भगवान श्री कृष्ण का मथुरा मे प्रवेश करना और कुब्जा पर कृपा करना

कंश को जब वासुदेव पुत्र श्री कृष्ण और बलदाऊ का वृंदावन मे होने की गुप्तचरो से जानकारी मिली तो कंस ने श्री कृष्ण और बलदाऊ को लाने अक्रूर जी को वृंदावन मे भेजा। अक्रूर जी कंस की चाल जानते थे इस लिए मन ही मन चिन्ता करने लगे अभी तो कृष्ण और बलदाऊ दोनो बालक ही है किशोरावस्था मे है। ऐसे मे कंस के सामने वे बालक क्या कर सकेंगे। मन मे उठने वाले विभिन्न विचारो की शांति के लिए कोई उपाय उन्हे नही सुझ रहाँ था और अब मजबूर होकर उन्हे कृष्ण और बलदाऊ को मथुरा लाना ही पडेगा। रथ पर सवार हो अक्रूर जी वृंदावन के लिए प्रस्थान कर गए।

अक्रूर जी को मथुरा से वृंदावन पहुचते सुबह से शाम हो गई। गो-धूली ( गायो और ग्वालो का घर वापस लौटने ) का समय होगया था। अक्रूर जी रास्ते की थकान और रास्ते की धूल-मिट्टी से बेहाल से वृंदावन मे प्रवेश करते है। जैसे ही वह नन्द बाबा के महल पहुचते है नन्द बाबा अक्रूर जी की आवाज सुन कर बाहर आते है और अक्रूर जी के गले लग कर उनका स्वागत करते है फिर उनको घर मे ले जाते है। इधर दोनो किशोर ( टिनेजर ) बालक कृष्ण और बलदाऊ अपनी गायो को चरा कर घर वापस लौट कर आते है। जैसे श्री कृष्ण को अक्रूर जी के आने की खबर मिलती है वह दौड कर अक्रूर जी से मिलने पहुच जाते है। फिर दोनो भाई कृष्ण व बलदाऊ अक्रूर जी के चरणो मे प्रणाम करते है अक्रूर जी खडे हो कर दोनो भाईयो को गले से लगा लेते है।

श्री कृष्ण बहुत खुश होते हुए अक्रूर जी से पुछते है काका आज आपका आगमण किस कारण से हुआ। तब वह बताते है कि कंस ने तुम दोनो भाईयो को लिवा लाने के लिए मुझे नियुक्त किया है।इस लिए मै आज वृंदावन आया हुँ। अब श्री कृष्ण अपने काका अक्रूर की सफर की थकान उतारने के लिए स्नान की व्यवस्था करते है। फिर दोनो भाई भी दिन-भर की थकान मिटाने के लिए स्नान करते है। अक्रूर जी को नन्द बाबा भोजन करवाते है। उनका आदर सत्कार करते है। सब भोजन करने के बाद आपस मे बात-चित करने के लिए बैठते है और देर रात तक वे सब बाते करते रहते है। नन्द बाबा उनसे वासुदेव-देवकी के बारे मे पुछते है उनका हाल-चाल जानते है। अक्रूर जी सब की जीज्ञासा शांत करते हुए सब के बारे मे भली भाति बताते जा रहे है। कृष्ण और बलदाऊ दोनो भाई अक्रूर जी के चरणो मे बैठे सब के बारे मे हुई बातो को बडे ध्यान से सुनते जा रहे है।

