सभ्यता कल,आज,कल ( विचारणीय तथ्य )

भारतीय सभ्यता सबसे पुरानी सभ्यता है। हमारी सभ्यता के साथ पनपी पुरानी सभी सभ्यता लगभग खत्म हो गई मगर, हमारी सभ्यता बहुत लम्बे समय से संघर्ष करते- करते आज तक अपना असतित्व कायम करे हुए है। मगर आज जो युवा वर्ग मे भटकाव आने लगा है। इससे हमारी सभ्यता को गहरे गर्त मे जाते दिखाई पडता है। इसके लिए जिस तरह हमारे पुर्वजो ने हम तक पहुचाया है। हमे भी अपनी सभ्यता को सुरक्षित करने के लिए अपनी भावि पीढी को जरा सम्भाल कर कदम रखने की सलाह देना व मार्गदर्शन करना चाहिए।

प्राचीन भारतीय सभ्यता का पहला चरण ————–

लाख दो लाख साल पहले इंसान ने पैरो पर चलना सिखा। यानि इससे पहले शायद उसके पैर हाथ की हथेली के समान थे। लम्बी अँगुलिया और छोटी हथेली जो कि खडे होने और चलने मे सम्भव नही रही थी। केवल तब इंसान अधिक दुर की यात्रा नही करते होंगे। बस भोजन ढुढने भर तक चलना ही काम रहाँ होगा।धिरे-धिरे उन हथेली के समान हाथो ने सपाट होकर लम्बा होना शुरु किया अँगुलिया छोटी होती गई इस तरह पैरो का निर्माण हुआ होगा। इसके लिए हम डारवीन की थ्योरी को काम मे ले कि संघर्ष करते-करते शारिरीक संरचना मे परिवर्तन होता है।

ऐसा समझा जा सकता है कि पहले शुरु मे जब इंसान बना होगा वह केवल मास पर निर्भर करता रहाँ होगा। भुख भडी मास मिलना कम हुआ तो मास की जगह अब वह पेडो की फूल,पत्तियो व छाल को अपना भोजन बनाना शुरु किया।इस तरह से इंसान ने संघर्ष करना शुरु किया। माना कि वह अपने आगे के दो पंजो पेड की टहनियो को पकडना शुरु कर रहे होगे और नीचले दोनो पंजो ( हथेली नुमा पंजे ) पर खडे होने ऊँचाई को छुने का प्रयत्न करते होगे।

सालो तक चले इस संघर्ष से मानव के अगले पंजे हथेली नुमा ही रहे पर नीचले पंजे से संघर्ष करता रहाँ तो नतीजा यह हुआ कि उसके नीचले पंजे धिरे-धिरे लम्बाई लेने लगे और अँगुलिया कमजोर हो कर छोटी होने लगी। इस तरह हम इंसान जाति के पैर बने जिससे इंसान एक स्थान से दुसरे स्थान तक आने जाने मे सुगमता हो गई और आवागमन शुरु हुआ। अब पैर मिलते ही इंसान एक दुसरे इंसान के करीब होने लगा।

भोजन की तलाश मे वह समूह बना कर निकलने लगे। समूह से उन्हे सुरक्षा मिलने लगी। समूह मे रहने और भोजन पाने मे सुविधा होने लगी। इंसान परजीवी था पर जब शिकार मिलना कम हुआ तो वह फूल,पत्तियो को खाना सिख गया। फूल,पत्तियाँ उन्हे खाने मे स्वाद लगने लगी। इससे उन्हे अधिक मेहनत भी नही करनी पडती थी और ना ही किसी दुसरे इंसान या पशु द्वारा अपना शिकार होने का डर था। अब इंसान निर्भय हो गया।

इस तरह आपसी संघर्ष खत्म हुआ और मेल-जोल भडने लगा। यह स्थिति इंसान के लिए हीतकर साबित हुई। इससे इंसान कबीले मे संगठित हो कर रहना लगा। इसका लाभ कि अब भोजन पाने मे दिक्कतो का सामना नही करना पडता था। समूह मे अपने कबीलो के संग इंसान अब एक स्थान से निकल कर दुर स्थोनो मे पलायन लगे। अब वह छोटी सी भूमी मे सिमटा इंसान नही रहाँ वह बहुत दुर तक अपना फैलाव करने लगा। माना जाता है कि इंसान पहले अफ्रिका के घने जंगलो मे रहता था।

