बनिए महाभाग्यशाली एक राजयोग

प्रत्येक मनुष्य की यही चाहत होती है कि वे महाभाग्यशाली हो उसके पास सब सुविधाए हो और बहुत धनवान बने।सच्च पुछो तो महाधनवान वही है जीसके पास सुविधाओ को पाने और उसे भोगने की सामर्थ हो। खुद से ही हम अपने को कैसे सामर्थवान बनाए की हम महाघाग्यशाली बन जाए। तो आज हम यही जानने की कोशिश करते है कि किस तरह से हम अपने जीवन मे महाभाग्यशाली राजयोग को ला सकते है। इसके लिए हमे सबसे पहले उन सब कारको को पहचानना होगा जो हमे महाभाग्यवान बना देते है।

सृष्टी मे विध्यमान पंच तत्व——

सृष्टी ने सभी को भाग्यवान बना कर ही पैदा किया है पर हम अपनी अज्ञानतावश उन तत्वो को अपने भीतर आत्मसात नही करते तो इस तरह हम खुद ही अपने महाभाग्य को सुला देते है और बन जाते है भाग्यहीन दरिद्री। तो अब जब हम जानना ही चाहते है कि कौन से तत्व है जो हमे महाभाग्यवान बना देगे तो शुरु करे उन तत्वो को समझना। वे है प्रकृति से प्राप्त होने वाले पंच तत्व जाने इन पंच तत्वो को

सृष्टि से प्राप्त होने वाले पंच तत्व—–

सृष्टि मे विद्यमान पंच तत्व है– जल,वायु, अग्नि, तेज ( प्रकाश ), धरती-आकाश। इन्ही पंच तत्वो से हमारे शरीर का निर्मान हुआ है हमारी संरचना के आधार ही ये पंच तत्व है इनके बिना मानव जीवन और सृष्टि की कल्पना भी नही हो सकती है। इसके लिए हम पहले पंच तत्वो को सही से समझ लेते है कि ये पंच तत्व है क्या और हम इन्हे कैसे पा सकते है जीससे हम भी महाभाग्यशाली बन सके।

(1 ) जल तत्व—–

सृष्टि से मिलने वाले पंच तत्वो मे से एक महत्वपूर्ण तत्व है जीसे जल कहते है। इस जल तत्व से हमारे शरीर की संरचना होने मे मदद मिली। जल यानि पानी आप पानी तो रोज देखते ही है इसे पिने के लिए भी प्रयोग करते है। पानी के अतिरिक्त और कैसे जल तत्व हमे मिल सकता है वह है फलो से मिलने वाला रस जीतने भी प्रकार के फल सब्जियाँ अनाज आदि है जीन मे रस होता है वह सब जल तत्व मे ही आते है। दुध और दुध की वस्तुए ये सब भी जल तत्व का ही हिस्सा है।

( 2 ) वायु तत्व—-

सृष्टि से मिलने वाले एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व जीसके बिना जीवन की कल्पना हो ही नही सकती वह वायु तत्व। वायु यानि हवा और जीतनी भी प्रकार की गैसे है जो इस धरती पर मौजुद है वह सब वायु तत्व का हिस्सा है। इन गैसो आदान प्रदान होने से ही जीवन निर्मित होता है। यह विज्ञान मे आपने पढा ही होगा कि कौन सी गैसे मनुष्यो के लिए लाभ दायक है और कौन सी वे गैसे है जो सृष्टि के अन्य जीवन चक्र के लिए उपयोगी है। जैसे मनुष्यो के लिए अतिउपयोगी गैस है आक्सिजन तो वही पेड-पौधो के लिए कार्ब-डाई-आक्साईड। आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारे शरीर के भीरत भी कई प्रकार की गैसे मौजुद रहती है। कुछ गैसे तो ऐसी होती है जो हमारे शरीर मे रिंग बनाकर रहती है इनके बीच मे ही हमारी प्राण टिके हुए रहते है। जब हमारा शरीर मृत अवस्था मे पहुच जाता है तो यानि शरीर से प्राण निकल जाते है तब ये गैसे अपने स्थान से हटती है और बाहर के वातावण को दुषित करती है।

