भारतीय सनातन धर्म और अन्य पंथ

भारत मे प्राचीनकाल से ही अपनी अनूठी पहचान लिए सनातन धर्म जो दुनिया के हीत की कामना करता है और सारी धरती को अपना कुटुम्ब समझता ,है और सारे विश्व के लोगो को अपनी कुटुम्बीजन यानि अपना परिवार मानता है। सनातन धर्म मे बहुत से ऋषि-मुनि हुए जिन्होने अपना दर्शन-ज्ञान पुरी दुनिया को दिया और इसके चलते पुरी दुनिया मे विश्व-बंधुत्व के भाव पैदा हुए। सनातन धर्म के ऋषि-मुनियो ने दुनिया की भलाई के लिए बहुत सी नई राहे खोजी इस लिए यह एक वैज्ञानिक ही थे, जिन्होने अपनी महान खोजो से दुनिया को लाभ पहुंचाया। हस सब पृथ्वी-वासी इन ऋषि मुनियो के सदैव ऋणी रहेंगे। इन ऋषियो मुनियो और हमारे पुर्वजो ने जो महान ज्ञान हमे प्रदान किया उन मूल्यवान ज्ञान को पा कर हम कृत-कृत करतार्थ हुए।

सनातन धर्म के महान मूल्य ———-

सनातन धर्म के महान मूल्य है कि, वे हमारे शुद्ध आचरण के निर्माण मे सहायक होते है। सनातन धर्म दया धर्म यानि दुसरो पर, अपने से निर्बलो पर, जीव-जन्तु पर दया भाव रखना। बीमार पर, वृद्धो पर,बच्चो पर, महिलाओ पर, शरण मे आए हुए निर्बल पर, सदैव दया भाव रखने की सिख मिलती है। क्षमा यानि किसी से गलती हुई और उसको अगर अपनी गलती का आभास हुआ तो वह गलती यानि अपनी त्रृटि के लिए क्षमा याचना करता ग्लानि भाव से तो उसे क्षमा करना अपना आदर्श माना जाता है। ईश्वर भक्ति के मार्ग प्रसस्त करना यानि लोगो को नेक राह पर चलने की शिक्षा ज्ञान देकर उसको ईश्वर प्राप्ति की राह बताने का काम सनातन धर्म सिखाता है।

मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेरित करना यानि ऐसे आदर्शो पर चलने की सिख देना कि, वह नेक राह पर चलते हुए शुभ कर्म करते हुए भक्ति की राह की तरफ निरंतर अग्रसर होता रहे और खुद को मोक्ष पाने का अधिकारी बना लेवे। दुनिया को सुख मिल सके इसके लिए नित्य नवीन खोजो को करते रहना यानि ऐसे मार्ग का निर्माण करना जिस पर चल कर प्रत्येक जीव अपना हीत भी साधे और दुसरो के लिए भलाई का काम करता रहे। सदैव पुन्य कर्म करते रहने की सिख देना। जिससे इंसान खुद का और दुसरो का हीत साध सके। शुद्ध आचरण करते हुए अपने कर्मो को करना अपना धर्म समझ सके ऐसा ज्ञान देना। पाप से घृणा करना सिखाता है, सनातन धर्म। इन्सान को सुख-दुख मे सम- भाव मे रहने की सिख प्रदान करता है।

सनातन धर्म के सम्प्रदाय ———-

त्रिदेव सनातन धर्म

प्राचीनकाल से चले आ रहे सनातन धर्म के कोई अन्य सम्प्रदाय ऐसे नही की इसे किसी अन्य दो भागो मे बांटा जा सके, क्योकि हर साखा एक दुसरे से जुडी हुई है। इसकी विचार धारा भिन्न नही है। एक ही विचार-धारा को लिए जीवन यापन करने की सिख देने वाला सनातन धर्म एक साखा मे बंधा हुआ है। ये अलग बात है कि इस सनातन धर्म के अनेक देवी-देवताओ की पूजा की जाती है। इसके साथ कुछ लोग शिव भक्त है तो कुछ वैष्णव भक्त है। शिव भक्त शिव को अपने मोक्ष का आधार मानते है और वैष्णव भक्त भगवान विष्णु को मोक्ष का आधार मानते है। यह सिर्फ विचार धारा है पर सभी शिव और विष्णु सबकी पूजा करते है।