वहाँ से वह कबीलो मे निकला और यूरोप,युनान,अरब स्थलो तक फैलने लगा। लगभग 2 लाख साल पहले तक का समय इसी लिए रहाँ होगा। आज से लगभग 50 से 70 हजार साल पहले इंसान के शरीर पर एक विषेश बदलाव आया कि अब वह पहले कि तरह गूंगा नही रह गया था उसके बोलने की क्षमता प्राप्त हुई। वह बोलने लगा उसके शरीर मे बोकल कोड निर्मित हुई जिससे वह मुँह से आवाज कर शब्द ध्वनियाँ करने लगा। वह अब गूंगा नही था।

उसने बोलना सिख लिया था। देखा आपने लाखो साल के संघर्ष से पैर निर्मित हुई और फिर धिरे-धिरे आवाज भी मिल गई। इन दोनो अंगो के निर्मित होते ही इंसान मे जागृति आई। पहले इंसान कही भी किसी के भी संग समागम कर लेता था। वह निर्वस्त्र रहता था। देखा जाए तो उस समय इंसान भी पशुतुल्य बुद्धि और व्यवहार का था।

सभ्यता का दुसरा चरण ————-

सभ्यता का दुसरा चरण शुरु हुआ तो इंसान के पास चलने के लिए पैर थे। बोलने के लिए आवाज थी। अब वह भोजन मे बदलाव भी कर चुका था,यानि वह मास खाना छोड पेडो के फूल पत्तियो को खाना शुरु किया जो कि मास से कही अधिक रसदार स्वादिष्ट तो थी ही इससे इंसान मे चेतना भी जागृत हुई। अब वह मास पर नही फूल,पत्तियो पर निर्भर होने लगा। धिरे-धिरे समय आगे बढता चला गया इंसान भी समय के अनुसार खुद को बदलता चला गया। वह अब पुरुष वह स्त्री का भेद समझ गया था।

इस लिए वह पुरुष व स्त्री एक दुसरे के संग रहना पसंद करने लगे। इन दोनो के बीच कोई तीसरा आता तो इन मे संघर्ष शुरु हो जाता था। यानि अब इंसान हर कही व किसी के भी संग समागम करना बंद हुआ।इस तरह स्त्री पुरुष के बंधन मे तीसरे के कारण संघर्ष नही हो इसके लिए कबीले के लोगो ने विवाह बंधन बनाया कि जो स्त्री पुरुष का जोडा विवाह से बन जाएगा उनके बीच अब तीसरा नही आ पाएगा। देखा आपने कि इंसान के नव निर्माण से चेतना और जागृति उत्पन्न हुई।

अब समाज मे व्यवस्था कायम होने लगी। अब तक इंसान ने बहुत विकास कर लिया था। वह अब नग्नावस्था मे नही रहता था। हा अभी उसने वस्त्र निर्मित करना नही सिखा था मगर पेड के पत्तो व छालो या मृत पशुओ की खाल से अपना तन ढकना शुरु कर दिया था। यह दुसरा चरण आधुनिक आदिवाशियो के जैसा ही था। जिसमे स्त्री पुरुष का विवाह बंधन, तन ढक कर रखना, समूह मे कबीले बना कर रहना। ये सभी गुण प्राप्त कर लिये थे। वह अब भोजन को बनाने के लिए उपज उगाने मे माहीर हो गए थे।

सभ्यता का तीसरा चरण ————–

सभ्यता का तीसरा चरण आते आते इंसान ने बहुत सारी सिद्धिया पा ली थी। वह सभ्यता से रहना जानता था। वह परिवार बना कर जीवन यापन करता था। कबीले के हीत के लिए उपाय करता था। एक दुसरे की मदद करना उनको अच्छा लगता था। अब जब इंसान परिवार मे रहता है तो इसे परिवार की सुविधा के लिए गांव व कस्वो की जरुरत महसूस हुई। इस लिए अब वह घुमतडू कबीलो के स्थान पर एक स्थान मे रहने वाले कबीले बन गए थे। इस तरह गांव, कस्वे बनने लगे।