इधर आधी रात बीत जाने तक कृष्ण कक्ष मे नही आते है तो मईया यशोदा को चिन्ता होती है। वह उन्हे लेने नन्द बाबा के कक्ष मे आती है और उनको पता चलता है कि अक्रूर कान्हा को संग ले जाएगें फिर तो मईया यशोदा का रुदन ( रोना ) शुरु हो जाता है। अब वे कान्हा को अपनी गोद मे उनका सिर रख कर अपने हाथ से थपकी देती जा रही है। अपने लाला को सुलाने के लिए। पर कान्हा को कहाँ नींद वे तो सुबह अक्रूर जी के संग मथुरा जाने के लिए उत्सुक हुए जा रहे है। मईया से खुशी से कहते है ” अयि ( अरि ) मईया आज सारी लोरी सुऩा ले जीतनी थपकी देनी है दे ले कल मै अक्रूर जी के संग मथुरा देखने जाऊगा। मईया मेने सुना है । मथुरा मे बहुत बडी बडी अटारियाँ होती है। वहाँ सुन्दर भवन है। उद्धयान है। बहुत बडा बाजार है। वहाँ बाजार मे सब सामान मिलता है। पुरा नगर भव्य होता है। यह सब मै अपनी आँखो से देखूगा कितना मजा आएगा। “

इधर मईया यशोदा रोती जा रही है और बोल रही है – ” लाला अब तु अपनी मईया को छोड कर चला जाएगा तेरे बिना मै कैसे जीवित रह पाऊगी लाला । ” मईया का रुदन-क्रंदन करना और कृष्ण का मईया को रोते देख कर समझाते है कि– ” अयि मईया तु रोती काहे है मै कोई हमेशा के लिए थोडी जा रहाँ हुँ मथुरा। मै तो मथुरा मे लगने वाले मेले को देख कर बाबा के संग वापस लौट आऊगा। अब तु रोना बंद कर मईया मै भी तेरे बीना कैसे रह पाऊगा इस लिए जल्दी ही वापस लौट आऊगा। ” पर मईया का दिल कैसे माने अपने लाला से कभी दुर नही हुई है ना सो उसको डर लगना ही था। फिर मईया बोली — ” देख कान्हा कंस बहुत दुष्ट है उसने कोई चाल चली तु तो अभी नन्हा सा बालक है फिर तु क्या कर सकेगा उस दुष्ट ने तुझे कुछ करवा दिया तो। पहले भी बहुत बार उसने तुझे मरवाने की कोशिश की है। “

इस तरह मईया और लाला एक दुसरे को समझाने की कोशिश कर रहे है। फिर कान्हा को सुला कर मईया यशोदा उसके पास ही बैठी रही भोर होने का समय आया पर मईया का रोना रुकने का नाम ही नही ले रहाँ है। अब कान्हा को वह उठाना नही चाहती सोचती हैकि अक्रूर के विदा होने तक लाला सोता रहे फिर उससे भेजना नही पडेगा। मन मे बहुत डरी हुई है मईया कि मेरे लाला मुझसे छिन जाएगा। कभी रोते रोते बेहोश हो जाती है। तब नन्द बाबा आकर उन्हे सम्भालते है और समझाते है- ” अरि यशोदा बावली ना बन कान्हा को जाने दे देख मै भी तो उसके पिछे-पिछे मथुरा जाऊगा और मेरे संग गांव के सब लोग होगे तो कैसे कंस कुछ करेगा अपने लाला को। कंस को अपने लाला से क्या लेना देना जो वह लाला को मारेगा। ”

पर माँ का दिल होता ही ऐसा है जब अपने बच्चे पर कोई मुश्वित आने वाली होती है तो माँ को पहले ही अहसास हो जाता है। इस लिए विलख-विलख कर मईया रो रही है। सब का समझाना व्यर्थ हो रहाँ है। जब कृष्ण को मईया अपने संग अपने भवन मे ले गई फिर बलदाऊ और दुसरे लोग भी चले गए। अब नन्द बाबा के कक्ष मे नन्द बाबा और अक्रूर जी ही रह गए। सब के चले जाने के बाद नन्द बाबा अक्रूर जी के नजदीक जा कर बैठ गए और धिरे से पुछने लगे की ” कैसे इतनी जल्दी तुम कान्हा को लेने आ गए अपनी योजना के तहत तो कान्हा को युवा होने पर सभी विद्धाओ मे निपुन होने पर कंस के समक्ष भेजना था फिर इतनी जल्दी क्यो मुझे तो कुछ समझ नही आ रहाँ।”

