भगवान श्री कृष्ण की औखल लीला

भगवान श्री नारायण के दस अवतार हुए जीनमे से एक अवतार श्री राम का और एक अवतार श्री कृष्ण हुए। प्रश्न– भगवान नारायण को अवतार लेने की जरुरत क्यो होती है ? उतर –भगवान अपनी लीला करने के लिए संसार मे जीव प्राणी को खुशियाँ देने, दुष्टो का दमन करने , संतो को अपना सामिप्य देने, के साथ संसार के प्राणी वर्ग को जीवन जीने की कला सिखाने के लिए अवतार लेकर धरा पर अवतृत होते है।

भगवान श्री नारायण के दस अवतार है (1) सत्यनारायण अवतार (2) श्री हरि अवतार,(3) कछप अवतार,(4)मतस्य अवतार,(5) वाराह अवतार,(6) नृसिंह अवतार,(7) मोहनी अवतार,(8) श्री राम,(9) श्री कृष्ण, (10) (श्री कल्गि अवतार

भगवान नारायण ( विष्णु) के श्री कृष्ण अवतार मे बाल लीलाए मन को आनन्द प्रदान करती है और भगवान श्री राम की युवा अवस्था मे की गई लीलाए हमे जीवन को आदर्श तरीके से जीवने की शिक्षा प्रदान करती है। श्री राम ने बहुत से आदर्श हमेसिखलाए जीन्हे अपना कर हम एक आदर्श पर चल कर नेक बन सकते है। वही श्री कृष्ण ने बाल्यकाल मे बहुत सी ऐसी लीलाए की जीन्हे देख,सुन और पढ कर हम आनन्द विभोर हो जाते है और उनकी नटखट अदाओ पर तो हर कोई फिदा हो जाता है। उनका भोला-भाला मासुम सा चेहरा जब कल्पातित होता है मन भाव विभोर हो कर उनको गोपियो की तरह झट गोद मे उठा लेने के लिए आतुर हो जाता है।

भगवान श्री कृष्ण ने बालक काल मे बहुत अदभुत लीलाए की जीन्हे हम सब पढ सुन चुके है। तो आज हम उनकी बहुत ही प्यारी लीला औखल लीला मे प्रवेश करते है आईए आप सबका भी भगवान श्री कृष्ण की इस औखल लीला मे स्वागत है।

भगवान श्री कृष्ण छोटे थे तो एक बार वो माँ की गोद मे बैठ कर दुध पी रहे थे। माँ यशोदा उन्हे अपनी गोद मे बैठा कर दुध पिला रही थी साथ ही ुन्हे प्यार कर रही थी प्यार से उनके सिर पर हाथ फैरती, कभी उनके नन्हे-नन्हे हाथो पैरो को अपने हाथ से छुती,कभी उनके सुन्दर मुखारबिंद को निहार-निहार कर आनन्द मग्न होती,कभी उनके साथ प्यार से तोतली- तोतली बोलती और साथ उन्हे दुध पिलाती।इतने मे अचानक मईया यशोदा को याद आया की वे चुल्हे पर दुध चढा कर आई है कही वो बर्तन से उब्ल-उब्ल कर बाहर तो नही बिखर रहाॅ। दुध की बात याद आते ही यशोदा मईया कन्हिया ( श्री कृष्ण ) को गोद से उतार कर जमीन पर बैठा देती है और दौड कर रसोई मे चुल्हे से दुध उतारने चली जाती है।

नन्हे कान्हा ( श्री कृष्ण ) मईया की इस बेरुखी को बरदास नही कर सके। पहले तो इधर-उधर देखने लगे फिर अचानक जोर-जोर से रोना शुरु कर दिया।मईया यशोदा तो रसोई मे चुल्हे से दुध उतार रही थी उनका ध्यान दुध की तरफ था उन्होने कन्हिया का रोना आवाज लगाना नही सुना तो कन्हिया इस बात से बहुत गुस्से हुए मईया से नाराज हुए। मईया को मुझसे ज्यादा दुध की चिन्ता हो रही है मईया को मेरी परवाह नही मै भुखा हुँ। तब कन्हिया ने गुस्से से पास पडे दही,माक्खन के माटो (बडे मटके )को डंडे से तौड दिया।अब उन टुटे हुए माटो से दही,मक्खन बहने लगा और जब तक मईया आई तब तक सारा दही,मक्खन बिखर गया था।

चारो तरफ बिखरा माखन और माटो के टुकडे बिखरे पडे थे। यह सब देख कर मईया को कान्हा पर गुस्सा आया तो मईये ने हाथ मे एक छडी लेकर कान्हा को मारने के लिए उठाई यह देखते हुए की मईया अब बहुत गुस्से मे है और हाथ मे छडी भी उठा ली है अब खैर नही आज ते मईया के कोमल हाथो से मार पडने वाली है। अपने को मईया की छडी से बचाने के लिए कन्हिया इधर-उधर बागने लगे और चिल्ला-चिल्ला कर मईया से अपनी तोतली बोली मे माफी मांनने लगे (मईया मोके माफ कल दे ) पर मईया ने मन मे सोचा आज तो इसकी खबर लेनी ही पडेगी बहुत बिगड गया है।