मगर सबके इष्ट अलग होते है। सनातन धर्म मे 32 कोटि के देवी देवता होते है। जिनको लोग उनके दिन-वार के अनुसार उनकी विशेष पूजा अर्चना होती है। कुछ देवी-देवता तो सामुहिक रुप से पूजे जाते है और कुछ देवी देवता कुल परम्परा के अनुसार पूजे जाते है। सामुहिक रुप से पूजे जाने वाले देव विशेष वह है— लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वति, ब्रहमा,विष्णु, महेश, गणेश,कार्तिक्य, हनुमान, इंद्र, वरुण,अरुण, कुबेर,विश्वकर्मा, अग्नि,पवन, सूर्य,चंद्र,बुद्ध,वृहस्पति,शुक्र,शनि, पार्वती,गंगा,यमुना,नर्वदा,गोदावरी,काबेरी,ताप्ति,सरस्वति,सरयू आदि नदियाँ भी पूजनिय है। कुछ देवी देवता जो सभी नही पूजते वह है- सबके अपने कुल के देवी-देवता, वंशपरम्परा से चले आ रहे देव विशेष आदि जिन्हे उसके मानने वाले लोग ही पूजते है। इसके साथ कुछ स्थानिय देव विशेष होते है जो किसी जाति,या स्थान के अनुसार पूजनिय होते है वह है—- लोक देवी देवता, माता सति, यति, देव, गंधर्व, आदि।

सनातन धर्म प्राचीन काल से चली आने वाली परम्परा है धर्म की मगर आधुनिक काल मे इसमे से कुछ नई परम्पराए भी उत्पन्न हुई जिन्हे जैन धर्म, बोद्ध धर्म, सिख धर्म के नाम से जाना जाने लगा। इस तरह आधुनिक काल यानि आज से दो सो साई सो साल पहले से अब तक का काल के बाद का समय जब नई धाराए सनातन धर्म से विभगत हुई और नए रुप से स्थापित हो गई। यह साखाए आज भी स्थित है।

जैन धर्म ( पंथ ) ——-

सनातन धर्म के आधुनिक-काल मे कई साखाए निकली जिसमे जैन धर्म (पंथ ) एक साखा है। इस साखा की स्थापना सनातन धर्म के राजा नाभीराज के एक पुत्र ऋषभदेव ने रखी। उन्होने तपस्या कर के नया ज्ञान पाया और उस नये ज्ञान को पुरातन ज्ञान मे जोड कर एक नई साखा बनाई जिसको हम जैन धर्म ( सनातन धर्म की एक साखा,पंथ ) के नाम से जानते है। इसमे कुछ नए आयाम दिये जिससे लोगो मे बढ रहे पाप को रोक लग सके, और लोग पाप की तरफ ना प्रवृत हो वह सदैव पुन्य कर्म करते रहे> इसी सोच से ऋषभदेव ने इस साखा का ज्ञान आम-जन को देना शुरु किया। ऋषभदेव जैन पंथ के प्रथम प्रवृतक हुए फिर इनकी साखा मे इनके बाद 23 तीर्थांकर और हुए इस तरह जैन धर्म मे 24 तीर्थांकर हुए जिन्होने नई खोज कर के सनातन धर्म को सुरक्षित यानि पाप मुक्त रखने मे अपना योगदान दिया। जैन पंथ के 24 वे तीर्थांकर महावीर स्वामी हुए। जैन पंथ मे कई सालो बाद वैचारिक मतभेदो के चलते अब जैन पंथ दो भागो मे विभगत हो गया।