कैसे हमारी यह गुप्त योजना कंस के कानो मे पड गई की वासुदेव पुत्र कृष्ण वृंदावन मे पल रहाँ है।” अब अक्रूर जी बोले ” यही तो चिन्ता मुझे अन्दर ही अन्दर खाए जा रही है कि अभी कृष्ण को कंस के सामने भेजने का समय नही आया पर अब कंस को खबर हो गई है इस लिए उसने मुझे ही चुना अपने भतीजे को उसके पास लाने के लिए।” अक्रूर जी ने कंस की सारी गुप्त योजना का भेद नन्द बाबा को बता दिया कि “कंस ने इन दोनो बालको को मरवाने के लिए गुप्त योजना रचि है। उसने अपने धुरंदर पहलवान चाणूर और मुष्टिक के संग कृष्ण और बलदाऊ का मल युद्ध करवा कर इन बालको के वध की योजना रच रखी है।” अब नन्द बाबा बोले ” फिर भी तुम इन दोनो बालको को ले जाने आ गए।”

अक्रूर जी ने जबाव दिया” अगर मै कंस की आज्ञा की अवहेलना करता तो वह किसी और को इन दोनो बालको को लेने भेज देता इस तरह अपना बना-बनाया खेल तो पुरी तरह से हमारे हाथ से चला जाता। अब मै पुरी कोशिश करुगा इन्हे बचाने की। रास्ते मे जाते समय इन दोनो बालको को कंस की सारी तैयारी के बारे मे बताऊगा और इन्हे अपने बचाव की युक्तियो से अवगत करवा दुगा। पहलवानी के सभी दाबपेच समझा दुगा और आने वाले हर संकट का सामना करने की योजना जो मेने तैयार की उस योजना को इन बालको को समझा दुगा।”

” फिर ये स्वयं अपनी रक्षा कर सकेगे और दुश्मन की चालो को नष्ट कर सकेगे।” सुबह हो गई है तो सभी गोप-गोपियो को पता चल गया है कि अक्रूर जी कृष्ण और बलदाऊ को अपने संग मथुरा ले जाने आये है। अब तो पुरा वृंदावन शौक मग्न हो गया है जीसे देखो वही यह कहता नजर आ रहाँ है। ” हाए कान्हा हम तुझे अक्रूर के संग नही जाने देगे। ” सभी गोपियो का रो-रो कर बुरा हाल हुआ जा रहाँ है। सब की मनोदशा खराब हुए जा रही है।

गोपियाँ कान्हा के पैर पकड कर रोती जा रही है और कह रही है ” कान्हा हम तुम्हे नही जाने देगी तुझ मे तो हमारे प्राण बसे है। तुम चले गए तो हमारा वृंदावन सुना हो जाएगा। तुम बीन हम कैसे रहेगे। हाय अक्रूर तुम तो बडे क्रूर निकले जो हमारे प्राण हमसे छिन कर लिए जा रहे हो।” मईया का हाल तो बहुत बुरा हुआ जा रहाँ है वह तो बुरी तरह से रो रही है रोते रोते मुर्छित हो कर घरती पर गिर पडती है। कभी होश आने पर नन्द बाबा से कहती है “तुम लाला का रोकते क्यो नही । लगता है हमारा काल हमारे सामने खडा है। हाए विधाता तु इतना निष्ठुर क्यो हुआ जा रहाँ है जो मेरे लाला को मुझसे दुर कर रहाँ है।” कभी अक्रूर के पैर पकती है कहती है। हे अक्रूर तुम कान्हा को मत ले जाओ इसके बदले मेरे प्राण ही ले जाओ मै कान्हा के बिना जी नही सकती ङै मेरा नन्हा सा लाल उस कंस के सामने कैसे जाएगा।”

