नूरजहाँ (मेहरुनिशा) मुगल बादशाह जहाँगीर की बेगम

भारत पर आक्रमण करके बाबर ने अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था। बाबर मंगोल था वह अफगान के रास्ते से भारत आया था। उसने अफगान पर अपना कब्जा कर लिया था। अफगान से पंजाब प्रात के रास्ते आ कर उसने उतर भारत पर कब्जा कर लिया था।बाबर का बेटा हुमायु जब बहुत बीमार हुआ बचने की कोई उमीद ना दिखी तब बाबर ने उसकी चारपाई की परिक्रमा करके हुमायु की मौत खुद के सिर ले ली। इससे बाबर मर गया और हुमायु को अपना सारा राज्य जिसे उसने जीता था सौंप दिया और हुमायु से कहाँ अपने छोटे तीनो भाईयो को उनका हिस्सा दे देना।

बाबर की मृत्यु के बाद हुमायु ने अपने तीनो भाीयो को काबुल,कंधार,हिन्दकुश का राज्य दे दिया और खुद दिल्ली पर राज करने लगा। हुमायु के सभी भाई अयोग्य व विलासी थे। वह राज्य पा कर मौज मस्ती मे लग गए। वे सब कायर तो थे ही। इस बात की भनक शेरशाह सूरी को लगी तो वह भारत पर आक्रमण करने निकल पडा। पहले वह गुजरात विजय कर के दिल्ली की तरफ बढ गया। गुजराती की महारानी कर्णावति ने हुमायु को राखी भेज कर गुजरात की रक्षा के लिए हुमायु से मदद मांगी। हुमायु ऐशोआराम मे व्यस्त था उसने कर्णावति को समय पर मदद नही पहुचाई इस लिए शेरशाह सूरी विजय हुआ और हुमायु की इस लापरवाही का हरजाना हुमायु को भोगना पडा।

शेरशाह सूरी ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया और हुमायु को दिल्ली से खदेड दिया। हुमायु ने भाईयो से मदद मंगवाई मगर वे सब ऐशेराम मे तलीन थे किसी ने भी हुमायु को मदद नही पहुचाई। अब हिमायु दिल्ली से भाग निकला। इस बात की खबर राजपूत शासक हमीर को लगी तो वह हुमायु की मदद के लिए आगे आया। हमीर ने उसे अपने राज्य मे शरण दे दी। हुमायु जब हमीर की शरण मे था तब उसकी पत्नि गर्भ से थी। हमीर के राज्य मे ही हुमायु को पुत्र की प्राप्ति हुई। हुमायु के इस पुत्र का नाम अकबर रखा गया। अब मौका देख कर हुमायु ने राजपूती सैना को साथ लेकर शेरशाह सूरी पर आक्रमण कर दिया हुमायु के संग राजपूत सैना थी पर विजय नही हुआ।

दुसरी बार फिर आक्रमण किया तब शेरशाह सूरी ने भारत छोड कर जाने की निर्णय ले लिया और वापस लौट गया मगर युद्ध मे हुमायु मारा गया। हुमायु के पुत्र को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया पर वह अभी बालक था इस लिए बेराम खाँ नामक हुमायु का सैना नायक था उसने अकबर के बडे होने तक उसकी देखरेख का जिम्मा लिया और इस तरह बेराम खाँ अकबर का संरक्षक बन गया। अकबर बडा हुआ तो अकबर की ताजपोशी करी गई और अकबर ने अपना शासन अपने हाथ मे ले लिया। अब अकबर बादशाह नियुक्त हो गया। अकबर ने भारत के कई राज्यो पर अपना अधिकार जमा लिया था। बहुत से राजपूत राजाओ के अपने अधिन कर लिया था।