अब तो कन्हिया अपने बचाव के लिए आगे और मईया पिछे-पिछे भाग रही थी पर कन्हिया हाथ ही नही आ रहे थे। बीच मे कोई गोपी आती कन्हिया को मईया की मार से बचाने तो मईया गोपी पर नाराज होती। अब तो गोपिया भी मईया और कन्हिया की इस भाग दौड का आनन्द लेने लगी। कोई गोपी दौड कर कन्हिया को बचाने के लिए उन्हे अपनी गोद मे छुपा लेती। कोई गोपी मईया को रोकती ऐ री यशोदा काहे मार रही हो इन छोटे से लाला को देख कैसन डर गया बेचारा तेरी मार से मईया सबके हाथ छिटक कर फिर कन्हिया के पिछे भागती। जब मईया कन्हिया के पिछे-पिछे भागते बुरी तरह थक गई पसीनो-पसीन हो गई तो मईया एक जगह बैठ कर हाफने लगी।

(मईया मोहे ना मार मै तो तेरो छोटो सो लालो री )

अब तो कन्हिया को मईया की इस हालत पर तरस आया और चुप-चाप मईया की गोद मे जा कर बैठ गये।तोतली बोली मे बोले मईया मोहे काहे मालती हो अब रोओ मत मै आ गया तोके पास अब मार लियो मोके। मईया को भी कन्हिया की इस तोतली बोली पर हँसी आई और गुस्सा शांत हो गया तब मईया ने उन्हे छडी से मारने की बात छोड दी। पर मन ही मन सोचने लगी आज इसे ऐसे ही छोड दिया तो इसकी शरारते ऐसे ही भडती जाएगी इस लिए इसे सजा तो देनी चाहिए पर क्या सजा दुँ की इसको सबक मिल जाए। फिर मईया को किली पर टंगी गाय को बांधने वाली रस्सी नजर आई अब मईया को सजा देने का नया तरीका हाथ लग गया।

मईया ने किली से रस्सी उतारी और कन्हिया के हाथ पैर बांधने लगी। मईया रस्सी बाध ही रही थी की मईया ने देखा की यह रस्सी तो छोटी पड गई अब क्या करे इस लिए मईया दुसरी बडी रस्सी ढुंढ कर लाई और फिर से कन्हिया को बांधने लगी। अब फिर रस्सी छोटी पड गई। मईया फिर से उससे बडी रस्सी लाई वो भी छोटी पड गई। घर पर जीतनी रस्सिया थी मईया ने सब को बांध कर देख लिया पर सभी रस्सी छोटी पडती। अब मईया ने सब रस्सियो पर गांठ लगा कर बांधा तब भी पहले की तरह ही रस्सी दो अंगुल छोटी रह गई। मईया जैसे ही रस्सी बांधती कन्हिया अपने शरीर को सूक्ष्म रुप से फैलाते जाते थे ।इस लिए सभी रस्सिया छोटी पडती जाती।

सभी गोपिया यह देख कर अचम्भा करती और हँसती यशोदा तेरे वश का ना है कान्हा को बांधना तु इसे छोड दे।मईया जब हार गई तो कन्हिया खुद ही रस्सी से बंध अब वो रस्सी कन्हिया को बांधने मे छोटी नही पडी। मईया ्ब एक औखल लाई उससे कन्हिया को बाध कर कुध घर के काम-काज मे लग गई। ( बहुत से संतो का मत है की कन्हिया को बांधती वक्त रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी पडती इसका कारण यह कि जीव भगवान और माया के बीच फसा रहता है। जीव और भगवान के बीच माया आ जाती है। यह माया जीव को इधर- उधर भटकाती रहती है।

माया जीव के लिए भगवान से मिलने के मार्ग मे एक पर्दा बन कर रहती है। जैसे किसी कमरे मे लगा दरवाजे पर पर्दा टंगा रहने से पर्दे के पार अंदर कमरे मे नही देखाई देता वैसे ही यह माया हमे भगवान तक नही पहुंचने देती जीव माया के भ्रम मे उलझा रहता है। जब यह माया जीव के आगे से हट जाती है तो जीव का मिलन भगवान से हो जाता है । इस लिए हमे माया के जाल से निकलना चाहिए, कुछ संतो का मत है कि दो अंगुल रस्सी छोटी पडने के पिछे भगवान का इशारा तम और रज गुणो की निवृति है यानि तम–काम, क्रोध मदसर,रजोगुण मतलब लोभ मोह लालच इन सब बुराईयो को छोडने के बाद ही जीव शुद्ध होता है और उसका मन निर्मल होता है तभी भगवान को पाया जा सकता है। )