आप यह तो जानते ही है की हमे किसी मृत प्राणी के निकट जाने पर हमारे ऋषि मुनियो ने एक नियम बताया था कि जब परिवार या आस-पास कोई व्यक्ति मर जाए तो उस दिन कुछ भी नही खाना चाहिए और ना ही उस घर से उस दिन ले कर कुछ खाना चाहिए इसके पिछे बस यही लोजीक रहता था कि उस मृत व्यक्ति के शरीर मे से तीन बहुत जहरिली गैसे जो उस व्यक्ति के प्राण को शरीर मे लपेटे हुई थी प्रआम के संग वह गैसे ङी शरीर से बाहर आ जाती है और उस घर के आस-पास के वातारण मे फैल जाती है। इस तरह वहआँ का वातावरण उन जहरिली गैसे के प्रभाव मे आ जाता है तो उस वातावरण मे जीतने भी भोजन के पदार्थ होते है वह जहरिये हो जाते है। उस जहरिये भोजन को खा कर प्राणी रोग ग्रस्त हो सकता है। ऐसी बहुत सी गैसे जो लाभदायक और हानिकारक दोनो प्रकार की गैसे है जो हमारे जीवन चक्र को प्रभावित करती है।

( 3 ) अग्नि तत्व—-

हमारे जीवन को बनाने और इसे सुचारु चलाने के लिए अग्नि तत्व है इसके बिना हम अपना अस्तित्व कायम नही रख सकते। अग्नि तत्व यानि आग जो हमारे शरीर को ऊष्मा और ऊर्जा देती है। अगर इसे हम हटा दे सृष्टि से तो फिर सृष्टि का अस्तित्व ही नही होगा। आग जो चुल्हा जलाती है भोजन पकाती है एक यह अग्नि तत्व है एक अग्नि जो हमारे शरीर मे होती है जो हमारे शरीर को बलवान बनाती है जीसे हम आयुर्वेद की भाषा मे ज्ठरागिनी कहते है। इसका मतबल हुआ हमारे शरीर मे विध्यमान वह अग्नि जो हमारे खाये हुए भोजन को पकने मे शरीर को मदद करती है। इसी अग्नि मे पक गल कर वही हमारा खाया गया भोजन जल तत्व मे बदल कर यानि लहु ( खुन ) बन कर हमारी रगो ( नाडियो ) मे दौडता है और इससे हमारा शरीर पुष्ट होता है। इस तरह हमारे जीवन यापन के लिए बाहर और भीतर अग्नि तत्व की जरुरत होती है।

(4 ) तेज ( प्रकाश )—–

तेज यानि प्रकाश जो सूर्य से हमे मिलता है इसी प्रकाश से ही जीवन की सम्भावना रहती है। जहाँ यह प्रकाश तेज नही होता वहाँ अँधकार छा जाता है तो इससे कुछ दिखना मुश्किल हो जाता है। यह तो हुआ रोशनी के लिए प्रकाश की जरुरत इसके साथ हमारे शरीर के भीतर भी इस प्रकाश की जरुरत होती है जीसे हम आयुर्वेद की भाषा मे तेज या ओज कहते है।यह तेज ओज वह शक्ति होती है जीससे हमारे शरीर मे कर्म करने की साम्र्थ उत्पन्न होती है।

( 5 ) धरती-आकाश—–

पांचवा तत्व है धरती और आकाश इस तत्व मे मिट्टी सामिल होती है। अब शरीर मे मिट्टी का क्या काम तो शरीर जो यह हमारी काया यह भी मिट्टी ही है यानि मास का लौथडा जैसे घर के निर्माण मे मिट्टी सिमेंट आदि से घर बनता है उसी तरह से हमारा शरीर भी मिट्टी है जीससे हम हाड-मास कहते है हमारा पुरा शरीर हमारी घरती है। जब हम इस दुनिया मे जन्म लेने आते है तो इसके लिए हमे माँ के गर्भ की जरुरत होती है जैसे एक पौधे को रोपने उगाने के लिए बीज को घरती चाहिए होती है ठीक उसी तरह हमारी काया रुपी पौधे को विकसित होने के लिए माँ की कोख रुपी घरती की जरुरत होती है जहाँ पर नो महिने माँ के खाये गए भोजन से हमारे शरीर की संरचना तैयार होती है और जब हम नो महिने बाद हम पैदा हो गए दुनिया के लिए यही हमारा बीजांकुर होता है जो घरती को चीर कर बाहर निकल आता है ठीक एक पौधे के बीज से निर्मित होने जैसे। आकाश यानी विस्त्रितृत स्थान जो जीवन को फैलाने मे मददगार होता है। ऐसे ही शरीर मे आकाश यानि हमारा मस्तिष्क जीस के कारण ही हमे कुछ करने और नई युक्तियो को सोचने समझने की शक्ति मिलती है यह आकाश जो हमारा मस्तिष्क है।