जैन धर्म ( पंथ ) की साखाए ———-

जैन धर्म ( पंथ ) की आपसिक मतभेद के कारण यह दो भागो मे विभगत हो गया। एक साखा दिगम्बर दुसरी साखा श्वेताम्बर हुई। दिगम्बर साखा मे बाहरी दिखावा आडम्बर का विरोध करते हुए, निर्वस्त्र रहने का प्रचलन था। दिगम्बर जैन साधु नग्नावस्था मे ही रहते है वे कोई भी तरह का वस्त्र शरीर पर धारण नही करते। शवेताम्बर साखा मे सफेद वस्त्रो को धारण किया जाता है। इस साखा के साधु सफेद वस्त्र से अपने पुरे शरीर को ढक कर रखते है और मुँह पर सफेद पट्टी बांध कर रखते है, क्योकि इनका मानना है मुँह की हवा से कितनी शूक्ष्म जीव मर सकते है। इस तरह किसी जीव की हत्या के पाप से बचने के लिए वे सदैव मुँह पर सफेद पट्टी बांध कर रखते है इस लिए इन साधुओ को मुँहपट्टिया महाराज कहाँ जाता है। जैन मत को मानने वाले लोग अपने साधु-संतो का बहुत सम्मान करते है। उनकी कथनी की कभी नकारा नही जाता। यह संत-साधु कभी अग्नि नही चलाते इस पंथ के अनुयायी ही सदैव इनके भरण-पोषण का काम करते है। गृहस्थी के घर जाकर भिक्षा माग कर यह साधु-संत अपना जीवन यापन करते है। इनके भी नियम है कि एक दिन मे केवल तीन घर से भिक्षा मांगते है।अगर तीनो घर से भिक्षा नही मिलती उस दिन उपवास रख कर काटते है कभी चौथे घर मे नही जाते भिक्षा के लिए और रोज एक ही घर मे भिक्षा लेने नही जाते बदल कर किसी दुसरे अनुयायी से भिक्षा लाते है। आजकल तो इनके अनुयायी स्वयम ही इनको भोजन देने जाते है।

जैन धर्म ( पंथ ) की विचारधारा ———

जैन धर्म की विचार धारा मे सत्य यानि सच्चाई की राह पर चल कर ही जीवन यापन करना चाहिए। झूठ फरैव से सदैव दुरी बना कर रखने मे ही भलाई होती है। अहिंसा यानि किसी निर्दोष की हत्या नही करनी चाहिए। अगर कोई निनंदनिय अपराध भी अगर करता है तो उसे मृत्युदण्ड ना देकर केवल कैद ही दिया जाए और जीवो का शिकार ना किया जाए किसी भी प्रकार से हिंसात्मक आचरण नही करना चाहिए। क्षमा यानि कोई पापी पाप करता है और जब उसे अपने गुनाह का अहसास हो जाता है तो वह क्षमा मांग कर क्षमा पाने का अधिकारी होता है उसे क्षमा प्राप्ति के बाद नेक राह पर चल कर जीवन यापन करने की अनुमति देना।

अपरिग्रह यानि जितनी जीवन मे जरुरत हो उतना ही धन रखना चाहिए जरुरत से अधिक धन नही रखना चाहिए इससे लाभ कि लोग पाप वृति से दुर रहते है। किसी भी वस्तु मे ममत्व भाव नही रखने का उपदेश दिया जाता है। अस्तेय यानि किसी की वस्तु धन को ग्रहण नही करना चाहिए यानि चोरी नही करनी चाहिए जब कोई खुद आपको कोई वस्तु भेट करे तब ही उस वस्तु को ग्रहण करे बिना अनुमति के बिना पुछे खुद से उठा कर कोई वस्तु नही लेना ही धर्म है। ब्रहमचर्य यानि मन से वचन से वाणी से कभी भी वासना को स्थान नही देना चाहिए शरीर के प्रति आकर्षण नही रखना चाहिए। इसी चलते इनके साधु -संत अपने शरीर के बालो को उखाड देते है। यह संयास ग्रहण करने से पहले सिर के एक-एक बाल को नुचवाते है सिर को गंजा ( रोड-मोड ) कर लेते है ताकि शरीर मे आक्रषण उत्पन्न ना हो सके।

