अँगुलीमार ( ज्ञानवर्धक कहानी )

कहानियाँ ऐसी जिसमे ज्ञान और प्रेरणा दोनो का समावेश हो, तो वह कहानी आदर्श होती है। ऐसी कहानियो को पढ कर हम शिक्षा प्राप्त करते और जीवन को सुख से जीने की कला जान पाते है। हर कहानी कुछ कहती है, मगर ज्ञान वर्धक कहानियाँ हमे जरुर पढनी चाहिए ताकि हम भविष्य को उज्जवल बना सके। अधिक ना कहते हुँए, चलते है अपनी अगली ज्ञान यात्रा मे जिसमे एक ज्ञानवर्धक रोचक कहानी हमारा इंतजार कर रही है। कहानी के शिर्षक से ही पता चल गया होगा आपको कि आज हम अँगुलीमार की पंचतंत्र की इस कहानी को पढ कर आनन्द लाभ लेगे।

बात बहुत पुरानी है। यह वह समय था जब महात्मा बुद्ध ने घरती पर ज्ञान प्रचार हेतु भ्रमण करके ज्ञान प्रचार किया था। लुम्बनी गणराज्य मे उस समय एक बहुत ही कुरुप बालक पैदा हुआ। देखने मे बहुत भयावय लगता था। जो भी उसे देखता उससे डर जाता था। जब वह बालक कुछ बडा हुआ घर की दहलीज लांघ पाठशाला पढने गया। वहाँ उसके साथ के सभी बालक उसका बहुत उपहास किया करते। यहाँ तक की कई बार तो वे बालक उसे इतना पीटते की वह बुरी तरह लहु-लुहान हो जाता था। कोई भी उसके साथ बात-चित नही करता था। सब उसे परेशान करते मजाक बनाते।

वह बालक बहुत भोला था। उसे अपने साथ हो रहे अन्याय का बदला लेना नही आता था। वह दुनिया से सताये जाने के भय से जंगल मे ही छुप कर रहता था। जब रात का समय होता तो वह खाने-पिने की खोज मे निकलता और दिन निकलने से पहले ही जंगल मे छुप जाता था। पर वहाँ भी आने-जाने वाले पथिक उसका उपहास बनाते। उसको चोट पहुंचाते। वह इस तरह लोगो के अन्याय पूर्ण रवईये से तंग आ गया था। उसके मन मे भारी पीडा ने घर कर लिया था।

अब अपने मन आत्मा पर पडे लोगो के बोलो व्यंगो को सहन करने की क्षमता वह धिरे-धिरे खोने लगा इस लिए वह दुनिया से बदला लेने के लिए उनका सामना करता। जब वह कही जाता तो लोग उसे देख कर उपहास करते उसकी तरफ अँगुली दिखा कर हँसते। उसका मजाक बनाते। एक दिन वह दुनियो के उपहास से तंग आ कर जब यात्री वहाँ से जाते समय उसकी तरफ अपनी अँगुली करके उसका मजाक बना रहे थो,वह क्रोध-वश उन लोगो के पिछे भागा और उनके संग वह भी मार-पीट करने लगा। तभी उसके हाथ मे एक धारदार पत्थर था। उस पत्थर से उस कुरुप बालक ने हथियार के रुप मे उपयोग करते हुए। एक व्यक्ति कि अँगुली उस धारदार पत्थर से प्रहार करके उसकी अँगुली को काट दिया।

जब उस कुरुप बालक ने जिसकी अँगुली काटी वह व्यक्ति अँगुली कटने के दर्द से बेहाल होकर चिक्खने-चिल्लाने रोने लगा। उसको रोते देख उस कुरुप बालक को बहुत सकून मिला वह बहुत खुश हुआ। अब उसने कटी हुई अँगुली को उठा कर अपने संग ले गया। इस तरह उस बालक को पता चल गया था, कि कोई उसे परेशान करे उसका उपहास उडाए तो कैसे उनसे बदला लिया जा सकता है। अब तो जो भी पथिक जंगल से गुजरता उस बालक का उपहास करता वह बालक उसको पकड कर पीटता और उसको तर्जनी अँगुली काट कर अपने पास रख लेता। जब अँगुली कटने पर कोई तडपता तो उस बालक को बहुत सकून का अनुभव होता।

बस इसी तरह वह एक मा

मासुम बालक से अँगुली मार डाकु बन गया। लोगो मे धिरे-धिरे उस अँगुली मार का भय व्याप्त होने लगा। लोग उस अँगुलीमार के कारण जंगल से यात्रा करने पर डरते थे। लोगो ने उस बालक का नाम ही अँगुलीमार ही रख दिया था। अँगुलीमार का इतना भय था कि लोग जंगल मार्ग से यात्रा करने मे कतराने लगे थे। बहुत ही मजबुरी होती तभी लोग जंगल के मार्ग से यात्रा करते। अब तो वह लोगो को मार कर उनकी अँगुली काट लेता और उन अँगुलियो को बांध कर अपने गले मे हार बना कर पहन लेता। इस तरह उसके गले मे हजारो अँगुलियाँ पडी रहती। वह लोगो की वह अँगुली जो पहले उपहास करते उठती कि वह देखो कितना बदसुरत है।

