ध्रुव के पिता उत्तानपाद की कथा ( कहानी )

ब्रहमापुत्र मनु के पांच संताने थी जीनमे दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ थी। उनके बडे पुत्र का नाम प्रियव्रत और छोटे बेटे का नाम उत्तानपाद और बेटियो के नाम आकूति,देवहुति,प्रसूति था। जब राजा मनु वृद्धावस्था मे पहुंच गए तो उन्होने संयास लेने की सोची ,इस लिेए उन्होने अपने बडे पुत्र प्रियव्रत को राजकाज सम्भालने की सोची पर प्रियव्रत गृहस्थ से दुर रह कर प्रभु की भक्ति मे जीवन बिताना चाहते थे। वे बचपन से ही प्रभु भक्ति मे ही रमे रहते थे। उनको राजा मनु का यह फैसला पसंद ना आया और उन्होने पिता जी की इस बात से असहमति जताई और अपने छोटे भाई उत्तानपाद को राजगद्दी पर बैठा कर खुद तपस्या करने वन मे चले गए।

राजा मनु सन्यास को चले गए और प्रियव्रत तपस्या के लिए चले गए अब राजा मनु के छोटे पुत्र उत्तानपाद सारे राज्य की बागडोर सम्भाल कर राज्य करने लगे राजा उत्तानपाद के एक पत्नि थी सुनिति,सुनिति एकदम नाम के अनुसार थी यानि निति निपुन पर राजा उत्तानपाद को सुनिति से कोई संतान नही हुई बहुत साल तक वे संतान हीन रहे ।जब बहुत साल बीत गए तो उनके राज्य की जनता को बहुत चिन्ता हुई की जब राजा के संतान नही होगी तो राजा के बाद राज्य की देखभाल कौन करेगा इस लिए एक राजकुमार का होना जरुरी है और बहुत सोच विचार के बाद राज्य की जनता ( प्रजा ) और मंत्रीमंडल इस निष्कर्ष पर पहुंचे की राजा को दुसरा विवाह कर लेना चाहिए पर राजा उत्तानपाद इस बात से सहमत नही हुए तो वे सभी रानी सुनिति को समझाने लगे की राज्य के लिए राजा के पुत्र की जरुरत होती है। रानी उनकी बात से सहमत हो गई की राजा को संतान प्राप्त करने के लिए दुसरी शादी कर लेनी चाहिए।

रानी सुनिति का राजा उत्तानपाद को दुसरी शादी के लिए रजामंद करने का प्रयास शुरु हुआ। रानी सुनिति राजा को समझाती की राजा का सच्चा धर्म अपनी प्रजा के हीत के बारे मे सोचना और राज्य की भलाई के कार्य करना इस समय हमारे कोई संतान नही और हमारे बाद कौन प्रजा की देखभाल करेगा । राज्य राजा के बिहीन सुना हो जाएंगे ऐसे मे कोई दुसरा राजा अपने राज्य पर आक्रमण कर देगा तो हमारा यह राज्य क्षतविछिपत हो जाएंगा दुसरा राजा अपने राज्य का दोहन करेगा और हमारी यह प्रजा इसे अपना गुलाम बना लेगा तो इस से हम धर्म संकट मे पड जाएंगे ।जो पिता अपनी संतान का पालन-पौषण नही करता उसका पिता कहलाना व्यर्थ होता है उसी प्रकार प्रजा राजा की संतान के समान होती है और अपनी प्रजा के हीत के बारे मे ना सोचना उसी पिता के समान हो जाता है जो संतान की देख-रेख नही करता।

राजा उत्तानपाद भी बहुत से तर्क प्रसतुत करते है रानी सुनिति को समझाने के लिए वे रानी का समझाते है की अगर दुसरी शादी हो जाएंगी तो वो दुसरी पत्नि तुम्हारी सौतन बन जाएंगी और वो तुमसे ईष्सा के भाव रखेगी और मै तुम्हे बहुत प्रेम करता हुँ अगर दुसरी पत्नि होगी तो उसको यह बात पसंद ना आएंगी और वो कलहपूर्ण वातावरण बनाएंगी इससे महल का पुरा महौल बिगड जाएंगा।फिर इससे मुझे भी बहुत कष्ट होगा।जब दुसरी पत्नि होगी तो वो भी अपना अधिकार भाव रखेंगी। इस लिए हो सकता है वो तुमसे मुझे या प्रजा को छिन लेना चाहिए और फिर व्दंव्द होगा। इस पर रानी ने राजा को समझाते हुए कहाॅ कि अगर ऐसा हुआ तो जो वो दुसरी रानी चाहेंगी उसे मै स्वीकार करुंगी अगर उसको मेरा मेरा आप पर या राज्य,प्रजा पर अधिकार रखना पसंद नही होगा तो मै सब खुशी-खुशी उसको सब भेट करके दुर रहने लगुंगी। तब बहुत बहस के बाद राजा को रानी की बाते के आगे झुकना पडा और दुसरी शादी के लिए सहमत होना पडा।