इंसान के यह समझ आने लगा कि एक स्थान पर बस कर रहने से व्यर्थ की ऊर्जा खत्म ना करते हुए इस ऊर्जा को भोजन की व्यवस्था मे लगाया जाए तो बेहतर होगा। अब वह नदियो के किनारे अपने गांव बना कर रहने लगे। उन्हे खेती करना आने लगा था। खेती करके अनाज उगाने लगे इस के लिए वह नदियो के किनारे ही अपना डेरा डालने लगे। नदियाँ उन्हे आसानी से पानी मिल जाता था जो कि खेती के लिए बहुत आवश्यक था।

जब इंसान एक स्थान मे बस गया परिवार मे रहने लगा तो अब वह अपनी संतानो के भरण-पोषण के लिए मेहनत करके अनाज उगाने लगे । इन संतानो का लालल-पालण करना शुरु हुआ। परिवार पालण के लिए उपज की भी बढोत्री होना आवश्यक था। तो इंसान अधिक फसल उगाने मे जुट गया। जरुरत पुरी करने के लिए दुसरो पर भी निर्भर होने लगा। दुसरो से ले कर भी जीवन निर्वाह शुरु हुआ। बाद मे गाव बडे होने लगे तो इन गावो ने शहरो का रुप धारण कर लिया।

शहरो मे खेती के लिए जगह कम और निवास के लिए जगह अधिक लगने लगी तो शहरो मे खेती सम्भव नही थी। शहरो मे रहने वाले परिवारो को भोजन व कच्चे माल के लिए गावो पर ही निर्भर रहना पडता था। गावो व जंगलो से कच्चा सामान खरीदा जाता और उन कच्चे सामान से नये सामान निर्मित होते। इंसान ने कपडा बुनना भी सिख लिया था। इस तरह इंसान ने अब ऩई जींदगी जीना शुरु किया। वह माल की खरीद फरोक्त करके अपनी जरुरतो को पुरा करना चाहता था।

सभ्यता का चौथा चरण ————–

जब इंसान ने पशु-पालन,खेती करना व वस्त्र निर्मित करना शुरु किया तो उन्हे व्यापार करके अपने सामान को दुसरे शहरो व कस्वो मे बेचने की समझ उत्पन्न हुई। इस श्रृंखला मे गाव व जंगलो से कच्चा सामान खरीदा जाता। शहर मे उनको निर्मित किया उनसे सामान खरीद लेते और फिर थोडा लाभ ले कर उस सामान को दुसरे शहर व कस्वो मे बेच आते थे। जब इंसान ने व्यापार करना शुरु किया। उनको यह समझ आने लगा कि व्यापार करके बहुत सारा धन कमाया जा सकता है।

पहले व्यापार लेन-देन का व्यापार होता था। जैसे किसी के पास पशु बहुत है तो व उसके बदले अनाज,वस्त्र आदि खरीद लेता था। माना कि एक व्यक्ति ने बहुत खेती की उसकी उपज बहुत हुई कि वह अपना साल भर का भोजन जमा कर ले फिर भी बहुत सारा अनाज बच जाता है तो वह उसे रखने मे असमर्थ हो जाएगा। इस कारण वह अपनी अधिक उपज के बदले कोई दुसरा सामान ले लेता है। इसी तरह एक इंसान जिसे वस्त्र बनाना आता है, वह वस्त्र बना कर अपने परिवार का तन ढक लेता है, मगर फिर भी उसके पास बहुत वस्त्र पडे है।

अब उसे वस्त्र की नही अनाज की जरुरत है तो वह उन वस्त्रो को देकर किसान से अनाज ले लेता है। इधर किसान के पास अनाज बहुत है पर उसे परिवार के तन ढकने के लिए वस्त्र चाहिए तो वह वस्त्र निर्माता को अनाज देकर वस्त्र खरीद लेता है। इस तरह से शुरु मे व्यापार लेन-देन पर आधारित था।बाद मे जरुरते बढने लगी।

इस तरह इंसान को समझ आया कि इस लेन-देन से जरुरते पुरी नही होती तो उन्होने किसी वस्तु को माध्यम बनाया सामान खरीदने के लिए–जैसे समुंद्र मे मिलने वाली कोढी। अब कोढी के बदले व्यापार शुरु हुआ। इसके लिए एक कहाँवत बनी है कि कोढी सेर यानि एक कोढी के बदले एक सेर अनाज या वस्तु मिल जाती थी। गाय को भी वस्तु का मूल्य चुकाने मे उपयोग लिया जाता था। इस लिए जिसके पास जितनी अधिक गाय होती वह उतनी ही अधिक धनी होता।