अब हमने पांच तत्वो को समझा अब हम इन्ही पंच तत्वो की मदद से अपने को भाग्यवान बनाने की कला सिखते है।जैसे कि अब हमे यह पता चल चुका है कि हमारे को किन तत्वो की आवश्यकता है जो हम खुद को महाभाग्यशाली बना सकते है तो शुरु करे खुद से महाभाग्यशाली बनाना।हम खुद को भरपुर मात्रा मे इन पांच तत्वो से जोडेगे और एक बहुत आलिशान जीवन जीने की राह पकड कर चलेगे।

इन पंच तत्वो को बाहर और भीतर उपयोग करना है हमारे भीतर इन पंच तत्वो को सही से काम मे लाए। जल तत्व को शरीर मे पुर्ति के लिए खुब पानी पिये यानि जीतनी प्यास लगे उतना पानी जरुर पिये। जब ठण्ड का मौसम हो तो कुछ गुन-गुना पानी गर्म करके पिये नही तो साधारण पानी पिये मगर ठण्डा पानी यानि बर्फ आदि डाल कर नही पिये इससे हमारे शरीर की अग्नि मे कमी आने लगेगी। पानी को सदैव साधारण अवस्था मे ही पिना चाहिए यानि अत्यधिक ठण्डा नही पिये।

भोजन मे वह सभी पदार्थ ले जीनसे इन पंच तत्वो की पुर्ति हमारे शरीर मे हो सके यानि ऐसे भोज्य-पदार्थ जीनमे रस हो ताजे,खुशबुदार हो,देखने मे सुन्दर हो यानि गले सडे ना हो। सभी तरह सब्जियाँ, सभी तरह के अनाज जो हमे सुलभ्ता से मिल सके इसके लिए बहुत मेहगे फल ही हो जरुरी नही बहुत से सस्ते फल यानि ऋृतु फल होते है जो कम बजट मे उपलब्ध हो जाते है उन मे भी रस तत्व –फल सब्जियाँ,दुध और दुध से निर्मित पदार्थ ( जल तत्व ) ऊष्मा ऊर्जा— सभी तरह के अनाज, फल सब्जिया,दुध दुध से निर्मित पदार्थ,सभी प्रकार की मिठाईया और वे मसाले जो शरीर मे गर्मी पैदा करते है मसलन गर्म मसाले ( अग्नि तत्व )मिल सकते है। तेज तत्व–शरीर को ओजवान बनाने के लिए वे सभी पदार्थ जीनसे शरीर मे ओज बढ सके यानि आपको हिमोग्लोबिन को सही लेबल पर रख सके। खुन की सही मात्रा शरीर मे बन सके। अब बारी आती है धरती व आकाश तत्व की इसके लिए आपको संतुलित आहार लेने के संग पैदल चलना और गतिशील रहना भी जरुरी होता है।

अपने शरीर को सही संतुलित भोजन खा कर तंदुरुस्त करे फिर इस तंदुरुस्त शरीर को मेहनत करने मे लगाए जो कार्य करने के लिए प्रकृति ने आपको चुना है वह कार्य आप अब एकदम स्वस्थ हो तो शरीर मे पुरी सामर्थ है कार्यो को करने की इसके लिए आप अपनी सामर्थ से कार्य करे आलस प्रमाद मे मत पडे जीतना हो सके अपने हाथो से काम करे जीतना हो सके अपने पैरो का प्रयोग करे यानि पैदल चल कर आये जाये इससे शरीर मे चुस्ती फुर्ती आती है।अपने हाथ से काम करने से शरीर मे आलस पैदा नही होता आलस आने लगता है तो समझो आपके जीवन मे दरिद्रता शुरु। आपको ऊष्मा ऊर्जा व पुरी वायु नही मिल सकेगे इस कारण आपके शरीर मे वायु तत्व और अग्नि तत्व कमजोर होने लगेगे और आप बीमार रहने लगेगे शुगर- बी. पी जैसी बीमारिया आने लगेगी फिर आप सृष्टि के पंच तत्वो से दुर होने लगेगे और एक बीमार जीवन जीने मे मजबुर हो जाएगे इस कारण जीतना आपके शरीर मे ,सामर्थ्य है उसे उतना कार्य अवश्य करे।

