भगवान श्री कृष्ण के गीता मे दिए ज्ञान का सार,तत्व ज्ञान

भगवान श्री नारायण ने कृष्ण अवतार मे अर्जुन के माध्यम से सभी प्राणी मात्र को ज्ञान रुपी गंगा मे नहला दिया और मनुष्यो को क्या करना उचित और क्या नही करना सही है। इसका ज्ञान उन्होने महाभारत के युद्ध मे अर्जुन को समझाया अर्जुन तो निमित मात्र था। उनका इस उपद्देश को देने का मकसद प्राणियो के हीत साधक ज्ञान से परिचित करवाना था।अगर हम गीता को बहुत ध्यान से पढे और उसके तत्वो के सार को ठीक से समझ ले, तो अपने जीवन को नेक और सुखी बना सकते है। गीता मे उपद्देशकृत संदेशो के अनुसार जीना सिख जाए तो हम कोई गलत कार्य नही करगे धर्म युक्त राह पर चल कर ही हम जीवन को सुचारु रुप से निर्वहन कर सकते है।

जीवन मे अगर काम क्रोध मोह लोभ होंगे तो इनके क्या दुष्परिणाम हमे भोगने पडेंगे इसके लिए भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो उपद्देश दिये उनके तथ्यो का सार समझाया, कि किस तरह से मनुष्य वासनाओ के हाथ फस कर अपना कैसे सर्वनाश कर लेता है। उन विषय-वासना मे लिप्त मनुष्य अपना भला बुरा भी नही जानता है, और किस तरह अपने को खुद ही वासनाओ का गुलाम बना लेता है।

गीता का श्लोक—–

ध्यायतो विषयान्पुंसः सड्गस्तेषूपजायते ।

सड्गात्संजायते कामः कामात क्रोद्धोभिजायते ।।

क्रोधाद्भवति संमोह संमोहात् स्मृतिविभ्रम।

स्मृतिभ्रंशातबुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणस्यति ।।

अर्थात-( इस श्लोक का सार तत्व )—-

मनुष्यो को कभी भी विषयो ( कामनाए जो अहितकर हो) के बारे मे नही सोचना चाहिए, क्योकि विषयो का चिन्तन करते रहने से मनुष्य मोह माया के गहरे दल-दल मे फस जाता है। ये विषय वासनाए एक जहरीले अजगर की भांति मनुष्यो को अपने लपेटे मे ले लेती है, फिर मनुष्य का इसके बंधन को तौड कर बाहर सुरक्षीत निकलना मुश्किल हो जाता है। इन्सान इन विषय-वासनाओ के चक्कर मे पड कर अपना सर्वनाश कर बैठता है। अपनी बुद्धि का खुद ही अपने हाथो नाश कर बैठता है, और इसका परिणाम मनुष्य को अंत मे केवल पछतावा ही हाथ लगता है। जहाँ तक हो सके इन विषय-वासनाओ से दुर रहने की कोशिश करनी चाहिए। किसी भी प्रकार की अहेतुक कामनाए मन मे नही पालनी चाहिए, नही तो मनुष्य के लिए दुख ही उत्पन्न होंगे मन मे क्षोभ ( कामना पुर्ती के लिए मन मे व्याकुलता ) बढता ही जाएंगा।

जब मनुष्य विषय-वासनाओ के चिन्तन मे रहेगा तो उन विषय-वासनाओ की पूर्ती करने के यत्न करेगा। इन यत्नो मे कभी वो असफ तो कभी सफल हो सकता है। जब मनुष्य अपनी विषय -वासना ( अभिष्ट चिज,वस्तु,सम्बंध ) की पूर्ती करने मे सक्ष्म हो जाएगा तो उसमे उस विषय-वस्तु ( वस्तु या रिस्ते ) से उसे राग उत्पन्न होगा ,राग भडेगा,यानि मनुष्य को उन विषय-वस्तु मे आशक्ति, लगाव बढने लगेगा। इस तरह विषय-वस्तु से लगाव, आशक्ति बढने पर उस के मन मे उस विषय-वस्तु से मोह उत्पन्न हो जाएंगा। जब मोह उत्पन्न हो जाता है तो मनुष्य उन विषय-वस्तु का गुलाम बन जाता है। दिवानो की तरह उस विषय- वस्तु को भोगने उससे विषय सुख लेने मे उसकी रुचि बढती जाती है और वो अपना भला- बुरा,समय, उसके परिणाम किसी का भी चिंतन नही करता।

