शिव के बारह ज्योतिरलिंगो के दर्शन,वर्णन

आज महाशिवरात्रि के इस पावन पर्व पर एक नजर प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंगो के बारे मे तो चलीए दर्शन करने आईए यात्रा शुरु करे।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग ———-

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात के काठियावाड मे समुन्द्र के किनारे स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की बहुत मान्यता है। लाको लोग श्रृद्धापूर्वक यहाँ दर्शनो को आते है। इस मंदिर को कई बार भग्न किया गया। विदेशी आक्रमणकारियो ने इस लूट कर तौड फोड करके जीर्ण-शिर्ण किया मगर इसका बार-बार पूर्णोद्धान किया गया। लगभग सोलह बार आक्रमण झेला इस मंदिर ने।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी ——- इस मंदिर को सर्वप्रथम चंद्रदेव ने स्थापित किया था। चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की सत्ताईस कन्याए थी उन सभी का विवाह दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव के संग कर दिया। इन सत्ताईस कन्याओ मे रोहणी नाम की दक्ष कन्या सबसे सुन्दर थी इस लिए चंद्रदेव को वह अधिक प्रिय थी। रोहणी से अधिक प्रेम होने की वजह से चंद्रदेव सदैव रोहणी के संग ही रहते और अन्य छब्बीस पत्नियो को वे समय नही देते। वे अपना सारा प्यार रोहणी पर लुटाते। इस बात से उनकी अन्य सभी पत्नियाँ खिन्न रहती। एकबार वे सब अन्य चंद्र पत्नियाँ जब अपने पिता को मिलने गई तब उन सबने अपनी व्यथा अपने पिता दक्ष को बताई। दक्ष ने चंद्रदेव को बुला कर समझाया कि एक पति का कर्त्वय होता है कि वह अपनी पत्नि की जरुरतो को पुरा करे। पत्नि को सदैव खुश रखे। मगर तुम अपना सारा ध्यान व समय केवल रोहणी पर लगाते हो अन्य पत्नियाँ भी पति प्रेम की अधिकारिणी है तुम्हे उनको भी उनका हक देना चाहिए सभी पत्नियो पर समान स्नेह रखना चाहिए। चंद्रदेव ने उस समय कह दिया ठिक है मै सदैव सभी पत्नियो को खुश रखुंगा। मगर वे जब भी एकान्त मे जाते उनके मन मे केवल रोहणी ही रहती इस लिए वह रोहणी को अपने से एकपल भी दुर ना करते। इसका नतीजा यह हुआ कि समझाने पर भी चंद्रदेव ने अन्य पत्नि की परवाह नही करी इस लिए दक्ष को चिन्ता और दुख हुआ। इस कारण उन्होने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि उद्दण्डी हो तुम्हे मै छिन्न होने का श्राप देता हुँ। इस श्राप के कारण चंद्रदेव छिन्न ( कमजोर ) क्षय रोग के शिकार हो गए। वे दिन प्रदिन कमजोर होते चले गए। इस लिए चंद्रदेव ब्रहमा जी के पास गए और उन्हे अपने पर लगे श्राप की कहानी सुनाई ब्रहमा जी ने कहाँ तुम्हारा यह श्राप भगवान भोलेनाथ ही कम कर सकते है। भगवान भोलेनाथ की तपस्या मे लीन होने के कारण तुम उनसे बात नही कर सकते और इस लिए तुम्हे भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करना होगा। ब्रहमा ने उनको विदी बताई कि किस प्रकार पूजा-अर्चन करके शिव को प्रसन्न कर सकते है। चंद्रदेव ने मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण किया और उनकी भक्ति करने लगे। उन्होने निरहार रह कर शिवलिंग की सेवा करनी शुरु करी। वे महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते उनकी भक्ति सफल हुई और शिव जी वहाँ प्रकट हो गए चंद्रदेव को अमरता का वरदान दिया फिर चले गए। इस तरह शिव की कृपा से चंद्रदेव का वह क्षय रोग कट गया। वह धिरे-धिरे तंदुरुस्त होते गए। सोमनाथ का शिवलिंग मान्यतानुसार वही शिवलिंग है जिसे चंद्रदेव ने बनाया और पूजन किया। शिव को प्रसन्न करके वहाँ प्रकट किया। बस शिव के चरणो की धुली यहाँ पडी और यह स्थान व शिवलिंग पावन बन गया।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग ——–