सिख धर्म ( पंथ ) ———

सिख धर्म ( पंथ ) सनातन धर्म की अभिन्न अंग रहाँ है। इस साखा के पहले प्रवृतक गुरु नानकदेव जी को माना जाता है। गुरुनानकदेव सनातन धर्म के क्षत्रिय परिवार की संतान थे। संत गुरु नानकदेव जी ने लोगो के दुखो से आहत होकर लोगो की मदद के लिए मुहिम चलाई उस समय भारत मे मुगलो ने शासन करना शरु कर दिया था इससे जनता मुगलो के अधिन होकर मुगलो के अत्याचारो से आहत होने लगी सनातन धर्म तो पहले ही विदेश से आने वाले मुश्लिम शासको की गुलामी करते उनके अत्याचार सहते हुए तृरस्त हो रहे थे। वह मुगलो की दस्ता सहते अनेक प्रकार के अत्याचारो के सहन कर रहे थे। सनातनियो को अपना धर्म का निर्वाह करने के लिए बहुत भारी मात्रा मे मुश्लिम शासको को धार्मिक कर ( टेक्स ) देना पडता जो बहुत अपमान जनक होता था। कही सनात धर्म के लोगो पर धन की लुट खसोट कही मार काट मुश्लिम धर्म को मानने के लिए इन सब से आहत सनातन धर्मानुयायी टुटने लगा दुख के इस दौर पर उनके दिलो पर मरहम लगाने गुरु नानकदेव जी निकले उन्होने नगर- नगर,गांव-गाव जाकर लोगो को ज्ञान देना शुरु किया लोगो मे आस्था बनी रही इसके लिए भगवान के उपदेशो का ज्ञान देना शुरु किया उनका यह ज्ञान आज एक पवित्र पुस्तक गुरुवाणी मे संग्रहीत है। गुरु नानकदेव जहाँ जाते वहाँ के लोग उनके संग हो लेते। वह भी शहर-शहर,गाव-गाव उनके संग घुम-घुम कर जन चेतना उत्पन्न करते। इस तरह पुरे उतर भारत मे गुरुनानक देव ने अपने उपदेशो से लोगो की मन की पीडा को हर लिया। वे भुखे लाचार लोगो के लिए भोजन की व्यवस्था करते मुगलो के शोषण से लोग गरीबी की मार सहन कर रहे थे। ऐसे मे गुरु नानकदेव उनकी आर्थिक तंगी को देखते भोजन की मुफ्त व्यवस्था करते थे। उनके इस नेक काम मे बहुत से धनाढय लोग उनकी आर्थिक मदद करते थे। आगे चलते चलते उनके बाद यह क्रम चलता रहाँ और नई साखा मे विभगत हो गया उनके अनुयायियो ने उनके बाद खुद को सिक्ख बना लिया इस तरह सिक्ख धर्म ( पंथ ) का निर्माण सनातन धर्म मे हुआ। इसमे कई और गुरु हुए गुरु तेगबहादुर, गुरु हरगोविंद आदि कई गुरु हुए।

बोद्ध धर्म ( पंथ ) ——–

सनातन धर्म से एक और साखा निकली। प्राचीन काल मे एक साखा पनपी जिसको बोद्ध धर्म के नाम से जाना जाता है। जैन धर्म के समयकालीन ही बोद्ध धर्म पनपा। बोद्ध धर्म महात्मा बुद्ध ने प्रतिपादित किया। लोग महात्मा बिद्ध के उपदेशो से प्रभावित होकर उनके अनुयायी होने लगे। उस समय राजाओ ने इस धर्म को अपना संरक्षण दिया। राजा का संरक्षण पा कर बोद्ध धर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। पहले राजा जिस धर्म को अपनाते प्रजा भी उसको मानती थी। कभी अपनी मर्जी तो कभी राजा के भय से लोग उसी मार्ग पर चलते जिस मार्ग पर राजा चलता था।राजा की शरण मे आने से बोद्ध धर्म बहुत जल्दी पुरे भारत मे फैलने लगा और सम्राट अशोक ने तो इसे देश ही नही बल्कि विदेशो मे भी फैलाना शुरु कर दिया था

। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र व पुत्री को बोद्ध धर्म के प्रचार के लिए सूदुर पुर्वी देशो मे भेजा। जावा,सुमात्रा, जकार्ता,इंडोनेशिया,मलेशिया,जापान, चीन,तिब्बत, मयान मार आदि देशो मे यह बोद्ध दर्म फैल गया। राजा जब बोद्ध धर्म की संगोष्ठी ( सभा ) बुलाते तो दुर देशो से चल कर भी लोग भारत बोद्ध संगोष्ठी मे भाग लेने आते थे। राजा हर्षवर्धन, राजा कनिष्क आदि कई महान राजाओ ने बोद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्न किया। इस तरह भारतीय राजा संगोष्ठी करते थे। विशाल संगोष्ठी मे भाग लेने विदेश से भी अनुयायी आते थे। इस तरह बोद्ध धर्म उस समय भारत मे ही नही कई अन्य देशो मे भी फैल गया था। इस धर्म के साधु-संतो को लाम्बा कहते है। भारत मे पैदा हुआ बोद्ध धर्म आज भारत से खत्म हो चुका है केवल विदेशो मे ही इसके अनुयायी है। बोद्ध धर्म के भारत से नष्ट होने का कारण बोद्ध धर्म मे पाखंड व आडम्बर शुरु हो गया था, और पहले की तरह अब राजाओ का संरक्षण भी इस साखा को नही मिल रहाँ था। धिरे-धिरे बोद्ध धर्म भारत से विनाश की कगार मे पहुच गया इसके पिछे एक विशेष कारण यह था

