अशोक वाटिका मे सीता का रावण से संवाद व्याख्या ( धार्मिक ज्ञानवर्धक लेख )

तृन धरी ओट कहति वैदेहि, सुमिरी अवधपति परम स्नेही।

भावार्थ जब रावण अशोक वाटिका मे आ कर सीता को भांति-भांति के लालच व डर दिखाने लगा तो माता सीता ने जो कहाँ—–

पद-सार——— तृन धरि ओट यानि की घास-फुस की बनी झोपडी मे सीता रहती थी। ( तृन-घास-फुस,लकडी से बनी कुटिया मे तृन के ही दरवाजे को ढक कर उसके ओट करके दरवाजे के भीतरी साईड ) जब रावण आया तो माता सीता ने अपनी घास की कुटियाँ पर दरवाजा ढक कर कुटिया के भीतर बैठ गई। रावण के आने पर सीता अपनी कुटियाँ मे बैठी परम स्नेही श्री राम का ध्यान करने लगी। उन्होने रावण की छाया भी अपने तन पर नही आने दी थी।

सीता एक सति व्रत धारी नारी थी। वह तन-मन से श्री राम के अलावा किसी भी पुरुष को भी अपने समीप नही लाती थी। इस लिए जब वे रावण को अशोक वाटिका मे आते देखती तो झट से अपनी घास-फुस से बनी कुटिया मे चली जाती थी और कुटिया पर घास-फुस से बने दरवाजे को ढक देती थी। इसी लिए कहाँ तृन धरी ओट वैदेहि ( माता सीता वैदेह राज्य की राजकुवरी थी। इस लिए वैदेहि भी कहाँ जाता है माता सीता को ) पर इसका फिल्मांकन बेहुदी भरा कि सीता एक पेड के नीचे तीनका हाथ मे लेक बैठी दिखाया जाता है।

भला महिनो तक कोई एक पेड के नीचे बैठा रह सकता है क्या कोई। सर्दी, गर्मी, बरसात, आँधी, तुफान सब आते-जाते रहते है। प्रकृति अपना क्रम बदलती रहती है। दुसरी बात रावण एक राजा था तो क्या उसके पास इतनी भी हैसियत नही थी कि वह सीता के लिए एक महल तो ना सही कुटिया भी ना बनवा सकता था। केवल अपनी मनोपोली साबित करना मात्र है। श्री राम की सारी लीला एक साधारण प्राणी की तरह की थी, पर आजकल उसमे तेल-मिर्च डाल तडका लगा कर फिल्मो व सिरीयलो को तीखा करने के चक्कर मे अर्थ का अनर्थ करते है।

सठ सूने हरि आनेहि मोही, अधम-निलज लाज नही तोहि।

भावार्थ———- माता सीता रावण को उसकी बातो से व्यथित हो कर सामने से जबाव देती है कि ,हे,दुष्ट पापी, अधम ( नीच जोनी,पशु ) निल्लज ( बेशर्म ) हे पशु तुल्य बुद्धि के बेशर्म इंसान तुझे जरा सी भी शर्म नही है। तुम निर्लज ( बेशर्म ) हो, तुम्हे शर्म नही आती कि तुम एक अबला जो कि किसी की पत्नि है, उस पर अपनी दुर्बुद्धि रखते हो। तुम अपनी इच्छापूर्ति मे इतने गीर चुके हो, कि जो तुम्हे मर्यादा का भी ज्ञान ना रहाँ।

दुसरे की विवाहीता को माँ समान समझना चाहिए पर तुम ने सारी लज्जा को छोड दिया। तुम जानते हो कि मै राम के संग विवाहीता हुँ। फिर भी तुमने मुझे अपनी रानी बनाने के ख्वाब देखना शुरु कर दिया। तुम्हे तुम्हारे गुनाहो की सजा जरुर मिलेगी। मेरे प्राण-प्रिय श्री राम शीघ्र ही यहाँ आयेंगे और मुझे वापस ले जाएंगे। सीता ने अपने वचनो के माध्यम से रावण को स्पष्ट शब्दो मे कह दिया कि मुझे श्री राम के अतिरिक्त किसी अन्य मे कोई रुची नही।

विशेष———– हिन्दी और संस्कृत भाषा ज्ञान का भंडार है। जितना चाहो इसे बढा सकते हो। हमारे सभी शास्त्रो पर लाँखो विद्वानो,संतो ने अपनी-अपनी व्याख्या कर रखी है। बस आज लोग पढने मे रुची नही रखते। व्यर्थ मे ढकोसँला मात्र करते है पढे-लिखे होने का तभी अँग्रेजी ही पढनी है,जब्कि अंग्रेजी मे कोई व्याख्या नही मिल सकती। हिन्ही मे बहुत सी व्याख्या मिल जाती है। इस लिए हिन्दी पढने वाले ही ज्ञान पा सकते है। अंग्रेजी मे केवल ग्रंथ की नकल भर की गई थी।

असल मे तो संस्कृत व हिन्दी मे ही ज्ञान भंडार मिल सकता है। हिन्दी मे बहुत सी टिकाए हमारे ग्रंथो को विद्वानो ने अपनी बुद्धि सामर्थ्य से उन पर व्याख्याए की है। आजकल पुस्तक पढता ही कौन है। किसी के पास इतना धैर्य नही जो घण्टो बैठे। बस छोटे-छोटे भाग मे पढना चाहते है सब। पुस्तक ओनलाईन भी मिलती है कोई उन पुस्तको को ना पढना ही भलाई समझते है। बहुत से लोग क्या करते है जो पुस्तक लिखते खुद का कोई ज्ञान नही होता इधर-उधर से चुराया और पुस्तक बना डाली। ठेरो पुस्तके मिल जाती ओन लाईन हिन्दी मे अंग्रेजी मे जिस भी भाषा मे चाहो। आज पुस्तको का जमाना गया कई दुकनदार तो अपनी दुकाने बंद कर गए घाटे के कारण।

जय श्री राम

http://चित्रा की कलम से

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