भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद से निकली ज्ञान गंगा का रस-पान,गीता के सार तत्व का ज्ञान

भगवान श्री कृष्ण ने गीता मे मनुष्यो, प्राणी मात्र की भलाई के लिए बहुत से ज्ञानोपदेश तत्वो को उजागर किया है। इन ज्ञानोपदेश तत्वो के सार को उनके महत्व को समझ कर प्रत्येक प्राणी जीवन मे आने वाले दुखो से बाहर निकल कर अपने जीवन को सही ठंग से व्यतित कर सकते है। गीता मे बताए श्लोक मे से कुछ श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है जीनका हमारे दैनिक जीवन मे उपयोग होता है। बहुत से श्लोक ऐसे है जीनसे हमे दुनिया से परे की बातो का ज्ञान प्राप्त होता है।

आत्मा क्या है ? आत्मा को कौन नष्ट कर सकता है ? आत्मा अमर है या आत्मा मिटने वाली होती है आत्मा नष्ट होती है ? इस तरह के विचार अर्जुन के मन मे आने लगे और वे भगवान श्री कृष्ण से आत्मा का रहस्य जानने के लिए इन सभी प्रश्नो के बारे मे पुछा, अर्जुनोवाच—–अर्जुन ने बोला, हे केशव,हे मधुसूदन,क्या आत्मा अजन्मा है,या आत्मा का जन्म मरन होता है। अगर आत्मा जन्म लेती मरती है तो वो सास्वत कैसे है? हे केशव आत्मा का पोषण कौन करता है? क्या सभी प्राणीओ की आत्मा एक समान होती है या अलग होती है? हे माधव क्या आत्मा का कोई आकार या रंग रुप होता है? हे पार्थ आत्मा के विषय मे मुझे भ्रम पैदा हो रहाँ है। मेरे इस भ्रम को आप दुर करने वाला ज्ञान दो जीससे मै आत्मा और शरीर के रहस्य को समझ सकू।

अर्जुन की जीज्ञाषा को शांत करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने आत्मा का ज्ञान अर्जुन को दिया। कृष्णोवाच—–भगवान श्री ने आत्मा के रहस्यो को इन शलोको के द्वारा अर्जुन को ज्ञान दिया।

नैनम छिंद्रन्ति शस्त्रानि, नैनम देहती पावकः ।

न चैनम क्लेदयन्त्यापो , न शोषयति मारुतः ।।

इस श्लोक का भावार्थ——-

भगवान श्री कृष्ण के आत्मा के बारे मे दिए उपद्देश कि हे पार्थ, आत्मा को कोई भी शस्त्र नही काट सकता उसको कोई शस्त्र या हथियार नष्ट नही कर सकता। आत्मा को कोई भी आग जला नही सकती। आत्मा को कोई पानी भिगो नही सकता । आत्मा को कोई हवा सुखा नही सकती।

भगवान के इन कथनो के अनुसार आत्मा अजर- अमर है। आत्मा का कभी नाश नही होता। उसे कोई मिटा नही सकता।आत्मा सभी प्राणियो मे विराजमान है। आत्मा ना कभी कुछ बुरा करती है ना ही आत्मा कभी किसी का भला करती है। अपना भला- बुरा इन्सान खुद करता है। यानि यह नाशवान शरीर ही सब भोग भोगता है। आत्मा सभी प्राणी की समान होती है। आत्मा सबकी एक समान ही होती है, हर छोटे-बडे सभी जीवो की आत्मा एक ही समान होती है। जो आत्मा हाथी के शरीर मे विराजमान है, ठीक वैसी ही आत्मा एक चिंटी के शरीर मे भी विराजमान है।

आत्मा सदा अमर है। आत्मा का भोजन है प्यार और प्रभु भक्ति जो प्राणी एक दुसरो मे प्यार बांटते है, और प्रभु चिंतन मे लगे रहते है, उनकी आत्मा शांत रहती है और जो लोग व्यसनो, काम ईच्छाओ की पूर्ती मे दिन-रात लगे रहते है उनकी आत्मा सदैव अशांत रहती है। जब आत्मा अशांत रहती है, तो मनुष्यो को दुख की अनुभुति होती है। वे सदा दुखी रहते है।जो प्रभु भक्ति मे और दुसरो मे प्यार बांटने मे लगे रहते है। उनकी आत्मा शांत रहती है इस लिए वे सदैव सुखी रहते है उनको दुख की अनुभुति नही होती है। उनका मन शांत तो वे किसी भी तरह के दुख-सुख से नही घबराते सदैव शांत बने रहते है,जब्कि वासनाओ मे लिप्त प्राणी दुखो से घिरा महसुस करता है।