मल्लिकार्जुन ज्योतिलिंग दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश मे कृष्णा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ शिव व पार्वती दोनो सयुक्त रुप से स्थित है।

मल्लिकार्जुन की कहानी ————

जब गणेश और कार्तिक मे घरती की परिक्रमा की शर्त लगी तो गणेश ने युक्ति से माँ पार्वती और पिता शिव को साथ बैठा कर उनकी परिक्रमा करके शर्त जीत ली। माँ घरती का अंश होती है और पिता आकाश तत्व का अंश होते है। इस लिए वह शर्त जीत गए। कुमार कार्तिकेय घरती की परिक्रमा निकाल कर लौटे तब तक गणेश शर्त जीत कर विवाह बंधन मे बंध चुके थे। कार्तिकेय ने कहाँ मेरे संग छल हुआ गणेस तो कैलाश से गया भी नही और शर्त के मुताबिक विवाह इसका कैसे हुआ। तब शिव पार्वती ने उसे समझाया कि बैटा माँ भी हमारी घरती ही होती है जो हमे पेट मे पालती है और पिता भी आकाश की भांति सदैव अपनी संतानो को अपनी छत्र छाया मे रख कर पालन पाषण करता है। इस लिए माँ और पिता की परिक्रमा करके गणेश जीत गए। पर कुमार कार्तिकेय माता पिता से रुष्ट हो कर उनसे दुर चले गए। जब माँ पार्वती और पिता शिव कार्तिकेय को मानाने और पुन्ह कैलाश पर ले जाने उनके पास गए तो कार्तिकेय और दुर घरती पर आ गए। बस उसके पीछे शिव-पार्वती भी घरती पर आये और सयुक्त रुप मे शिव लिंग मे अपनी शक्ति को समाहीत कर दिया। इस तरह पुत्र प्रप्ति के लिए शिव पार्वती ने शिवलिंग का रुप लिया।

इस तरह देखा जाए तो संतान प्राप्ति की ईच्छा वाले लोग यहाँ मनत मांगने आते होंगे

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग ———–

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य-प्रदेश के उज्जेन जीले मे क्षिप्रा नदी के तट पर बना हुआ है। इस उज्जेन मे विराजमान महाकालेश्वर शिवलिंग पर लाश की ताजी वभूति से इसका श्रृँगार होता है। यहाँ लाखो लोग दर्शनो के लिए आते है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की जानकारी——- चंद्रगुप्त विक्रमादितीय उज्जेन पर शासन करते थे। विक्रमादित्य यहाँ देश व प्रजा की कुशलता की कामना से पूजन अर्चन करने हेतु इस शिवलिंग का निर्माण करवाया होगा। राजा विक्रमादित्य के राज कवि नवरत्न वेताल-भट्टारक ने एक ग्रन्थ लिखा जिसमे विक्रमादित्य और वेताल की पच्चीस कहानियाँ है इन कहानियो से विक्रमादित्य की न्याप्रियता का पता चलता है। यह ग्रन्थ संस्कृत मे रचित किया गया इसका नाम ( वेतालपंचविंशतिका )

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

ऊँकारेश्वर ( औंकारेश्वर )ज्तियोर्लिंग ———

ऊँकारेश्वर ज्योतिलिंग भी मध्य प्रदेश मे नर्वदा नदी मे स्थित है। यह मंदिर औंकार ( ऊँ ) की आकृति मे बना हुआ है इस लिए इसे औंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग कहते है।

औंकारेश्वर ( ऊँकारेश्वर ) ज्योतिर्लिंग की जानकारी—— मध्य प्रदेश मे नर्वदा नदी के किनारे राजा मान्धाता ने शिव की तपस्या करी थी और शिव से वहाँ रहने का वरदान मांगा था। मान्यनुसार तब से शिव औंकारेशवर ज्योतिर्लिंग के रुप मे विराज मान हो गए।