दुसरी गोपिया मईया यशोदा को पकडती है उन्हे सहारा देती है। इधर गोपियो का हाल भी वही हो रहाँ है वह भी मईया की भांति विलख रही है। अक्रूर के पांव पकड कर विनती करती है। सबको रोते विलखते कृष्ण और बलदाऊ दोनो अक्रूर के संग रथ मे बैठ कर चलने लगते है। सभी गोप-गोपियो रथ के पिछे-पिछे अक्रूर से दया की भीख मांगते हुए चले जा रहे है। सब को लगता है कि वे अब कान्हा को वापस संग लेकर ही लौटेगें ऐसे संग रोते विनती करते रथ के पिछे पिछे चलते वे गांव की सीमा पार कर जाते है। फिर भी किसी को वापस जाने का मन नही लगता है सब मथुरा तक साथ ही जाएगे।

ऐसी स्थिति देख कर अक्रूर जी कान्हा को कहते है कि तुम रथ से नीचे उतर कर इनको समझा कर गांव वापस भेज दो। अब कान्हा रथ से नींचे उतरते है और सब को प्यार से समझाते है। पर कोई उन की बात सुनने को तैयार नही। पर धिरे-धिरे वे सब को शांत करते जा रहे है। ऐसी मिठ्ठी बाते सुन कर सब कान्हा को अनमने मन से विदा करते है। रथ आगे बढता है पर सभी गोप-गोपिया रथ को जाते हुए देख रहे है। उनके मन मे यही विचार है कि कान्हा हमे छोड कर कभी नही जाएगें। अभी रथ रुकेगा और कान्हा वापस लौट आएगे इस लिए बहुत से गोप और गोपिया वही बैठ कर इन्तजार करने लगे सुबह से शाम हो गई उन्हे वहाँ बैठे-बैठे पर कान्हा नही लौटे तो दुखी मन सब अपने-अपने घर लौट गए।

आज किसी को भी भुख नही लगी है। किसी ने भी घर मे चुल्हा नही जलाया है। सब को ऐसा प्रतित हो रहाँ है कि सब के प्राण निकल गए है। उनके अन्दर जान ही नही है। इधर अक्रूर जी रथ को तेजी से दौडाते जा रहे है और मन मे अनचाहे भय से ग्रसित हुए जा रहे है। मै इन बालको को अपने हाथो मौत के घर ले जा रहाँ हुँ। कितना स्वार्थी कैसे बन गया मै जो अपने साथ इन्हे मौत के मुँह मे ले जा रहाँ हुँ। पता नही कंस के वे पहलवान चानूर और मुष्टिक इन बालको को मार ना डाले। कहाँ वे इतने ताकतवर पहलवान और इन नन्हे बालके मे इतनी शक्ति कहाँ जो खुद को उन पहलवानो के हाथो से बचा पाएगे।

बहुत बडी दुविधा मे रथ को हाकते जा रहे है। अब रास्ते मे सरोवर दिखा तो अक्रूर जी स्नान कर के प्रभु वंदना करने के लिए रथ को रोक कर स्नान करने सरोवर मे जाते है। जैसे ही वे सरोवर मे डुबकी लगाते है तो उन्हे पानी के अन्दर दोनो भाई कृष्ण और बलदाऊ दिखाई देते है तो सोचते है मै तो इन्हे रथ पर बैठा कर आया था। अब ये यहाँ कैसे आ गए। फिर पानी से बाहर मुँह निकालते है तो उन्हे रथ पर भी वे दोनो बालक दिखाई देते है। ऐसा दुबारा करते है तब भी वही दोनो भाई नजर आते है। अक्रूर जी पहले तो घबरा जाते है।यह मै क्या देख रहाँ हुँ।