ऐसी हालत मे मनुष्य को नही पता चलता कि वो खुद अपने लिए एक गहरा गढा खोद रहाँ है, जीसमे एक दिन वो खुद गिर कर अपना सर्वनाश कर लेता है। अब मोह हुआ तो उस मनुष्य के लिए उसे सकून मिलने लगेगा मगर उन विषय-वस्तुओ की उसकी कामना पूर्ती नही होती है तो उसके मन को ठेस लगती है, और वह मन मे क्रोद्ध पाल लेता है। उद्हारण के लिए मान लो की किसी मनुष्य को मन मे एक सुन्दर नारी जो उसकी काम-वासना की पूर्ती करती है। तो उस पुरुष को उससे मोह होने लगता है। उसके लिए उचित- अनुचित किसी का भी ख्याल ना करते हुए वो उस नारी को खुश करने के लिए दुसरो को पीडा पहुचाता है। ,दुसरो का अहित कर देता है। यहाँ तक की वो उस प्रिय नारी ( प्रिय नारी इस लिए क्योकि वो उसकी विषय-वस्तु यानि उसकी काम वासना की पूर्ती करती है ) के लिए किसी भी हद तक जाकर उसे खुश रखने की भरपुर कोशिश करता है। इस तरह वो मोह मे फस जाता है।

मोह हुआ तो ठीक पर अगर उस मनुष्य की विषय-वस्तु उसे प्राप्त नही होती है तो उसके मन मे क्रोद्ध उत्पन्न हो जाता है उदाहरण के लिए—जब किसी को उसकी पसंद यानि के जीस लडकी को उसने अपना बनाने की सोची और वो लडकी उससे किसी तरह का सम्बंध नही रखती उसके पास नही आती तो वो पुरुष उस लडकी के प्रति द्वेष भाव रखने लगता है। हर समय उस लडकी को नीचा दिखाने की कोशिश करता है। उसे बदनाम करता है। उस लडकी और उसके परिवार वालो को बुरा- भला कहता है,गाली-गलोच करता है, या फिर मोके की तलाश मे रहता है, की कब मोका हाथ लगे तो उससे बदला लिया जाए।इसके लिए नई-नई योजनाए बनाता है।

जब मोका मिलता है तो वो जो करना समाज की दृष्टि से अनुचित है, वो भी कर गुजरता है। इस तरह उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जब बुद्धि बिगड जाती है, तो उस मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है, और विवेक नष्ट होने पर उसको भले-बुरे का ख्याल नही रहता और इस कारण वह वो सब कर बैठता है जो उसके लिए घातक होता है, पर विवेक सून्य मनुष्य इन सब बातो के बारे मे मनन कर ही कैसे सकता है।उदाहरण के लिए–जब मनुष्य किसी विषय-वस्तु की प्राप्ति ना होने पर उसे पाने के लिए समाज के नियमो,कायदे-कानूनो को तौड कर सब हदे पार करके अपनी अभिष्ट विषय-वस्तु को पाने के लिए कुछ गलत कदम उठा लेता है।

जीसके कारण उस मनुष्य को सख्त से सख्त सजा मिलती है और उसको जेल मे अपना जीवन बिताना पडता है। या यू कहे की उसे उसके कर्मो के परिणाम भोगने के लिए समाज उसका बहिष्कार कर देता है, लोग उससे अपना मुँह मोड लेते है, और जब उसको होश आता है यानि अपने कर्मो पर ध्यान जाता है तो उसके मन मे क्षोभ उत्पन्न होने लगता है। वो ग्लानिवश अपने को कोशने लगता है, या फिर अपनी जान लेने की कोशिश करता है।इस तरह मनुष्य वासनाओ,कामनाओ के चक्कर मे खुद ही अपना नाश कर बैठता है।