जो लोग मोर्निंगवाक पर जाते है वही अगर अपने कार्यक्षेत्र मे पैदल चल कर जाए या कार्यक्षेत्र मे भाग-भाग कर मतबल चुस्ती फुर्ती रखते हुए चल फिरक कर कार्य करे तो ये मोर्निंगवाक नही करनी पडे। एकदम तंदुरुस्त रहेंगे आप अगर अपना कार्य खुदसे और चुस्ती-फुर्ती से करेंगे तो। आपको कोई योगा करने की तब आवश्यकता ही नही पडेगी जब आप अपने सभी कार्य यथा शक्ति खुद करने शुरु कर दे तो। जीतना हो सके खुद को कर्म योग मे झोंक दो इससे बडा कोई और योग नही ( योगा )

अब जब आप अपने पैरो से चल कर सब काम करेगे तो फिर आप को ना तो मोर्निंगवाक ना ही इंवनिगवाक और ना ही योगा की ही जरुरत है। योगा करके वाक करके हम खुद के भीतर की अग्नि को बढाने का काम करते है महज तो जब हम गतिशील रहेगे अपने कर्म ( काम ) खुद से करेगे तो हमारे शरीर की अग्नि सही काम करेगी सही से भोजन का पाचन होगा और जब भोजन सही से पंच जाएंगा तो कोई रोग हमारे सामने नही आएंगा।

आजकल लोग मोबाईल,कम्पयूटर मे इतना खो गए की खुद से ही अपने दुश्मन बन गए। वो ऐसे की इससे सब आलसी होते जा रहे है घर की महिलाए घरेलु काम के लिए नौकरानी लगाती है।खुद आलस प्रमाद उत्पन्न करती है अपने जीवन मे। पुरुष बाईक-कार आदि के बीना एक कदम भी बाहर नही रखते। आलस प्रमाद बन गया। बीना ऐ.सी के रहना नही चाहते तो असली ऐसी जो कुदरत ने दिया उससे कटते चले गए यानि धरती और आकाश तत्व से दुर हुए शरीर मे रोग आए शरीर अब इन कृत्रिम वस्तुओ का गुलाम बनाने लगा। बीमारियो को भोगने मे लगे। यही सब दरिद्रता के योग है जब हम दरिद्रता को खत्म करेगे यानि जीतना हो सके शरीर को खुद से काम लेने की आदत डालेगे तो हम भाग्यशाली नही महाभाग्यशाली बन जाऐंगे।

सही मायनो मे वे भाग्यशाली नही है जो मशीनो के उपयोग पर निर्भर है। भाग्यशाली वही है जीसके शरीर मे काम को खुद से करने की सामर्थ है जीसके पास तेज पुंज है। नोटो यानि कागजो की ठेरी से सामान खरीदे जा सकते है मगर असली सुख जो हमारी निरोगी काया नही खरीदी जा सकती। इस लिए जीसके पास बहुत सारे नोट तिजोरी मे पडे है पर दवाईयो की पुडिया जेब मे लिए घुमता है तो वह काहे का भाग्यशाली वह तो एक दरिद्री जीवन जी रहाँ है। असल मे महाभाग्यवान वही है जो एकदम तंदुरुस्त हो किसी दवाई का शिकार ना हो। जीसमे कार्यो की क्षमता है। जीसमे धर्य है। जसके पास तेज है। जीसके शरीर मे पांचन शक्ति सही से काम करते है। जो दिन भर कब्ज का शिकार रहे या जीसको कुछ भी खा लेने पर पचता नही दिन भर सोचालय के चक्कर लगाता रहे ऐसा व्यक्ति कैसे भाग्यशाली हुआ भला वह तो महादरिद्री है।

पहचाने की भाग्यशाली है कौन। भाग्यशाली वही जो आलसी नही जो बीमार नही, जो अपना सभी काम खुद से करने की क्षमता रखता है। जीसका चेहरा सदैव खिला रहता है मुख पर एक तेज झलकता है। जीवन वही जो आँखो से पत्थर को तौड दे मतलब इतनी शक्ति सामर्थ हो की किसी भी कार्यो को करने की हिम्मत रखता हो।

आप देखे उन लोगो को जीनके पास तिजौरी बहुत भारी होगी यानि कागजो-नोटो की कमी नही होगी पर उनके चेहरे सदैव मुरझाए हुए मिलेगे,दवाईयो से घर की हवा मे गंध भरी होगी। वे चलेगे तो ऐसे जैसे उनके शरीर मे जान भी नही है अभी कंधे पर चढ जाऐंगे जैसे ऐसे लोगो की बुद्धि भी फिर सही से काम नही करती हर काम के लिए बस मशीनी शरीर बन कर मशीन के गुलाम बन जाते है। ऐसे लोग जब देखो बैड पर ही नजर आते है। बहुत जल्दी थकान उन्हे घेरे रहती है। तो कैसे हम उन्हे भाग्यशाली माने वे तो केवल दरिद्री जीवन जी रहे है।