वे दोनो रथ मे भी नजर आ रहे है,और पानी के भीतर भी नजर आ रहे है। फिर सोचते है कही यह भगवान की माया तो नही। अब अक्रूर जी की समझ मे आ गया कि वे जीन्हे साधारण बालक समझ रहे है ये तो सर्वशक्तिमान भगवान ही है साक्षात । अब उनके मन की दुविधा जाती रही। उन्हे विश्वास हो गया कि कंस अब इन बालको का कुछ भी बिगाड नही सकता। इस तरह अक्रूर जी के मन को तसली हुई वे जान गए की सर्वशक्तिमान भगवान ही साक्षात श्री कृष्ण और बलदाऊ के रुप मे आए है। जब भगवान इनकी रक्षा स्वयं कर रहे है तो कौन इनको नुकसान पहुंचा सकता है। अब अक्रूर जी ने स्नान करके पूजा भक्ति करके रथ को मथुरा की तरफ हांक दिया। वे सब मथुरा मे पहुच गए। मथुरा के प्रवेशद्वार मे रथ पहुचते है अक्रूर जी ने दोनो बालको बलदाऊ व कृष्ण को रथ से नीचे उतार कर उन्हे उस स्थान पर जहाँ उनके रहने के लिए व्यवस्था की गई थी वहाँ पहुचने का स्थान बता कर खुद रथ को कंस के महल की तरफ ले चले।

कंस के महल मे जा कर अक्रूर जी ने बलदाऊ और कृष्ण के आगमण की सूचना कंस को दी। अगले दिन दोनो भाई तैयार हो कर नगर की शोभा देखने के लिए नगर की तरफ चले। रास्ते मे उन्हे एक रंगरेज कंस के कपडे ले जाता दिखा तो दोनो भाईयो ने उससे अपने पहनने के लिए कपडे मांगे तो वह रंगरेज उन पर तुनक कर बोलने लगा।उनसे लडाई करने पर उतारु हो गया। अब श्री कृष्ण को उस पर गुस्सा आया तो उन्होने रंगरेज को थप्पड मार कर जमीन पर दे पटका। उस रंगरेज के प्राण पखेरु वही उड गए। आगे उन्हे एक दर्जी दिखा उन दोनो भाईयो ने दर्जी से अपने कपडे अपने नाप की फिटिंग के करवाए।

कुब्जा पर कृपा करना—-

भगवान श्री कृष्ण कुछ आगे बढे ही थे की उन्हे राजमार्ग पर एक महिला हाथ मे एक पात्र लिए सामने से आती दिखाई दी। दोनो भाई वही रुक गए और उस से पुछने लगे —” हे सुमुखी हे मृगनैयनी तुम ये क्या लिये जा रही हो और कहाँ जा रही हो। तुम्हारा नाम क्या है। हमे यह सब जानने की उत्सुकता है कृपा हमे प्रश्नो का उतर दे कर शांत करे।” अब उस कुब्जा ने दोनो भाईयो की तरफ देखा और बोली ” हे नाथ मेरा नाम बहुवक्रा ( कुब्जा ) है। मै यह अंगराग बना कर लाई हुँ मै महाराज कंस की दासी हुँ। उनको मेरे हाथ से बना अंगराग ही पसंद आता है इस लिए मै रोज यह अंगराग ( उबटन,लेपन ) अपने हाथ से धिस कर तैयार करती हुँ और फिर इसे महाराज कंस के बदन पर लगा देती हुँ।”