इस तरह लोग अपनी पहली अँगुली (तर्जनी ) उठा कर उसका उपहास करते। अब वह अजनबी लोगो को भी मार कर उनकी तर्जनी अँगुली काट कर अपने गले मे धारण करता जाता। अब उसके गले मे अँगुलियो से बनी माला सब लोगो को भयभीत करती थी। आस-पास के गाँवो के लोग जिनको उस जंगल से गुजरना होता था डरते हुए कहते कही मार्ग मे अँगुलीमार ना आ जाए। इसी तरह उसकी चर्चा दुर-दुर तक फैल गई कि जंगल मे एक अँगुलीमार रहता है। जब वह किसी के सामने अगर आ भी जाता तो लोग डर कर वहाँ से भाग जाते थे।

एक दिन महात्मा बुद्ध ज्ञान प्रचार के लिए उस जंगल से गुजरे तो अँगुलीमार ने छुप कर उनपर हमला किया। जैसे ही अँगुलीमार हाथ मे धारदार पत्थर ले कर महात्मा बुद्ध के सामने आ गया। महात्मा बुद्ध संत थे। वह उसे देख कर जरा भी विचलित नही हुए। वह उस अँगुलामार से डरे भी नही थे। अँगुलीमार जैसे ही उनके सामने आया तो उनके चेहरे से निकलने वाले तेज ( चमक ) से चकाचौंध सा हो कर घबरा कर सहम गया। वह इस बात से भी घबराया कि अब तक तो जो भी लोग उसके सामने आने पर उसका उपहास उडाते थे। उसको अपशब्द कहते थे उसके सामने आते ही डर जाते थे या भाग जाते थे। मगर यह कैसा इंसान आया है, इस जंगल मे कि यह ना तो मुझ से डर रहाँ और ना ही मुझे परेशान ही कर रहाँ है।

यह तो एकदम शांत है। वह अँगुलीमार महात्मा बुद्ध के प्रभाव मे आ गया। वह बुद्ध से बोला तुम कौन हो। तुम्हे पता नही कि इस जंगल मे मै रहता हुँ। लोग तो मेरे नाम से ही डर जाते है। एक तुम हो जिनके सामने मै आकर हमला करने के लिए खडा हुँ, तुम हो की शांत-चित खडे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हो। पता नही क्यो मेरे साथ यह पहली बार हुआ कि, जिसे देख कर मेरे मन मे किसी प्रकार का क्रोध उत्पन्न नही हुआ। मै तुम्हे देख कर हैरान हो रहाँ हुँ। अरे शांत-चित पुरुष तुम कौन हो। उसकी इन बातो मे और उस के चेहरे पर हैरानी के भाव महात्मा बुद्ध ने पढ लिये थे। महात्मा बुद्ध ने उस अँगुलीमार के सिर पर प्यार से हाथ फैरा इस से अँगुलीमार के मन को बडी शांति का अनुभव हुआ कि यह मुझ जैसे बदसुरत इंसान को प्यार कर रहाँ है।

इससे पहले अँगुलीमार के सामने ऐसा कोई नही आया जो उसे प्यार मे नहला दे। महात्मा की उपाधि उसे ही दी जाती है, कि जिसके मन मे सब के लिए प्रेम-स्नेह बरसता रहता है। वह कभी किसी का उपहास नही करते। अब महात्मा बुद्ध ने शांत भाव से उसे अपने पास बैठाया। वह उस अँगुलीमार को कहने लगे वत्स ( बडो के द्वारा छोटो को सम्बोधन ) मै भला तुम्हारा उपहास क्यो उडाऊंगा। तुम तो बहुत प्यारे हो। मुझे तो तुम पर प्यार आ रहाँ है। तुम मुझे बहुत भले इंसान नजर आ रहे हो। मुझे दुनिया मे कोई भी बुरा नही लगता तो फिर तुम कैसे बुरे लग सकते हो। जब उस विधाता ने इस दुनिया को बनाया है, तो हम कैसे उसकी बनाई रचना को बुरा कह सकते है। विधाता ने किसी को भी बुरा नही बनाया। वह तो सबको समान ही बनाते है।

यह दुनिया ही उसे अच्छे-बुरे के भेद मे डाल देती है। देखो मुझे ध्यान से मेरे कितने हाथ,पैर,आँख,नाक,कान है। उस अँगुलीमार ने कहाँ दो हाथ,दो नाक इस तरह जब उसने कहाँ तो महात्माबुद्ध ने उस अँगुलामार से कहाँ वत्स अब तुम मुझे अपने हाथ,पाव आदि की गिनती करके बताओ तुम्हारे कितने हाथ पाव है। अब अँगुलीमान ने कहाँ मेरे दो हाथ,दो पाव है। महात्मा बुद्ध ने तब उसे प्यार से समझाया बालक देखा कि मुझ मे और तुम मे उस विधाता ने कोई भेद नही रखा सबको समान ही बनाया है। तुम तो दुनिया मे सबसे अच्छे इंसान हो। एक मासुम सा दिल है तुम्हारा। अँगुलीमार ने कहाँ मै मासुम कहाँ हुँ मै तो लोगो को मार देता हुँ।लोग मुझसे डरते है। मुझे बुरा इंसान बताते है।