औंकारेश्वर ( ऊँकारेश्वर ) ज्योतिर्लिंग

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग ———

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्ताखण्ड की पर्वत श्रृंखला मे स्थित है। केदारनाथ चार थामो से एक है। यह मंदिर अप्रेल से नबम्र के मध्य ही दर्शनार्थियो के लिए खुलता है। बाकि समय बर्फ से पहाड ढकने के कारण आमजन को आने-जाने के लिए रास्ते बंद होने से और पहाडियो के टुटने के कारण बन रखा जाता है।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग जानकारी ——— माना जाता है कि पांडवो ने अपने कुटुम्बीजनो को युद्ध मे मार दिया था उसका प्राश्चित करने वे पहाडो पर आ कर रह कर शिव की भक्ति करने लगे। इस मंदिर का निर्माण उन्होने करवाया होगा।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग ———

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र मे सहाद्री की पहाडियो मे भीमा नदी पर स्थित है।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की जानकारी ———- कुम्भकरण का पुत्र भीम जो कि कुम्भकरण की मृत्यु के बाद पैदा हुआ था। वह राम को पिता का हत्यारा मानता था। इस लिए उसने ब्रहमा से तपस्या करके वरदान मांगा और वह देवताओ को सताने लगा देवताओ की रक्षा के लिए शिव ने उस भीमा को मार दिया। उस स्थान पर शिव प्रकट हुए थे इस लिए देवताओ ने वहाँ शिव का धाम बना दिया। तभी से यह स्थान भीमाशंकर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

काशीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग ———

काशीविश्नाथ ज्योतिर्लिंग उतरप्रदेश मे वाराणसी मे गंगा घाट पर बसा हुआ है। यह प्राचीन मंदिर है।

काशीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की जानकारी——–इस मंदिर का वर्णन ऋृज्ञवेद मे भी मिलता है। यह नगरी शिव को अत्यधिक प्रिय रही है। इस लिए शिव ने अपनी शक्ति यहाँ स्थापित कर दिया। यह प्राचीनकाल मे एकजनपद था। इसका राजनीतिज्ञ महत्व रहाँ है। यहाँ जगदगुरु आदिशंकराचार्य ने अपनी तपोभूमी के रुप मे स्थापित किया था।

काशीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ——–

त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक नामक शहर के समीप स्थित है।

त्र्यंकेश्वर ज्योतिर्लिंग की जानकारी ——— त्र्यंकेश्वर ज्योतिर्लिंग मे तीन छोटे-छोटे शिवलिंग बने हुए है। यहाँ त्रिदेवो को स्थापित किया गया है। त्रिदेव ब्रहमा,विष्णु,महेश तीनो के शिवलिंग है।यह मंदिर तीन पहाडियो ब्रहमगीरी,नीलगीरी,गंगा द्वार। तीनो देवो का निवास यहा होने के कारण इस स्थान का नाम त्र्यंकेश्वर पड गया।

त्र्यंकेश्वर ज्योतिर्लिंग

वैदनाथ ज्योतिर्लिंग ———–

वैधनाथ ज्योतिर्लिंग झारखण्ड के संथाल नामक स्थान मे स्थित है। यह शिव का प्रिय स्थान है।

वैधनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी———- एकबार रावण ने शिव को तपस्या करके प्रसन्न किया और अपने साथ वह उन्हे लंका मे ले जाने को राजी किया शिव ने एक शिवलिंग मे अपनी शक्ति समाहित कर दी रावण वह शिवलिंग अपने साथ आकाश मार्ग से ले जा रहाँ था। रास्ते मे उसे लघु शंका से निवृत होने के लिए जाना पडा इस लिए वहाँ एक बालक खडा था रावण ने उसे वह शिवलिंग पकड कर रखने को कह कर सौप दिया और खुद शंका से निवृति पाने चला गया। शिवलिंग को ले जाते समय शिव ने रावण को हीदायत दी थी कि वह शिवलिंग जहाँ भी रख देगा वही पर वह शिवलिंग स्थापित हो जाएगा। इसी लिए वह शिवलिंग को पकडा कर गया था। रावण को आने मे थोडी देर लग गई वह बालक इतना भार सम्भाल ना पा रहाँ था तो उसने वह शिवलिंग वहाँ जमीन पर छोड दिया। रावण लौटा तो शिवलिंग जमीन पर देख कर बालक पर क्रोधित हुआ। उसने शिवलिंग को जमीन से उखाडने की बहुत कोशिश की मगर व्यर्थ गई। बस तभी से वह शिवलिंग वहाँ संथाल के नजदीक स्थान मे स्थापित हो गया।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग ———-