अकबर ने विवाह नीति के तहत कई विवाह किये जिनमे राजपूत घराने की जोधाबाई से विवाह किया। जोधाबाई से अकबर को पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम जहाँगीर रखा गया। नूर जहाँ जब पैदा होने वाली थी तब उनके माता -पिता काफिले के संग अफगानिस्थान से भारत आ रहे थे रास्ते मे बहुत बडे रेत के टिले रेगिस्थान था ऊँठो पर सामान व बच्चो को लादे काफिले के काफिले भारत आ रहे थे। रेगिस्थान मे ही नूर जहाँ का जन्म हुआ था। उनके माता पिता की ये 9 वी सन्तान थी। एक तो घोर रेगिस्थान जहाँ खाना- पानी मिलना मुश्किल उस पर इतने बच्चे सो उनके माता पिता नूर को वही रेगिस्थान मे छोड कर चल पडे।

वे कुछ दुर ही गए होगे की तभी पिछे से और काफिले आ रहे थे, उन्होने नूर की रोने की आवाज सुनी उस काफिले मे एक महिला जिसका बच्चा सफर मे ही मर गया था, उसे नूर पर दया आ गई और, उसने उसे उठा लिया वह अपने शोहर से कहने लगी, इस नन्ही सी जान को किस अभागन माँ ने इस तरह छोड दिया। ये कितनी सुन्दर है। इसके मुँह पर खुद्दा का तेज चमक रहा है, क्यो ना इसे हम ही अपने साथ रख ले और वो नूर को साथ ले कर चले कुछ दुरी पर ही पहुचते ही नूर के माता पिता के काफिले के पास वह काफिला भी पहुच गया।

जब नूर की माँ ने नूर के रोने की आवाज सुनी तो तडप उठी और रोने लगी तब उसके काफिले के लोगो ने बताया की पास ही एक काफिला आया है, उस मे एक बच्ची है जिसके माता- पिता ने उसे छोड दिया इस तपते रेगिस्तान मे मरने के लिए। तब नूर के माता- पिता पहचान गए की वह बच्ची उन्ही की सन्तान है। वे अपनी बच्ची को बापस ले आए। भारत पहुच कर नूर के पिता अकबर के दगबार मे नौकरी की तलाश मे पहुचे। अकबर ने उन्हे दरबार मे नौकरी दे दी।जब नूर कुछ बडी हुई तो नूर की माँ अकबर की बेगमो के लिए कपडो पर कठाई करती थी।

एक दिन नूर भी अपनी माँ के संग अकबर के जनाना महल मे गई तभी वहाँ जहाँगीर खेल रहा था नूर भी वही चली गई और जहाँगीर को खैलते देखने लगी तभी जहाँगीर को बादशाह अकबर ने बुलाया तो जहाँगीर अपने पिता से मिलने जाने लगे उनके हाथ मे दो पालतु कबूतर थे। वह नूर को अपने कबूतर पकडा कर पिता के पास चला गया। नूर के हाथ से एक कबूतर उड गया जब जहाँगीर बापस आया तो नूर के पास एक कबूतर देख कर कहने लगा, तुने मेरे कबूतर उडा दिया। नूर ने कहाँ मेने तुम्हारा कबूतर नही उडाया पर जहाँगीर नाराज होने लगा। अकबर जनाना महल आए तो उन्होने नूर और जहाँगीर की सारी बात सुन ली जहाँगीर ने कहाँ मेरा कबूतर उडा नही तुमने उडाया है। इस पर नूर ने कहा नही उडाया जहाँगीर ने कहाँ तो कैसे उड गया।

नूर ने अपने हाथ मे पकडे दुसरे कबूतर को भी उडा दिया और कहाँ ऐसे उडा तुम्हारा कबूतर। अकबर नूर की बुद्धिमता से खुश हो गए, और नूर की माँ से कहाँ नूर को रोज अपने साथ लाया करे रनिवासे( जनाना महल) मे जहाँगीर भी अकेला है। इसके साथ खेलेगी तो जहाँगीर भी खुश रहेगा। रोज दोनो बच्चे साथ खेले।अब नूर रोज रनिवासे आने लगी नूर और जहाँगीर साथ- साथ खेलते।जब वे दोनो बडे हो गए तो जहाँगीर के मन मे नूर बस गई। वह हर समय बस नूर मे ही खोया रहता। ये देख कर अकबर को अच्छा नही लगता। बादशाह का बेटा किसी मुलाजीम ( नौकर ) की बेटी को चाहे। इस लिए अकबर ने एक योजना के तहत जहाँगीर को कुछ दिनो के लिए युद्ध करने के लिए बाहर भेज दिया। सोचा की मौका मिलते ही वह नूर के पिता से कह कर उसका निकाह करवा देगे।