अब महात्मा बुद्ध ने कहाँ कोई क्या समझता है या कोई क्या कहता है। इससे किसी के मन की अच्छाई-बुराई प्रकट नही होती। एक अच्छा मन ( मासुम ) निर्दोष पर अत्याचार नही करता। उन लोगो ने तुम्हे सताया तुम ने भी बदले मे उनकी भाषा मे उनको जवाब दिया। अगर तुम मासुम ना होते तो मेरे सामने आने पर तुम मुझे भी मार देते। मुझे देख कर तुम्हारे हाथ ना काँपते। मेने तुम्हे कुछ नही कहाँ तो तुम्हारे मन के भीतर क्रोध जागृत नही हुँ। इस लिए जो तुम्हे सताते रहे उन पर तुमको क्रोध आया। महात्मा बुद्ध की यह बात सुन कर अँगुलीमार की आँखो से टप-टप अश्रृ-धारा बहने लगी। अँगुलीमार ने अपने को बुद्ध के चरणो मे न्योछावर कर दिया। वह रो कर अपने मन का दर्द हल्का करने लगा। जब उसका रोनो शांत हुआ तो बुद्ध बोले यह जो अश्रृ तुम्हारी आँखो से बहे है। यह दुसरो द्वारा तुम्हारी आत्मा को पीडित करने का स्पष्टिकरण दे रहे है।

देखा लोगो ने तुम्हे सताया तो तुम्हारी आत्मा कितनी दुखी हुई। इसी तरह जब लोगो पर क्रोध के कारण तुम उन पर हमला करते हो तो उनकी आत्मा को कष्ट होता है। दुसरो के अत्याचारो से तुम्हारी आत्मा दुखी रहने लगी है। अँगुलीमार बुद्ध की सभी बाते ध्यान से सुन रहाँ था। उसने बुद्ध के पैर पकड लिये,वह कहने लगा कि अब मुझे जो आत्मिक सुख मिला है। यह आत्मिक सुख मुझे सदैव मिलता रहे इसके लिए मुझे क्या करना पडेगा। बुद्ध ने समझाया कि तुम इन अँगुलियो की माला को उतार फैंको। दुनिया कुछ भी बुरा भला कहे उन्हे मन मे मत रखो अपनी मस्ति मे रम जाओ। तुम वही करो जिससे तुम्हारी आत्मा को सकून मिले। इसके लिए अपने मन मे सब के प्रति प्रेम भाव रखो कोई बुरा कहे कहने दो ऐसा करके वह अपनी आत्मा को चोट पहुचा रहाँ है। बुद्ध ने कहाँ आज के बाद तुम कभी भी दुसरो को नही मारोगे।

तुम अपना सारा ध्यान नेक कर्म करने मे लगाओ। दुसरो का भला करने पर हमारा लाभ यह है कि इससे हमारी आत्मा को शांति व सकून मिलता है। हम किसी का भला करे या ना करे पर दुसरो का बुरा करने से सदैव बचे। अब तुम्हे प्राश्चित करना चाहिए, क्योकि तुमने बहुत से लोगो को मार कर पाप किया है। इसके लिए तुम्हे प्रभु भक्ति करनी चाहिए। भगवान मे अपने को रम्मा लो। अब अँगुलीमार की समझ मे सब आने लगा। उसने महात्मा बुद्ध से कहाँ मै आपकी शरण मे आने को तैयार हुँ। मुझे आपके उपदेश बहुत अच्छे लगे। मै एक नेक इंसान बनना चाहता हुँ। अब वह महात्मा बुद्ध की संगति मे रहने लगा। वह उनके संग ज्ञान प्रचार के लिए नगर-नगर भटकने लगा। बुद्ध के मार्ग मे पडे कांटे हटाता ताकि कोई कांटा उनके पैर मे बिंध ना जावे। वह उनके लिए भोजन की व्यवस्था करता। उनसे ज्ञान प्राप्त करता। दुसरे के हीत मे लग गया।

देखा आपने संगति इंसान मे कितना परिवर्तन लाती है। तभी तो बडे बुजुर्ग यह कहते है कि नेक संगति मे उठना-बैठना रखो। जैसी संगति मे रहोंगे वैसे ही आप बन जाओंगे। शायद यह अँगुलीमार ही महात्मा बुद्ध का पहला अनुयायी ही होगा। अपनी आत्म शुद्धि के लिए अच्छे कर्म करो, दुष्टो,पाखँडियो,दुराचारियो,आतंताईयो से सदैव दूरी बनाओ। इसी मे भलाई प्रतीत होती है। यह इस कहानी की प्रमुख सिख है।

जय श्री राम

जय जय माँ शारदा

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