बसर कर ली जीन्दगी हमने (काव्य रचना )

बसर करली जीन्दगी हमने यूही हालात का फसाना बन कर।
रह गई तमाम तमन्नाए हकीकत बन कर।
ब्यान करते है, हालात कि तुम मिली भी तो गुमनाम साये की तरह।
मजबुर थे तकदीर ने ही मिला दिया तुझको अफसाना बन कर।
चाहते बहुत रही मगर पल ना मिल सके, तुझे आजमाने को।
लडते रहे हर हाल मे अपने ही जज्बातो से।

बसर कर ली जीन्दगी हमने यूही हालाते फसाना बन कर।
जीन्दगी के हर मोड पर आजमाते रहे खुद को। पर मिली भी तो फसाना बन कर।
कब तक रहे कोई तेरी तलाश मे, मिली भी तुम मुंकबल जहान बन कर।
बसर करली जीन्दगी हमने यूही फसाना बन कर।


मालुम ना कि किश्मत को मंजूर ना होगा, अपने ख्यालो मे तुझे आजमाने को।
डरते रहे तमाम उमर कही छुट ना जाए अपना साया, हमसाया बन कर।
तु खुद पर इतराती रही इसलिए मंजील दुर जाती रही।
सहमे-सहमे से करते रहे इंजार तेरा, कि कब सवर जाओ मुकबल जहान बन कर।
बसर कर ली जीन्दगी हमने यूही फसाना बन कर।
बुन लिया था ताना -बाना अपने ख्यालो के जाल का, फस कर रह गई तमन्नाए तमाम अफसाना बन कर।
हकीकत कुछ और थी मगर हम सझते कुछ और रहे।
तमाम कोशिशे व्यर्थ गई ऐ जीन्दगी तुझे सबारने मे। रहा नसीबा अपना वही का वही। बसर कर ली जीन्दगी हमने यूही फसाना बन कर।,

( जीन्दगी भर इंसान अपनी तमन्नाए,ख्वाईशे पुरी करने मे लगा रहता फिर भी वह कभी मुकमबल नही होती )

3 thoughts on “बसर कर ली जीन्दगी हमने (काव्य रचना )

  1. वाह! बहुत खूब 👌🏼मुझें आपकी यह कविता पढ़ कर मेरी रचना
    जिंदगी
    😊
    बंद मुट्ठी रेत सी ये जिंदगी फिसलती गई
    आईने के सामने बनते संवरते हुए
    ये सूरते बदलती रही ।
    की याद आ गई अगर आप को समय मिले तो पढना ।

    Liked by 1 व्यक्ति

    1. आपका तहदिल धन्यवाद,हा जी आपकी इस रचना को मै जरुर देखुंगी। चार पंक्कितियो को पढ कर आन्द आया पुरी पढने मे कितना आनन्द आएगा

      पसंद करें

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