जब मईया कान्हा को औखल से बांध कर अपने काम- काज मे लग गई तो कान्हा ने एक और लीला करने की सोची। अब वो औखल से बंधे-बंधे औखल को अपने संग घसिटते हुए पुरे आँगन मे घुमने लगे। आँगन मे बालक खेल रहे थे। कान्हा औखल मे बंधे इधर-उधर जब डौल रहे थे तो वे दो पेडो के बीच से निकलने लगे जो एकदम पास-पास थे। अब कान्हा तो उन पेडो को पार कर गए पर उनके साथ बंधा औखल उन दोनो पेडो के बीच जगह कम होने के कारण निकल नही पाय वो औखल पेडो के बीच फस गया था। कान्हा उस औखल को पुरा जोर लगा कर खिंच रहे थे। पर औखल टस से मस नही हो रहा था। अब कान्हा ने उस औखल को बहुत जोर से खिंचा।

औखल को जोर से खिंचते ही वे दोनो पेड जोर से तरड-तरड की आवाज करते हुए टुट कर जमीन पर गिर पडे। उन दोनो पेडो के जमीन पर गिरते ही उन पेडो मे से दो सुन्दर से नवयुवक निकले और उन्होने कान्हा को झुक कर प्रणाम किया और उन्हे कहाँ भगवान आपने हमे श्राप से मुक्त करवा दिया। हम दोनो यमलार्जुन है। हम धनके देवता कुबेर के पुत्र यक्ष है हमारा नाम नलकूबर और मणिग्रीव है। एक बार धन,ऐश्वर्य और रप के मद मे चुर मंदागिनी नदी मे वारुणी के नशे मे कन्याओ के संग जल विहार कर रहे थे। वहाँ देवऋषि नारद निकले उन्हे देख कर कन्याओ ने तो कपडे पहन लिये थे और हम मद और वारुणी के नशे मे चुर, ऐसे ही नंग-धडग खडे रहे, ना तो हमने उन्हे देख कर कपडे पहने और ना ही उन्हे झुक कर प्रणाम किया।

इस लिए नारद जी हम से क्रुद्ध हो गए और श्राप दे दिया की तुम्ने निर्लजता वश होकर खडे रहे मुझे देख कर तुम्ने वस्त्र धारण नही किया जाओ अपने इस मद के नशे मे चुर आज से तुम दोनो पेड की योनि मे पड जाओ।उनके श्राप से मुक्त होने के लिए हमने पछताते हुए माफी मांगी तब नारद जी ने कहाँ जब दवापर युग आएंगा तब नन्द गोप के घर भगवान अवतार लेंगे वही तुम्हारा उध्दार करेंगे और आज आपने हमे सद्दियो से पेड बन कर श्राप भोग रहे थे श्राप से मुक्त कर दिया। अब वे दोनो भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करते हुए वापस देव लोक अपने पिता के पास लौट गए।

इधर जब पेड जोर से तरड-तरड की आवाज करते हुए जमीन पर गिर पडे तो उसकी आवाज सुन कर गोप-गोपिया नन्द बाबा माँ यशोदा दौडते हुँ वहाँ आए तो उन्होने अर्जुन के उन दोनो पेडो को जमीन पर गिरा देखा और उन पेडो के पास खडे कन्हिया को औखल से बंधे देखा तो नन्द बाबा के होश उड गए कि ये सद्दियो पुराने इतने भारी भरकम पेड अगर कान्हा के ऊपर गिर जाते तो यह बात सोच कर नन्द बाबा घबरा कर दौड कर कान्हा को औखल से अलग करके अपने गले से लगा कर रोने लगे। कहने लगे हे भगवान तु कितना दयीलु है तुन् आज मेरे नन्हे से कान्हा की रक्षा की इसे बचाया है।अगर ये पेड मेरे कान्हा पर गिर जाते तो हम कही के नही रहते। कान्हा सहमे से पिता की गोद मे लिपटे रहे और अपने नन्हे से कोमल हाथो से बाबा की आँखो से आँसु पोंछने लगे।

सब गोप-गोपिया कान्हा को बार-बार अपनी गोद मे उठा कर प्यार करने लगे और मईया यशोदा को कोशने लगे क्यो री यशोदा तुम्हे नन्हे से बालक को इतनी बडी सजा देते जरा भी लज्जा ना आई कैसी माँ है तु यशोदा जो अपने बालक को ऐसे बांध कर छोड दिया आज लाला को कुछ हो जाता तो।इधर मईया भी ग्लानि से भरी ाँसु बहाती हुई बस कान्हा को देथी और मन ही मन भगवान का शुक्र गुजार करती कि हे भगवान तुमने आज हमारी लाज रख दी हमारे कान्हा को बचा लिया। अब तो मईया इतना डर गई कि मन मे संकल्प करने लगी आज के बाद मै कभी भी कान्हा को मारुंगी नही ना ही डाँट नही लगाऊंगी फिर कभी बांधुगी नही।

भगवान की लीला अपरम-पार है उनकी लीला वो ही जाने। ना जाने भगवान का कब क्या और कौन सी लीला करने का मन हो जाए। नटखट नन्हो सो गोपाल।

जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्ण

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