते है संत-ऋषि कि राम थे महान, राम के आदर्श है महान, हम कहते है

राम से भी अधिक महान थी वह सीता जो अकारण ही लाभ-हानि की चक्की मे पीसती रही।

सीता जो कि दुसरो की खातीर अपना अस्तित्व ही मिटाती रही सदा इतिहास मे गौंण हो कर भी मुस्कुराती गई।

सिखा गई सीता जीना कैसे है हमे इस दुनिया मे, वह शिक्षिका थी महान, आदर्श अपने समझा गई।

दर्द समझ सका है कौन उस अबला के जो दुसरो की वजह से दुख उठाती रही, थी रावण की दुश्मनी राम से पर कैद ( अशोक वाटिका ) मे रखी गई सीता ही।

राजसी ठाठ मे जीये राम पर सीता तो जंगलो की धुल मे जीवन बिताती रही, जंगल मे रह कर भी अपनी संतोनो को संस्कारी बना गई।

मिला था वन-बास चौहदा बरस का राम को, पर वन-वन ठोकरे खा-खा कर जीवन निर्बहन करती रही सीता भी।

दुसरो के पापो का बोध अपने कांधे पर लिये दर-बदर भटकती रही सीता, सिखा गई अकेले रह कर भी जीवन कट जाता है।

सिखा गई सीता जीना कैसे है हमे इस दुनिया मे, वह शिक्षिका थी महान, आदर्श अपने समझा गई।

वह सीता थी महान जो हमे हर हालात मे रहक भी जीना सिखला गई, मुश्किले आई लाख पर चुप-चाप रहक जीना सिखा गई।

एक माँ सीता ही है जो सब सह जाती है मौन हो जीवन को बडी कुशलता से जी जाती है।

सिखा गई सीता जीना कैसे है हमे इस दुनिया मे, वह शिक्षिका थी महान, आदर्श अपने समझा गई।

विशेष तथ्य ————आज जब हम अपने हालातो की तरफ नजर डालते है तो दुखी होते है पर कभी किसी ने यह नही सोचा कि माता सीता तो एक बडे कुल की पुत्र-वधु,एक बडे घराने की राजकुमारी थी। जिसके सभी कुटुम्बी-जन ठाठ से जीवन निर्वहन करते थे पर सीता ने तो जीवन-भर संघर्ष ही किया। पति को वन-बास मिला संग गई। ठेरो दुख-दर्द सहे,पर जब राम को राज्य मिला तो वह सीता के कांटो पर चलने से हुए लहु-लुहान पावो से रीसता लहु भुल गए।

उन्होने एक अच्छे पुत्र के दायित्व निभाया, अच्छे भाई बन कर दिखाया, अच्छे समाज-सेवक ( राजा ) बन कर दिखाया पर आखिर मे बेचारी माँ सीता का क्या कसूर जो उसे ठुकरा दिया गया। एक पति के रुप मे पिता के रुप मे वे कभी अच्छे ना बन सके। जब उनको मालुम था कि सीता के गर्भ-ठहरा हुआ है तब भी उन्हे घर से निकाल जगंलो मे जंगली जानवरो,डाकुओ आदि का शिकार होने के लिए छोड दिया गया। आज तक कोई नही जान सका कि माँ सीता ने ऐसा कौन सा घौर अपराध किया जिसकी सजा उनको मरते दम तक भोगनी पडी।

पुरी रामायण पढो आनन्द आता है मगर जब उत्तर रामायण पढो तो केवल माँ सीता की पीडा और दर्द की आह मे डुबे आँशु ही नजर आते है। यह पढ-सुन कर दिल बहुत भारी हो जाता है कि इतनी बडी महान दुनिया मे कोई भी नही जो उसको समझता। उनके दर्द को बांट कर कुछ कम करने की कोशिश करता। ससुराल,पति ये तो निषठुर हुए ही थे तो क्या सीता के पीहर मे भी सब लाशे ही थी जो उसके साथ खडा भर ना हो सका। भला हो उन बाल्मिकी जी का जिन्होने माँ सीता को शरण दी बेचारी अपना बचा हुआ जीवन जी सकी। कैसे अकेले ही अपनी संतानो को पालती रही होंगी। इस पर भी देखो माँ का दुर्भाग्य की संतान को पालती माँ सीता रही।