बहुत ज्ञान की धर्म की नितिपूर्ण बाते समझा कर रानी सुनिति राजा उत्तानपाद को दुसरी शादी के लिए सहमत कर लेती है और राजा अपनी प्रजा की भलाई के लिए मान जाते है अपनी जीद्द छोड कर राजा उत्तानपाद दुसरी शादी के लिए मानते है।अब राजा ने शर्त रखी कि अपने लिए सौतन तु खुद ढुंढोगी मै इसमे कोई सहयोग नही दुंगा।जब राजा मान गए तो रानी ने अपनी प्रजा और मंत्रीमंडल को सभागार मे बुलाया और सब से कहाॅ की राजा को दुसरी शादी के लिए मना लिया है और उसके लिए नई रानी की खोज करना शुरु कर दो। अब सभी राज्यो की राजकुमारियो ने दुसरी रानी बनना पसंद नही किया तो सभी जगह से निराशा ही हाथ लग रही थी।

बहुत खौज-खबर के बाद एक छोटा सा राज्य था उसकी राजकुमारी जीसका नाम सुरुचि था सुरुचि नाम के अनुरुप उतनी ही सुन्मादर थी सुरुचि यानि सुन्नदरता से भरा यौवन जो दुसरो को अपनी तरफ खिंच लेती है सुन्दरता से मुग्ध हो कोई भी उसकी और आकर्षित हो जाए सुरुचि मान गई पर उसने शर्त रखी कि मै शादी के लिए तैयार तब होऊंगी जब राजा की पहली पत्नि राजा का त्याग करदे नही तो सौतन का सामना करना मुझे मंजुर नही।रानी उसकी इस बात से सहमत हो गई ।रानी सुनिति अपने राज्य और प्रजा की भलाई के लिए राजा से दुर होने के लिेए सहमत हो गई। अब राजा उत्तानपाद की शादी सुरुचि से हो गई।राजा उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हो गए अब तो जो वो सुरुचि चाहती राजा वही करते। हमेशा राजा शुरुचि को प्रसन्न रखने के लिए यत्न करते रहते ।रानी सुनिति राजा से दुर अपने रंगमहल मे ही रहती कभी भी राजा के सामने नही जाती थी।

रानी सुनिति अपनी पत्नि धर्म सुरुचि को सम्भला कर खुद प्रभु भक्ति मे लग गई अपने महल मे ही रह कर भक्ति करती।इस पर भी रानी सुरुचि को रानी सुनिति से जलन होती उसको लगता कही रानी सुनिति से मिलने राजा उसके पास ना चले जाए वो राजा को इस बात की चेतावनी सदैव देती रहती की वो सुनिति से दुर ही रहे अब सुरुचि एक पल के लिए भी राजा को अपने से दुर नही जाने देती हर पल वो राजा के साथ रहती सभा भवन मे भी वो राजा के साथ जाती थी।

इस पर भी उसके मन को संतोष नही मिला उसने हार कर एक दिन राजा से कह ही दिया की सुनिति को महल और राज्य सब को छोड कर दुर चले जाने का प्रबंध करो।राजा उत्तानपाद सुरुचि का दिवाना बन गया था जैसे वो कहती करता इस लिए राजा ने सुनिति को देश निकाला देने की सोची पर रानी सुनिति इस बात से घबरा गई की अब राज्य से दुर कहाॅ जाऊंगी पर राजा तो अब सुरुचि के हाथ की कटपुती बन गए थे उन्होने सुनिति की कोई परबाह नही की और सुनिति को राज्य छोड कर चले जाने का आदेश दिया बेचारी सुनिति राजा की आज्ञा मान कर राज्य से दुर चली गई।