सभ्यता का पांचवा चरण ————–

पांचवे चरण मे आते तक इंसान ने व्यापार करना सामान निर्मित करना सब सिख ही लिया था। कहते है ना कि मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसकी लालसा कभी खत्म नही होती। अब गावो,नगरो मे व्यापार बहुत होने लगा।इसी तरह निर्माण भी बहुत होने लगा। अब निर्मित सामान को बेचने के लिए नए स्थानो की जरुरत थी। इस लिए इंसान ने नई जगहो की तलाश शुरु की तब वह दुर बसे देशो मे अपना सामान बेचने के लिए खोज की वह कामयाब भी हुआ।

नई दुनिया दुसरे देशो मे अपना सामान ले जा कर बेचना इसके लिए व्यापारी नियुक्त किये जो अपने देश से निर्मित सामान को दुसरे देशो मे जाकर बेचने के लिए आवागमण करने लगे । जब दुसरे देशो मे सामान बेचना शुरु हुआ तो धिरे-धिरे समाज धनाढयता की सीढी पर चढने लगा। भारत एक समृद व शक्तिशाली देश बन गया। अब ज्ञान विज्ञान की तरफ बढने लगे।

सभ्यता का छटवा चरण शुरु हुआ ————

इस छटवे युग के शुरु होते-होते तक इंसान पुरी तरह विकसित व सुसंस्कृत हो गया था। ज्ञान अपनी चर्म सिमा पर था। वह लिखना-पढना सिख चुका था। अब सब काम लिखित मे शुरु हुआ। अभी तक इंसान खुद से संघर्ष करता- करता विकसित हुआ था। इस लिए अभी तक इंसान मे लुटने मार-काट करने की प्रवृति नही आ पाई थी। उस समय अपने सामानतर चलने वाली सभ्यता से व्यापार,ज्ञान,विज्ञान,नई तकनिको का आदान-प्रदान होता था।

आपस मे कोई भी सभ्यता लडाई करके प्रतिस्पर्धा मे नही आई थी। सभी अपने विकास मे लगे रहते व दुसरो को सहयोग देते थे। उस समय की खास सभ्यता मे पहली सभ्यता हमारी भारतीयसिंधु घाटी सभ्यता मोहनजोदाडो,हडप्पा, लोथल, आदि,मेसोपोटामिया की सभ्यता,सुमेरियन सभ्यता,मिश्र की सभ्यता यह बहुत विकसित थी और भी कई सभ्यता होंगी मगर इन सभ्यताओ के अवशेष मिले है।

सभ्यता मे सातवा चरण शुरु हुआ ————-

सभ्यता का सातवा चरण आने तक सभी सभ्यताए पुरी तरह से विकसित सभ्यताए थी। शायद इस लिए धन की लोलुप्ता बढ गई होगी तो तानाशाही भी चलने लगी होगी। बलशाली पुरे शासन को अपने हाथ मे ले लेते होंगे। अपनी मनमानी करते होंगे शायद पुरी तरह कहना मुम्किन नही क्योकि लिखित मे इसका कही वर्णन नही है। सभी सभ्याताओ मे हिन्दु देवी देवताओ के साक्ष्य मिले है। जैसे मेसोपोटामिया मे शिवलींग व रामायण के वर्णणन करते चित्र उकेरे हुए पत्थर मिले है।

सातवा चरण समाप्त होते- होते सभी सभ्यताए नष्ट होने लगी कही सूखा,कही बाढ इस तरह अचानक प्रकृति ने अपना रुख बदला सभी तरफ हा-हाकार के संग सभी सभ्यताए धिरे-धिरे खत्म होने लगी। यह सभी दृश्य देखते हुए भारत के राजा मनु ने हालात को भांप लिया था। सभी दुर देशो से अपनी सैना को भाग कर वापस आते देख राजा मनु जान गए थे कि अब सारी सृष्टि का अंत निकट है अब केवल भगवान ही सहायता कर सकते है।