आत्मा की खुराक प्यार है तो क्यो नही हम एक दुसरो के संग प्यार से रहे। हमे एक दुसरे के संग प्यार से रहने मे ही भलाई है। नफरत करने से सिर्फ हम खुद को ही तकलीफ मे डालते है, मगर जब हम सबसे प्यार के साथ व्यवहार करते है, तो हमारा मन खुश रहता है। अब चाहे परिस्थिति कैसी भी क्यो ना हो जब प्यार बांटेगे तो बदले मे हमे प्यार ही मिलेगा जब प्यार मिलेगा तो आत्मा शांत रहेगी और जब आत्मा शांत होती है, तो हमे कोई दुख नही रहता। फिर कैसा दुख कैसा सुख सब समय सम भाव से रह सकते है।

हम अपनी ईच्छो-वासनाओ की पूर्ती के लिए भला बुरा सब कुछ कर बैठते है। करते समय तो हमे बहुत आनन्द आता है, पर जब इसका परिणाम आता है तो हमे सुख-दुख की अनुभुति होती है। अगर हमने कुछ गलत किया है तो इसके लिए भविष्य मे हमे दुख भोगना पडेगा, और अगर हमने सही मार्ग चुन कर अपनी ईच्छाओ वासनाओ की पूर्ती की तो भविष्य मे हमे सुख होगा इस लिए सुख- दुख हम ही बनाते है अपने जीवन मे दुसरा कोई नही हमारे जीवन मे दुख पैदा करता।

सुख मिलता है तो हम खुश रहते है और जब दुख मिलता है तो हम दुखी होते है। हम निराश हो जाते है। और भगवान को कोसने लगते है, हे भगवान तुने मेरे जीवन मे इतने दुख क्यो भरे या फिर हम किसी प्राणी को अपने दुखो का कारण मान कर उससे द्वेष करते है। उससे ईष्या के भाव हमारे मन मे उत्पन्न होने लगते है। मन ही मन उसका बुरा करने की योजनाए बनाने लगते है। मौका मिलने पर हम उस प्राणी का बुरा करने के प्रयत्न भी करते है।

हम यह क्यो भुल जाते है कि हमारे ये दुख हमारी सिंचित पुंजी ( जमा किया धन ) है हमने ही तो अपनी ईच्छाओ और वासनाओ की भुख शांत करने के लिए उचित-अनुचित किसी भी बात का ध्यान नही रखा और लगे रहे अपनी वासनाओ की पूर्ती मे। इस लिए कभी भी हमे अनुचित मार्ग पर चल कर कोई काम नही करना चाहिए, चाहे स्थिति कैसी भी हो। हमे अपने लिए गलत तरीके से अपनी जरुरतो की पूर्ती नही करनी चाहिए। जो है जीतना है या जो हमे निति पूर्ण रह कर मिल जाए उसी मे संतोष कर लेना चाहिए।मृग तृष्णा मन मे नही रखनी चाहिए।( मृग तृष्णा –मृग यानि हिरण,हिरण की नाभी मे कसतूरी होती है।कसतूरी की सुगंध इतनी अच्छी होती है कि इस सुगंध की खोज मे मृग पागलो की भांति इधर -उधर दौडता है उसे समझ नही आता की ये सुगंध आ कहाँ से रही है, जबकि यह सुगंध उसकी अपनी है, पर वो बाहर उस सुगंध की खोज मे जीवन बिता देता व्यर्थ भाग-दौड करता है सुगंध के सुख के लिए )

इसी प्रकार प्राणी- मनुष्य सुखो के लिए ना जाने क्या-क्या कर्म करता फिरता है। सुख उसे फिर भी नही मिलते व्यर्थ भाग-दौड कर मृग की भांति अपना जीवन नष्ट कर देता है। वो तनिक(थोडे से) सुख के लिए असली सुख को भुल जाता है असली सुख तो आत्मा की तृप्ति,आत्मा की शांति मे है। अगर आपको भरपुर प्यार मिले, प्रभु भक्ति मे रमे हो तो आपके पास चाहे पैसा धैली कुछ भी नही एकदम फकड होने पर भी आपको सुख की अनुभुति होगी।