जवान होने पर उन्हे ले जाने पिता बन कर राम आ गए। क्या एक पिता का धर्म निभाया उन्होने तो वे अब संतानो को संग ले जाने के अधिकारी कैसे हुए। जिस माँ ने अकेले पाला-पोषा जब उन बालको को अपना कर्तव्य निभाने का वक्त आया कि वह बडे हो गए और माँ के लिए व्यवस्था कर सके पिता जाग उठा। बेचारी अंत समय मे भी अकेली ही रह गई वे अब क्या करती जो मर कर खुद को समाप्त ना करती तो। क्या कसूर था माँ का जो उन्होने यह घौर नारकीय जीवन जीया। कैसे भूल जाए हम उन माँ की आँखो से निकलने वाले मौंन आंशुओ को जो वह दुनिया से छिपाती रही। खुद से संघर्ष करती रही।

राम हमारे आदर्श है पर माँ सीता हमारा विश्वास, हमारी आत्मा ,हमारी आश, हमारे मन-मस्तिष्क मे सदैव रहेंगी हम उनकी संताने है हम उनके ऋृणी है और सदैव रहेंगे। कैसे भुले माँ सीता तुम्हारा वो मासुम भोला चेहरा जो अन-कही कहानियाँ बयान कर जाता है। दिल मे से एक टिस बन कर चुभ जाता है, जब तुम्हारा दर्द भरा चरित्र पढने को आँखो के सामने आ जाता है। नारिया बहुत हुई और होंगी भी पर माँ तुम्हारे जैसा महान कोई और हुआ भी नही। हे हमारी प्यारी माते सीता हमे अपने जैसा धर्य, अपने जैसा संतोष, अपने जैसी सहन-शक्ति प्रदान करना और सदैव अपने श्री चरणो मे स्थान हमारा बनाए रखना।

कभी कोई गलती हो भी जाएं तो अपनी इस संतान को माफ करके अपने कलेजे से लगा लेना।आज जब मै आपका यह छोटा सा वर्णन कर रही हो तो मेरी आँखे उन आँशुओ से भर रही है जिन्हे तुम इस दुनिया से अपने दिल मे दबा कर जीती रही हो। आपकी इस लेखनी मे जो दर्द आज मेरे मन मे उभर कर आया है बुरी तरह से रुला गया माँ। अब तो कोई कहे कि मै दुखी हुँ, तो लगेगा व्यर्थ ही दुखी होने की बात कर रहाँ है माँ आपने जो दुख देखे उसके बाद कोई दुख आपने छोडे ही नही हम जैसे इंसानो के लिए।

कहते है शिव ने दुनिया को बचाने के लिए हलाहल विष का पान कर लिया था मगर यह कोई नही जान पाया माँ कि इस दुनिया मे आपने अपनी संतानो हमे कोई दुख ना देखना पडे इस लिए सारा दुख का सेवन आप करती चली गई। माँ सीता तुम सच्च मे बहुत महान हो। तुम जैसा कोई और नही दुनिया मे। तुम तो राम से भी महान हो राम से पहले आपका गुनगान करेंगे माँ राम से पहले सीता को याद करेंगे हम। मुझे लिखते समय जो दर्द पीडा का अनुभव हुआ आँखो से अश्रृधारा बह निकली शायद आप लोग जब इसे पढे तो वही माँ सीता का दर्द महसूस कर सकोंगे।

तुम सा कोई अच्छा है ना तुम सा कोई प्यारा यू नजरे ना फैरो तुम मेरे हो मेरे तुम जय सियाराम हो मेरे।

जय माँ सीता

जय श्री राम

जय सिताराम

http://चित्रा की कलम से

4 thoughts on “सिखा गई सीता जीना कैसे है इस दुनिया मे हमे ( काव्य रचना )

  1. धन्यवाद जी,यह प्रसंग है ही इतना अच्छा मन से मनन करने पर उभर आया मेरे मन मस्तष्क पटल पर तो सोचा क्या ना आप सबको भी अपनी इस रचना मे सामिल करु यही सोच लिख डाली माँ सीता के दर्द भरी कहानी,जय सियाराम जी की बहन

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