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात के शहर दवारका के समीप स्थित है। यहाँ शिव की 80 फुट ऊँची प्रतिमा भी है।

नागेश्वर ज्यातिर्लिंग की कहानी——— नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी एक शिव भक्त सुप्रिय से सम्बन्धित है। सुप्रिय शिव का अनन्य भक्त था। वह जब तक शिव की पूजा-अर्चना नही कर लेता था तब तक अन्न व जल ग्रहण नही करता था। वहाँ एक दारुक नामक दैत्य था वह सुप्रिय को पूजा करते देख सताया करता। एकबार क्रोधवश दारुक ने सुप्रिय और उसकी मंडली को पकड कर बंधी बना लिया। पर सुप्रिय डरा नही वह बंधी-गृह मे रहते हुए भी शिव की नियमित पूजा करता। इस से दारुक उसे मारने आया। सुप्रिय डरा नही पर अपने निर्दोष साथियो को बचाने के लिए शिव को पुकारने लगा। शिव अपने भक्त की करुण आवाज सुन उसके पास प्रकट हुए और उसे पासुपतास्त्र दिया कि वह दारुक को मार डाले। दारुक मर गया। सुप्रिय ने मरने के बाद शिव का धाम पाया। सुप्रिय की प्रार्थना पर वहाँ शिव प्रकट हुए थे इस लिए वहाँ शिव का घाम बन गया। इसका नाम नागेश्वर ज्योतिर्लिंग पडा।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग ——–

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तमीनाडु के रामेश्वरम शहर मे धनुषकोटी के समीप है। इसका प्रवेश दवार चालीस फुट ऊँचा है। यह कन्यकुमार के करीब है। यह मंदिर चार घाम मे से एक है। इसके तौरन व खम्मे आकर्षण का केन्द्र होते है।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की कहानी ———- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग को श्री राम ने स्थापित किया था। रावण से सीता वापस लाने के लिए श्री लंका जाने के लिए राम चंद्र जी ने समुंद्र के समीप के स्थान मे बैठ कर मिट्टी का शिवलिंग बनाया और पूजन किया। राम की पूजा से शिव व माँ भगवती दुर्गा का आशिर्वाद लिया। और समुंद्र पर पुल बांध कर लंका मे प्रवेश किया। रावण से युद्ध कर सीता को वापस ले कर अयोद्धया लौट गए।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग ——–

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र मे दौलतावाद के समीप स्थित है।

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी ——— भगवान शिव की एक भक्त घुश्मा की बहन के कोई संतान ना हुई तो वह अपनी बहन को अपने पति के संग ब्याह करके अपने घर ले गई। शिव की भक्ति से घुश्मा के पुत्र पैदा हुआ। घुसमा की बहन के मन मे घुश्मा से जलन होने लगी उसने एक दिन मौका देख घुश्मा के पुत्र को मार कर तालाब मे डाल आई। इधर घुश्मा इस बात से बेखबर थी,वह नित्य की भांति मिट्टी का शिवलिंग बना कर पूजा कर तालाब मे बहाने गई तो जब वह शिवलिंग विसर्जन कर रही थी तब तालाब मे से उसा पुत्र बाहर निकला माँ के चरण छुए वे दोनो घर लौट आए। अपनी भक्त पर कृपा करने शिव ने घुश्मा को दर्शन दिया। घुश्मा के आग्रह पर शिव वहाँ शिवलिंग मे अपनी शक्ति समाहीत करके सदैव के लिए वहाँ बस गए।

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग

शिव के इन बारह ज्योतिर्लिंग का जो सुबह शाम नाम लेता है उसके सभी पाप धुल जाते है। वह शिव के भक्तो मे सामिल हो जाता है।

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