कि अब बोद्ध धर्म गुरु व धर्म मठो मे महिलाओ को प्रवेश मिलने लगा महिलाए भी दीक्षा लेकर बोद्ध संगिनी बनने लगी, और मठो मे महिलाओ के आगमण से बोद्ध धर्म गुरु के आचरण पतित होने लगे वे अब ब्रहचर्य को छोड वासना मे प्रवृत रहने लगे यह संब देख लोगो का मन बोद्ध धर्म से हट गया लोग बोद्ध धर्म छोडने लगे। आज भारत मे बोद्ध धर्म नही है मगर राजा अशोक, कनिष्क आदि के समय लिखी उनकी शिक्षाए ताम्ब्रलिपी मे मिल जाती है।

इस तरह देखा जाए तो भारतीय सनातन धर्म मे समय-समय पर फैर बदल होते रहे नई साखाए बनती बिगडती रही। यह है भारत के धर्म का इतिहास- वर्तमान। आज भविष्य को लेकल सरकार को चिन्ता करनी चाहिए नही तो पता नही कितनी नई साखाए बन जाएगी। ढोग पाखंड को फैलाते कितने समुदाय ( संगठन ) है जो मौके की फिराक मे ही रहते है आडम्बर रचने के लिए केवल सरकारी भय के चलते उनके आडम्बर परवान नही चढ पाते। छोटे-छोटे दल बना कर अपना अड्डा जमाए ताक मे बैठे है कि कब मौका मिले और खुद को संस्थापक बना कर धर्म स्थापना कर सके। इतनी भीड को सभाए मे बुलाते है धन लुटाते है विदेश से धन पा कर आडम्बर को परिनाम देना चाहते है।

निष्कर्ष ———-

इस तरह देखा जाए तो भारतीय सनातन धर्म की साखाए निकली पर सभी साखाओ ने अपने मूल धर्म यानि सनातन धर्म को पुरी तरह कभी छोडा भी नही। इसके चलते हजारो सालो से साखाओ मे विभगत सनातन धर्मानुयायी आज भी अपनी मूल विचार धारा से जुडे हुए है। आज भी वह सब अपने सनातन देवी-देवताओ की भक्ति करते है। जैन धर्म ( पंथ ) हो या सिख धर्म ( पंथ ) सभी आज भी देवी देवताओ की पूजा करते है होली दीपावली नवरात्रि आदि सभी त्योहारो को पहले की ही भांति हर्षोलाश के संग मनाते है

। आज भी राम घर-घर पूजे जाते है। आज भी माँ दुर्गा दिलो मे निवास करती है। आज भी दीपावली पर हर-हर महालक्ष्मी विराजती है। दीपावली पर हर घर रोशनी से नहाता है। तो हम कैसे कह सकते है कि जैन धर्म, सिक्ख धर्म सनातन धर्म का अंग नही है। इस तरह सभी सनातन भारतीय हिन्दु धर्म की ही पहचान है फिर चाहे महावीर को पूजा जाए,गुरु नानकदेव को पूजा जाए या कोई और साखा से हो हम सब भारतीय उसी सनातन धर्म को मानने वाले हिन्दु ही है। हमे अलग घर्म मे ना बांटा जाए बल्कि जैन,सिक्ख को पंथ मानते हुए विन्न देखा जाए मगर उनको भी हिन्दु की श्रैणी मे ही रखा जाए। उनके संग धर्म के नाम मे भेदभाव ना रखा जाए ऐसा कानून सरकार को बनाना चाहिए जिससे हम सभी सनातनी एक छत्रछाया मे पहले की ही भांति जी सके।

जय श्री राम

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