जहाँगीर के वापस आने से पहले ही उन्ही दिनो शेरशाह नाम का एक शेख अफगान से भारत आया हुआ था ।वह अकबर के दरबार मे पहुचा (या कूटनिती के तहत अकबर ने बुलाया होगा) तब एक दिन अकबर ने शेरो का युद्ध देखने उसे दरबार बुलाया और शेरो का युद्ध देखते समय तेज हवा चली तो नूर का दुपट्टा उड कर शेरो वाले बाडे मे जा गिरा। अब शेरशाह ने नूर को देखा और उसके रुप पर मोहित हो गया, और मन ही मन सोचा की नूर का दुपट्टा अगर वह शेर के वाडे से लाकर नूर को देगा तो अकबर खुश होगा। तब वह नूर का हाथ अकबर से मांग लेगा। शेरशाह शेरो के बाडे मे कूद पडा शेरो से भिड कर वह दुपट्टा वापस लाकर नूर को दिया।

अकबर ने उसकी बहादुरी से खुश होकर मुँहमांगा ईनाम मांगने को कहाँ। तब शेरशाह ने अकबर से नूर का हाथ मांग लिया। अकबर इस बात से बहुत खुश हुआ क्यो की वह नूर से छुट्टकारा ही चाहता था। उसने नूर के पिता को समझा बुझा कर नूर का निकाह ( शादी ) शेरशाह से करवा दिया। शादी के बाद नूर शेरशाह के साथ अफगान चली गई जहाँगीर वापस आया। जहाँगीन ने नूर से मिलना चाहा तो उसे पता चला की नूर का विवाह हो गया है। वह अफगान चली गई है। इस घटना से जहाँगीर बहुत दुखी हुआ क्योकि नूर उसके मन की मलिका बन चुकी थी। अब जहाँगीर ने दरबार मे आना – जाना कम कर दिया बस दिन भर नूर के गम मे मयखाने मे रहता।

राजकाज मे बिलकुल ही मन नही लगाता था। अकबर व जहाँगीर के बीच दिवार खिंच गई। दोनो पिता और पुत्र एक दुसरे को अपना दुश्मन समझने लगे। अकबर ने जहाँगीर की शादी करवा दी। राजस्थान के जोधपुर राजा रावजोधा की बेटी जोधाबाई अकबर की पत्नि थी और जहाँगीर की माँ थी। जोधाबाई ने अपने पुत्र जहाँगीर की शादी अपनी भतीजी आमेर के राजा मानसिंह की बेटी मानीबाई से करवा दी थी। जहाँगीर के कई विवाह हुए। जहाँगीर को अपनी किसी पत्नि से प्रेम नही था। ये देख कर जोधाबाई( जहाँगीर की माँ ) ने अपनी भतीजी मानीबाई की शिकायत पर जहाँगीर को बहुत समझाती पर वो किसी की बात नही सुनता बस मयखाने मे ही पडा रहता।कहानी मे बदलाव आया की नूर का पति युद्ध मे मारा गया अब तक नूर के तीन बेटिया हो गई थी।