इस तरह भगवान श्री कृष्ण ने समझाते हुए अर्जुन से कहाँ तुम भी अपनी विषय-वस्तु का त्याग करो। अर्जुन की विषय-वस्तु यह कि अर्जुन मोह के गर्त मे गिरता जा रहाँ थो उसे युद्ध के मैदान मे खडे दोनो तरफ के लोग सभी अपने ही नजर आ रहे थे। मोह के जाल ने उसे जकड रखा था। वो अपने प्रियजनो से युद्ध करके उन्हे मौत के घाट उतारने की हिम्मत नही हो रही थी। वो बार-बार भगवान श्री कृष्ण से यही रट लगाए बैठा था कि मै अपनो का नाश कैसे करु मेरे सामने जो सैना खडी है वे सब मेरे अपने है।

भीष्मपितामह की तरफ देख कर अर्जुन श्री कृष्ण से कहते है– हे केशव तुम ही बताओ मै अपनो पर वार कैसे करु? ये वे पितामह है जीन्होने मुझे अपनी गोद मे बैठा कर अपना प्यार मुझ पर लुटाया। इन्होने मेरे धुल से सन्ने कपडो की परवाह किये बिना ही सदैव मुझे गले से लगाया। आज मे नीजी स्वार्थ एक भूमि के टुकडे के लिए इनके टुकडे-टुकडे कैसे कर सकता हुँ। फिर द्रोणाचार्य की तरफ इशारा कर के अर्जुन ने कहाँ ये मेरे आदरणीय गुरुजन है, जीन्होने मुझे अपनी ज्ञान गंगा से भिगोया।जीन्होने मुझे धनुष चलाना सिखाया।

जीन्होने मुझे अपनी सारी कला सिखा कर एक योग्य धनुर्धर बनाया आज अपने हीत के लिए उन्ही के दिये ज्ञान का प्रयोग उन्ही पर कैसे कर सकता हुँ। हे केशव, हे माधव ,अब तुम ही बताओ क्या मै गलत कह रहाँ हुँ?क्या ये मेरा मोह का बंधन है? क्योकि हे पार्थ आपकी वाणी से तो यही प्रतीत हो रहाँ है। हे पार्थ मुझे उचित-अनुचित का सही ज्ञान दो किस कर्म को करना हीत कर है और किस कर्म को करना अहीत कर। मुझे जरा विस्तार से बताओ। मेरी बुद्धि भ्रंश हो रही है। मुझे क्या गलत और क्या सही कुछ नही सूझ रहाँ। मै एक सून्य मे आ कर खडा हो गया हुँ।

अर्जुन को इस तरह एक साधारण मनुष्य की भान्ति विलाप करते देख भगवान श्री कृष्ण ने फिर अपना उपद्देश देना शुरु किया। भगवान श्री कृष्ण बोले हे कौंतेय,हे प्रिय सखा तुमने मुझसे सही मार्ग बताने की बात कही है इस लिए मै तुम्हे ये दिव्य ज्ञान जो ऋषि-मुनियो को भी दुर्लभ है आज तुम्हारी इस तरह व्याकुलता,भयातुर हालत देखते हुए बता रहाँ हुँ, जरा ध्यान से मेरे बताए मार्ग के बारे मे सुनना। कायरो की भान्ति शोक बंद कर के मै जैसे बताता हुआ वैसे ही करो क्योकि एक क्षत्रिय को शोक करना उचित नही और युद्ध करने से घबराना क्षत्रिय को शोभा नही देता। इस प्रकार कहँ कर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो दिव्य ज्ञान दिया इसे गीता के नाम से जाना जाता है।

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