आप अपना काम खुद कर लेते है आपमे पुरी चुस्ती फुर्ती है आपको सुबह जल्दी उठने की आदत है और एकबार बिस्तर छोडने के बाद रात को सोने जाते वक्त के अलावा दिन मे बिस्तर पर जाने की जरुरत नही पडती आप दिन भर काम करते है और थकान कम महसुस होती है। आपका पेट एकदम सही रहता है। आपकी पाचन क्षमता सुचारु है। आप को किसी भी प्रकार की दवाईयो की जरुरत नही आप किसी नशे के आदि नही। आपको किसी भी काम को करने मे आलस नही आता तुरत-फुरत मे काम समेटनने लगते है। आपके पास बुद्धि जो सही सोच रखती है के मालिक है। आपके पास नई-नई योजनाए बना कर उन पर काम करने की बुद्धि और शरीरिक क्षमता है। आप किसी अफवाहो मे नही आते। आपको किसी अकारण रोना नही पडता मन से। आप बिना मेकअप भी ग्लोईग करते है यानि आपके शरीर मे तेज है। आप समाज के नियमो को मानते है। किसी भी प्रकार का दंगा-फसाद करने मे रुचि नही रखते।

आपके मन मे किसी से ईष्या या द्वेश नही होता। आप मशीन के गुलाम नही है। आप सदैव एक साकारात्मक सोच रखते है। आप हँसमुख स्वभाव के है। आपके चेहरे पर परेशानियो का बोझ नही झलकता है। आप सदैव कर्म करने मे विश्वाश करते है। आपके पास धेर्य है आपके पास संतोष है। आपको जीतना मिल जाए उससे जीवन यापन करने की संतुष्टि है। जरुरत से ज्यादा सामान घर मे एकत्रित नही करते है यानि जीन वस्तुओ की आपको जरुरत है उतनी ही वस्तुए खरीदते है बेकार मे सामान खरीद खरीद कर घर मे भर कर घर को कबाडखाना बनाना नही चाहते है। आप दुसरो की गलतियो को नही बल्कि खुद की कमियो को देखते है और अपने भीतर सुधार करते है। दुसरो के गुण देखते है और दुसरे के अच्छे गुणो से खुद को आतमसात करते है। बिना काम रो-रो कर अपने दुखडे दुनिया को सुनाने मे आपको रुचि नही है। आप किसी की चुगली निंदा नही करते है।

किसी से उसका हक नही छिनते। अपनी आत्मा मे रमण करते है यानि दुसरो के दोष ढुढने की प्रवृति आपकी नही है। यह सब बाते यही बताती है कि वास्तव मे आप भाग्यशानी नही बल्कि महाभाग्यशाली है। लोग उन्हे महाभाग्यशाली मानते है जो केवल बहुत बडी तिजौरी के मालिक है अरे भई उनके पास तो कागज और धातु की ढेरी है बस इससे वे महाभाग्यशाली कहाँ हुए महाभाग्य़ाली वही है जीनके पास यह सभी गुण मौजुद है इस लिए अगर आप अपनी जन्म पत्रिका किसी ज्योतिष को दिखाने जाते है और जब कोई सच्चा ज्योतिष आपको महाभाग्यशाली योग आपकी कुंडली मे वे बताते है तो इसका मतलब यही है जो मेने आपको मेरे इस लेखनी मे वर्णित किया है वह सब गुण आप रखते है तभी आप महाभाग्यशाली है। जो स्वस्थ शरीर का मालिक होगा वह सब काम कर सकेगा जब कोई मेहनत करेगा तो जाहीर है कि उसके पास धन यानि जरुरत के लिए प्रयाप्त राशि उपलब्ध होगी और उसे फिर किसी के आगे कर्जदार नही होना पडेगा।

इस तरह से आप संतुलित आहार ले कर अपने शरीर को तंदुरुस्त करके फिर खुद का कर्म करने योग्य बना कर कर्म हवन मे खुद को झोंक दे पुरी निष्ठा से अब आपसे महाभाग्य दुर नही आप एक महाभाग्यशाली इन्सान है।

सुविचार—— घरती रोशन सूरज- चाँद से होती है तारो से नही, इसी तरह जीवन सुखी खुद के कर्मो से होता है अत्यधिक धन रखने से नही।

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