अगर आप बहुत कुछ हांसिल कर के दुनिया के सबसे बडे धनी भी बन गए पर आपकी आत्मा का पोषण नही हो रहाँ,यानि आपको भरपुर प्यार या प्रभु भक्ति मे आपने अपने मन को नही लगाया तो वो भरपुर धन भी आपकी आत्मा को तृप्त नही कर सकता और आप अशांत रहने लगते हो आपकी आत्मा व्याकुल रहती है। यही आपके जीवन मे दुख का निर्माण होता है। इस लिए दुख सुख के निर्माता आप खुद है और हम दोष दुसरो को देते है। इसने हमारे संग ये किया उसने वो किया इस लिए हम दुखी है।

नही जी आप दुखी अपने कर्मो की वजह से हो गए। अगर आप नित्य प्रति उठते-बैठते उस परम पिता परमात्मा का चिंतन करेंगे और किसी भी चिंज की अभिलाषा नही करेंगे जो मिल गया प्रभु कृपा समझ भगवान का प्रशाद मान कर उसका मन से उपयोग करेंगे । मन मे संतोष रखेंगे, तो आपको कोई भी दुख नही सताएगा। आप इसका अनुभव खुद करे एक बहुत धनी व्यक्ति है। उसके पास किसी चिज की कमी नही फिर भी उसका मन अशांत है, वो अपने मन को खुश करने के लिए बाहरी साधनो की खोज करता है। दिन-रात लालषा बढती जाती है, और वो अशांत मन भटकते-भटकते जीवन यूही बिता देते है। वो दुसरो का शोषण कर के सुख लेना चाहता है।

यानि वो सुख खरीदने का काम कर रहाँ है। एक तरफ आप एक ऐसे व्यक्ति को देखे जीसके पास एक पैसा नही यहाँ तक की उसके पास पहनने को कपडे भी ढंग से नही, खाने को मिल जाता है तो खा लेता है नही मिलता तो भुख सह लेता है, फिर भी संतोष उसके पास रहता है। उसे किसी चिज की लालसा नही किसी मृग तृष्ना के पीछे वो नही भाग रहाँ है। एकदम शांत है बिलकुल ठहरे हुए पानी की तरह।वो अपनी नींद सोता है जहाँ और जैसी जगह मिल जाए आराम से अपनी नींद पुरी कर लेता है। मगर मृग तृष्णा वाले लोग ऐसी पुरी नींद नही ले पाते नींद लेने के लिए बाहरी चिजो का सहारा लेते है जैसे दवाई बगैरहा।

रे मन हरि का भजन करले रोज थोडा- थोडा प्रभु से मिलन करले रे मन हरि का सुमिरन करले काहे व्यर्थ मे अपना समय खराब करे रे मन प्रभु भजन मे रमन कर ले अपना हीत साध रे वंदे भक्तिमय जीवन कर ले रोज थोडा-थोडा हरि का भजन करले।।य दि हम सारा दिन तो प्रभु भजन नही कर सकते पर दिन का कुछ समय प्रभु चिंतन मे जरुर लगाना चाहिए, ताकि बाहरी ताप दुख क्लेश हमे तोड कर ना रख दे हम सुखी जीवन जी सके।

हमे अपनी मेहनत से जो मिल जाए जीतना मिल जाए उस से खुश होकर अपना और अपनो का पोषण करना चाहिए। लालसाओ के पीछे ना भागे। लुट-खसुट कर चोरी बेईमानी करके किसी का अहित कर के धन ना कमाए और हो सके तो अपनी संतानो को भी सही रहा पर चलने की सलाह दे ताकि वे एक नेक और अच्छे इंसान बन सके। जीतना सम्भव हो हमे दुसरो की आत्मा की शांति के लिए दुसरो से स्नेहपूर्वक प्यार से रहना चाहिए।

आप के पास जो है उससे दुसरो का भला करने की कोशिश करनी चाहिए जैसे आपके पास धन है तो आप अपने धन से दुसरो की भलाई के कर्म करे। आपके पास भरपुर धन है तो अपने धन कोष से जरुरतमंद लिए कुछ खर्च कर दे तब देखिए इससे आपकी आत्मा कैसे तृप्त हो जाएंगी आपको एक अलग ही प्रकार की शांति की अनुभुति होगी। अगर आपके पास धन नही पर आपके पास ज्ञान कोष भरा पडा है तो आप दुसरो मे जीतना हो सके ज्ञान बांटे इसे पाने वाला और देने वाला दोनो को आत्म संतुष्टि मिलेगी आत्मा शांत होगी और आपको खुशी मिलेगी।

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