उसने राज्य की सिमा के पास कुछ दुरी पर एक कुटिया बना कर रहने लगी उसकी साथ उसकी प्रिय दासी जो उसके पिता ने उसको शादी के वक्त भेट की थी वो साथ रहती थी इससे रानी सुनिति को बडा सहारा था। वो दासी राज्य मे जाकर सामान ले आती थी जंगल से फल फूल आदि भी रानी के लिए ले आती थी। राज्य का सारा हाल वो दासी देख सुन कर उसका वर्णन रानी सुनिति को कर देती थी और रानी सुनिति अपनी प्रजा की खुशहाली की जानकारी पा कर खुश होती थी।

एक दिन राजा उत्तानपाद शिकार खेलने निकले तो मौसम बहुत खराब होने के बजह से उन्हे रात हो गई और इधर-उधर किसी आश्रय की तलाश मे निकल पडे उन्हे एक कुटिया दिखी और भोजन पानी की आश से वो कुटिया के निकट गए और कुटिया के बाहर खडे हो कर कुटिया के मालिक से अंदर रुकने की आज्ञा मांगने लगे ।अतिथि की आवाज सुन कर दासी बाहर आई और राजा को अंदर ले गई। वह कुटिया रानी सुनिति की थी पर राजा को इस बात का पता नही था। जब रानी सुनिति ने दीपक की मदद से राजा को भोजन परोसा तो रानी सुनिति की नजर राजा उत्तानपाद पर पडी और वो राजा को पहचान गई। रानी ने आतिथ्य धर्म निभा कर राजा को भोजन करवाया।और राजा के पाव छुए तब राजा उत्तानपाद को पता चला की यह रानी सुनिति है।

अब राजा सुनिति से नजरे भी नही मिला पाए बहुत शर्मिना हुए की ये मेने क्या कर दिया त्रिया-चरित्र के वश होकर मेने इतना बडा पाप कर दिया अपनी ही रानी को को जंगल मे कुटिया मे रहने के लिए मजबुर कर दिया महलो की रानी अब जंगल मे रहती है। राजा का पछतावा हुआ वेचारी जंगली जानवरो से कैसे खुद की रक्षा करती होगी जंगली भोजन खा कर रहती है। रानी की दुर्दशा के जीमेदार खुद को मान कर पछतावा करने लगे इस लिए उस रात को वह रानी के संग बिता कर अगले दिन राज्य चले गए।

अब वो घडी आई जब सुरुचि माँ बनने वाली हुई। यह जानकर राजा उत्तानपाद खुशी से झुम उठे। बधाईयाँ बांटी गई पुरे राज्य की प्रजा को उपहार भेट किए गए।यह जब रानी सुनिति की दासी ने देखा सुना की रानी सुरुचि माँ बनने वाली है इसलकी खबर उसने रानी सुनिति को सुनाई अब रानी सुनिति भी इस खुशी मे बहुत खुश हुई कि राज्य की राजकुमार मिल जाएंगा। कुछ दिनो बाद ही सुनिति भी माँ बनने वाली थी। अब राज्य मे वो घडी आई की सुरुचि ने एक बालक को जन्म दिया उधर- सुनिति ने भी एक बालक को जन्म दिया। देखो भगवान की कैसी लीला कहाॅ तो कितने सालो तक रानी सुनिति को बालक नही हुआ उधर सौत के संतान हुई तभी सुनिति को भी संतान पैदा हो गई।

एक तरफ राजा उत्तानपाद और रानी सुरुचि की संतान राजकुमार बहुत लाड प्यार ऐशो आराम से पल रहाॅ था उधर राजा उत्तानपाद का दुसरा पुत्र जो जंगल मे कुटिया मे बचपन बीता रहाॅ था। सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम रखा गया और सुनिति के पुत्र का नाम ध्रुव रखा गया। राजा अपनी सुनिति रानी से पैदा संतान ध्रुव के जन्म से अनजान था उसे पता नही चला था कि उसकी दुसरी संतान भी पैदा हुई है । वो तो उत्तम मे ही अपना मन रमाए बैठे थे।

4 thoughts on “ध्रुव के पिता उत्तानपाद की कथा ( कहानी )

    1. जी बहन आपकी राय सराहनीय है। आगे की कहानी भी वक्त मिलते ही जरुर लिखुगी वैसे ध्रुव की कहानी भी लिखी है होम पर मिल जाएगी

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