नूर अपनी बेटियो संग वापस भारत आ गई। अपने माता पिता के संग रहने लगी थी। जहाँगीर को जैसे स्वर्ग मिल गया हो नूर के आने की खबर से खुश हुआ और एक दिन मौका देख कर उसने नूर को निकाह के लिए राजी कर ही लिया। नूर से निकाह होने पर जहाँगीर बस नूर का ही होकर रह गया। अब सारा राजकाज उसने नूर को सम्भला दिया। नूर जो कहती, वही सब होता सारी बागडोर नूर ने अपने हाथ मे लेली। बेगम नूर मलिका नूर बन गई इस बात से जहाँगीर की दुसरी पत्नियाँ नूर से मन ही मन जला करती थी।बैसे नूर बहुत दरिया दिल व नैक थी। उसने दीन दुखियो की मदद के लिए महल के बाहर घण्डा लगवाया था अगर कोई दीन दुखी अगर बादशाह से फिरयाद करना चाहता था तो उस घण्टे को बजा देता था। नूर उसे सैनिक भेज कर महल मे बुला लेती थी।

उसकी फरियाद सुनती और उसकी हर सम्भव मदद करती थी। कुल मिला कर देखा जाए तो नूर जितनी सुन्दर थी उतनी ही दयालु व नैक भी थी। उसके शासन काल मे कोई दुखी नही रहता था। सब को न्याय मिलता था।नूर अपनी सुन्दरता का पुरा ख्याल रखती थी। वह बहुत शौकिन थी इस लिए वह जब नहाने पानी के टैंक(पुल) मे जाती तो उसके लिए पानी मे बहुत सारे गुलाब के फुलो को पानी मे उबाल कर डाला जाता था। उस गुलाब वाले पानी से ही वह नहाती थी। कहा जाता है की इत्र का चलन नूर ने ही चलाया था। तभी से इत्र बनने लगा और रनिवासे मे इत्र की महक बनी रहती थी।
नूर को प्रकृति से बहुत लगाव था। इस लिए उसके शासन काल मे भारत मे बहुत से उद्धान (बाग-बगिचे) बने काश्मिर मे शालिमार व निशांत बाग भी नूर जहाँ के कहने पर जहाँगीर ने बनबाये थे । नूर जहाँ ने एक शहर भी बसाया था।

अपने नाम से जिसे नूर महल के नाम से जाना जाता है। ये नूर महल पंजाब मे स्थित है। इसी नूरमहल की मिट्टी मे नूरजहाँ पैदा हुई थी। इस लिए अपनी जन्म भूमि नूर नूरमहल को ही मानती थी। कहते है जब रोजे होते थे तो नूर इस नूर महल मे जाकर रहती थी।नूर की बेटिया भी नूर जैसी ही सुन्दर थी उसने अपनी बडी बेटी जिसका नाम लाडली था। जहाँगीर को कह कर जहाँगीर की दुसरी पत्नि से पैदा हुआ बेटा शहरयार से निकाह करवा दिया था। जिससे जहाँगीर की दुसरी पत्निया अब और भी ज्यादा नफरत करने लगी थी। शहरयार अब नूर का दामाद बन गया था तो नूर शहरयार को ही बादशाह बनाना चाहती थी।

इस लिए जहाँगीर की दुसरी पत्नियाँ नूर से जलती थी। जहाँगीर की दुसरी पत्नियो को ये बात पसंद नही आई कि शहरयार को बादशाह बनाया जाए।वे अन्दर ही अन्दर योजना बनाने लगी और शहरयार को हरा कर शाँहजहाँ शहंशाह बन गया नूर बुढी हो चुकी थी, और जहाँगीर मे भी अब उतनी ताकत नही रही थी। इस लिए शाँहजहाँ को रोक नही पाएनूरजहाँ का असली नाम मेहरु निशा था जिसका मतलब जिस पर खुद्दा की मेहर हो जहाँगीर ने ही मेहरुनिशा को निकाह के बाद नूरजहाँ नाम रखा था क्योकि जहाँगीर के जीवन की रोशनी मेहरुनिशा ही थी जो सारे जहाँ को रोशन करदे वो नूरजहाँ जहाँगीर मेहरुनिशा को विवाह के बाद नूरजहाँ (नूर) कह कर पुकारते था।शाहजहाँ की पत्नि मुमताजमहल नूरजहाँ की भतीजी थी जिसके लिए शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया था।

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