इस लिए सभी जगह के हालात को देखते हुए राजा मनु ने एक योजना तैयार कि जितनी जल्दी हो सके हमे आने वाली मुश्वित से बचने का उपाय सोच लेना चाहिेए। उन्होने अपने संग के सभी विद्वानो को एकत्रित किया विचार मंथन शुरु हुआ। सभी ने मिल कर एक योजना तैयार की, कि अगर बाढ आती है और धरती उसमे डुबती है, तो इसके लिए इससे बचने के लिए एक विशाल काय बहुत ऊची व लम्बी एक नौका का निर्माण किया जाए जिसमे पुरा शहर समा जाए।

अब राजा मनु व उनके सहयोगियो ने पेडो को काट कर लकडिया एकत्रित की और उन लकडियो से नगर भर के सभी लोगो ने मिल कर एक विशालकाय नाव बना डाली। उस नाव पर बहुत सारा खाने पिने का सामान व अपने सारे पशुओ ( गाय,घोडे आदि )भी भर लिये। जब बहुत तेज मुसलाधार बरसात शुरु हुई पानी रुकने का नाम नही ले रहाँ था तो, सारी धरती बाढ से घीर गई थी चारो तरफ पानी ही पानी था। काले घनघोर बादलो के कारण दिन मे भी अँधकार हो रहाँ था।

अब राजा मनु ने समझ लिया कि अब यहाँ रुकने मे भलाई नही अपना सारा सामान व सभी नगरवासियो व विद्वानो की टिम ( ऋृषि-मुनियो ) सब को उस विशालकाय नौका मे भर कर नौका को एक व्हेल मछली के सींग पर नाग लपेट कर उससे नौका को बाध दिया अब नौका उस गहरे पानी मे तेरने लगी। इस तरह कई महिने बीत गए नौका तैरती रही। नौका तैरते-तैरते एक सूखे स्थल पर पहुच गई जहाँ बाढ नही आई थी।

वहाँ नौका को रुका लिया गया। कई महिने नौका मे रहते रहे और आस-पास के स्थलो मे भ्रमण करके, रहने लायक स्थान की खोज करते रहे। आखीरकार उन्हे गंगा,यमुना बे्सिन मे रहने लायक स्थान मिल गया नौका को वहाँ बाध दिया गया और गंगा,यमुना नदियो के किनारे अपने रहने के स्थान बना लिये गए।

राजा मनु और वह ऋृषि मंडली बहुत विदवान थी, कि उन्होने अपने संग बीज भी रख लिए थे नौका मे बैठने से पहले की जब बाढ रुक जाएगी तो नई फसलो को उगाने मे काम आएगें। अब गंगा के किनारे अपने खेत जोत कर उसमे अपने संग लाए बीजो का सिंचण किया। देखते-देखते वहाँ पुरा गाव बसा लिया। राजा ने अपनी प्रजा के संग वहाँ कई सालो राज किया। फिर अपनी संतानो उत्तानपात व प्रियव्रत को राज्यभार सौंप संयास ग्रहण कर लिया।

सभ्यता का आठवा चरण शुरु हुआ ———–

अब गंगा व यमुना के किनारे सभ्यता बसने लगी। धिरे-धिरे जगंलो से निकल कर बहुत सी नई सभ्यताए भी दुनिया मे बसने लगी। जिसमे यूरोप,युनान,अरब,रुस, एशिया, अफ्रिका आदि सभी नई सभ्यताओ ने अपनी बरचसव स्थापित करना शुरु किया। नई सभ्याताओ मे आपसी संघर्ष शुरु हुआ लुट-पाट, मार- काट होने लगी। एक सभ्यता दुसरी सभ्यता से संघर्ष करने लगी।

इधर भारतीय सभ्यता मे भी राजाओ की संताने नए स्थानो मे जा कर निवास करने लगी आवादी बढती चली गई। कई छोटे राज्य भारत मे पनप गए। इन सभी मे आपसी वैमनंस्य तनाव रहने लगा। विद्रोह होने लगे। एक राजा दुसरे राजा को हरा उसका राज्य अपने अधिन करके आगे बढने की होड मे लग गए। इस तरह शक्तिशाली कमजोर पर राज करने लगा।

कमजोरो को अपना गुलाम बना कर उनका शोषण करना शुरु किया। इस दौरान कई नए अविष्कार हुए। जिन सभ्यता ने नए अविष्कार किये, उसने अपने व्यापार के लिए दुसरी सभ्यताओ देशो पर आक्रमण करके अपना गुलाम बना कर उनका शोषण करना आरम्भ कर दिया। इसमे भी सबसे अधिक शक्तिशाली वही सबसे ज्यादा गुलाम बना गया।