अब श्री कृष्ण ने कुब्जा के हाथ से वो अंगराग ( लेपन ) ले कर अपने शरीर पर सुन्दर फूल पत्तियो के आकार बना कर उस लेपन से खुद को सजा लिया।अंगराग लगा कर भगवान श्री कृष्ण ने उस कुब्जा से कहाँ “तुमने हमे खुश किया है. इस लिए मै भी तुम्हारे पर उपकार करता हुँ।” अब श्री कृष्ण ने अपने हाथ की अंगुठे के पास वाली दो अंगुलियो से उसकी ठोडी को पकडा और अपने पैर के अंगुठे से उस कुब्जा के पैर को दबा लिया। अपने दुसरे हाथ से श्री कृष्ण ने कुब्जा की कमर मे हाथ डाल लिया था और जोर से उसकी ठोडी को ऊपर की तरफ उचकाया दो अंगुलिया से उस कुब्जा की ठोडी को ऊपर की तरफ खिंचा इससे कटक की ध्वनि उत्पन्न हुई और अब कुब्जा का कूबड नष्ट हो गया वह एकदम स्वस्थ्य नजर आने लगी वह बेहद सुन्दर बन गई क्योकि जीसको भगवान का स्पर्श प्राप्त हो जाए उसका निखार हो ही जाता है।

अब कुब्जा ने भगवान श्री कृष्ण के पैर पकड लिये और उसकी आँखो से अश्रुओं की धारा बह निकली। उसने भगवान श्री कृष्ण से कहाँ हे प्रभु आपने मुझ पर बहुत बडा उपकार किया है। अब आप मेरा अनुग्रह स्वीकार किजीए मुझ दासी को पावन करने के लिए आप मेरे संग मेरे घर मे आ कर मेरे जीवन को धन्य करे। भगवान श्री कृष्ण ने कुब्जा का मन रखने के लिए उसे कहाँ है ठीक है जब मेरा सारा काम पुरा हो जाएगा तो उस खाली समय मे तुम्हारे ही घर पर आ कर रहुुगा। अब कुब्जा के रुप के चर्चे पुरे नगर मे होने लगे थे वह बहुत सुन्दर हो गई थी। फिर कंस बध आदि सभी काम को करने के बाद भगवान श्री कृष्ण उस कुब्जा पर उपकार करने उसके घर मे रहने के लिए गए।

कुब्जा ने कृष्ण आगमन की बात सुन कर अपने पुरे घर की काया ही पलट दी । पुरे घर आँगन मे चंदोबे ( रंग-बिरंगी फरियाँ ) टांग दी पुरे घर को रंगरोगन करके सजा लिया था। घर पर सुन्दर बाटिका मे बहुत से खुशबुदार फूलो को लगाया। उन फूलो की महक से पुरा घर का वातावरण खुशनुमा बना हुआ था। सुन्दर गलिचें जमीन पर बिछाए हुए थे। घर के आँगन और मुख्यदवार पर सुन्दर रंगोली सजाई थी। सोने के लिए सुन्दर बैड, बैठने के लिए सिंहासन आदि से घर के आँगन व कमरों को सजाया हुआ था। अब वह कुब्जा सुन्दर तो हो ही गई थी उसने सुन्दर वस्त्र भी धारण कर लिए थे। कुब्जा ने पुरे घर को इस तरह सजाया था मानो जैसे आज दिपावली का दिन हो।

अब कुब्जा श्री कृष्ण को आँगन मे बैठा कर खुद उनके पिने के लिए केवडा मिश्रित जल लाई। उसने पुरे घर मे इत्र छिडक कर घर को महकदार बना दिया। इसके बाद वह श्री कृष्ण के लिए भडिया-भडिया पकवान जो उसने उनके आगमन की खुशी मे बनाए थे वे सब खाने के लिए लाई श्री कृष्ण को भोजन करवा कर वह अब उनके समीप आ कर बैठ गई और उनको निहारने लगे। इस तरह कुब्जा से प्रित निभा कर कुछ दिन रह कर फिर कुब्जा से विदा देने का आगृह किया पर कुब्जा का मन भरा नही था इस लिेए उन्हे उसने कुछ दिन और रुकने के लिए कह दिया अब कुछ दिन और बिते भगवान श्री कृष्ण कुब्जा के घर से विदा ले कर राज महल मे प्रस्थान किया।

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