सभ्यता का नवमा चरण शुरु हुआ ————

सभ्यता के नवमे चरण मे आते-आते भारत आपसी फुट और नई तकनिको से अनभिज्ञ होने के कारण विकासवादी ताकतो, देशो के चंगुल मे बुरी तरह फस गया। भारत मे विदेशो से कई आक्रमणकारी भारत आते भारत से लुट खसोट करते धन ले कर तोड-फोड करके लौट जाते। इस तरह भारत मे लुटपाट चलती रही। कुछ राजा आपस मे ही लडने मे मस्त थे, तो कुछ कमजोर थे, इस लिए वह आक्रमणकारियो से सामना करने मे असमर्थ रहे। इस तरह भारतीय सभ्यता विदेशी आक्रांताओ के हाथो लुटती रही।

सभ्यता का दसवा चरण शुरु हुआ ———— दसवे चरण आते तक भारत व दुनिया मे नव चेतना जागृक हुए नए अबिष्कारो मे उडन खटौले ( हवाई जहाज,ऐयरोप्लेन ) लौह पथगामिनी ( लौहे की पटरियो पर चलती गाडियो का बहुत से देशो और भारत मे बहुत से शहरो की यात्रा मे उन सब नव निर्मित साधनो से एक स्य़ान से दुसरे स्थानो पर आसानी से आवागमण होने लगा।

इसके चलते सामान तो आयात-निर्यात होता ही था साथ मे एक दुसरी सभ्यता के विचारो मे भी आदान-प्रदान होने से दुनिया मे जागृति हुई की किस तरह संघर्ष करके अपने पर राज करती दुसरी सभ्यता को उखाड फैंगना है। इस लिए दुनिया के कई देशो,विषेसकर भारत मे क्रांतिया शुरु हुई पहले क्रांतियो मे सफलता ना मिली मगर बाद मे संगठित रुप से नेताओ की मंडली गठन होने लगी और विदेशियो से आजादी पाने के लिए संघर्ष शुरु हुआ और अंत मे आते-आते विदेशी सांततो को उखाड फैंका और पुनः आजादी हांसिल कर ली। अब भारत आजादी की राह पर चल कर अपना नव विकास करने लगा।

सभ्यता का ग्यारहवां चरण शुरु हुआ ः-

ग्यारहवें चरण मे पहुचते तक भारत मे नव जीवन जागृति हो गई थी। ज्ञान,विज्ञान के क्षेत्र मे,शिक्षा-तकनिक के क्षेत्र मे, व्यापार के क्षे6 मे हर क्षेत्र मे नए विकास की लहर निकल पडी और भारत ने अपने नव गौरवशाली कार्य करके सारी दुनिया मे अपनी धुम मचा डाली। अब भारत भी विकसित देशो की श्रैंणी मे खडा है। देश-दुनिया सब जगह अपनी पहचान बना सका है। एक भारत नेक भारत।

पुरी दुनिया एक दुसरे के करीब आ गई। आज कोई स्थान ऐसा नही जहाॅ पहुच पाना सुगम ना हो। पुरी दुनिया की दुरी कम करने के लिए याता-यात के जाल बिछे है जिस से आवागमण हो सकता है। दुनिया मे कही भी आना-जाना हो आसानी हो गई है।आजकल तो इंटरनेट का अपना प्रभुत्व बन गया जिसके माध्यम हम अपने देश,शहर ही नही घर पर बैठ कर भी पुरी दुनिया से जुड गए है। आज दुनिया के किसी भी कोणे मे होने वाली घटना से पुरी अवगत हो जाती है।

एक दुसरो को अपनी सवेदनाए भी पहुचा पाना आसान हो गया है। तभी तो आज मै अपने विचारो को आप सब तक आसानी से पहुचा पा रही हुँ। पहले के समय मे देखा जाए तो अपने गांव या शहर से बाहर की हमे कोई जानकारी नही होती थी,या हम अपने विचारो को इस तरह विस्तृत नही कर पाते थे। इंटनेट के माध्यम से दुनिया करीब हो गई मानो हम घर की खिडकी से झांके तो पुरी दुनिया नजर आ जाए।

जय श्री राम

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