भारत की स्थापत्य और चित्रकला

भारत की संकृति मे कला का बहुत महत्व रहाँ है । इस कला क्षेत्र मे स्थापत्य कला के बेजोड नमूने है जीन्हे देश ही नही विदेशो मे भी लोगो ने बहुत पसंद किया । हमारी कला क्षेत्र मे स्थापत्य कला , चित्रकला , मुर्ती कला , पोर्टरी कला ने सभी को अपनी और आकृष्ट करते रहे है । भारत के कलाकारो की प्रसिद्ध पुरे संसार मे होती रही है । भारत का स्थापत्य चित्रकला का बहुत पुरे समय से ही समृद्धशाली रही है प्राचीनकाल यानि हडप्पाकाल मे भी स्थापत्य के नमूने देखने को मिले है ।

सिंधुघाटी सभ्यता नगरयोजना के भग्नावशेष—–

सिंधुघाटी सभ्यता भारत की बहुत प्राचीन सभ्यता है । यह लगभग मिश्र की सभ्यता के समकालीन सभ्यता रही है । सिंधुघाटी सभ्यता बहुत समृद सभ्यता थी उस समय लोगो को स्थापत्यकला चिश्र कला आदि का ज्ञान था उनके भग्नावशेषो से हमे इसकी जानकारी मिलती है ।उस समय के लोगो का कला मे रुझान था । सिंधुघाटी सभ्या मे नगर-नियोजन के भग्नावशेष मिले है जीसमे मकानो की बनावट , नगर की सुन्दर बनावट ,विशाल स्नानागार मिले है जीसे पर्व (त्यौहारो) पर काम मे लिया जाता होगा जैसे आज के समय मे विशेष अवसरो पर विशाल कुंडो मे स्नान किया जाता है यानि सरोवर मे स्नान करना ।

सिंधुघाटी मे लोगो की स्वच्छतता पर पुरा ध्यान रखते थे इसका ज्वलंत उदाहरण उस समय के मिले भग्नावशेषो से नाली के होने का सबूत मिला है इसे घरो से लेकर गहरे नालो तक जोडा जाता था और इस तरह गंदे पानी को घरो से शहर से दुर निकाला जाता रहाँ होगा । मकान कच्चे और पक्के दोनो तरह के बनाए जाते थे सडके आजकल के समान ही एक दुसरे से समकोण पर काटती थी ( चौराहा ) मकान एक मजीला या दो मंजिला होते थे । चौडी और पक्की ऊंटो से घर बनाये जाते थे ।

सुंधुघाटी मे मिली मुर्तियो से पता चलता है की उस समय के लोगो को को कला का ज्ञान था तभी वे मुर्तियाँ बनाते थे । सिंधुघाटी से मिली मुर्तियो के भगनावशेष से पता चलता है कि उस समय परिवार मातृसतात्मक ( माता परिवार की मुखिया ) होते थे जीसमे माता ही परिवार की मुखिया होती होगी । उस समय की मुर्तियो मे बहुत सी ऐसी मुर्तियाँ मिली है जीसमे एक पुरुष का चित्र उकेरा है उसके सिर पर मुकुट है और उसके दाए-बाए पशु बैठे हुए है ( शेर , बैल ) इससे पता चलता है की वे शिव व माता के उपासक थे।

सिंधुघाटी मे महिलाओ के श्रृंगार के सामान मिट्टी और धातु के गहने मिले है । जीससे पता चलता है उस समय लोगो को श्रृंगार का ज्ञान था । मिले भगनावशेषो से पता चलता है की उस समय व्यापार भी होता था । उस समय दुसरी सभ्यता सुमेरियन सभ्यता , मिश्र सभ्यता , मेसोपोटामी सभ्या आदी से लेन-देन व्यापार होता रहाँ होगा । पशुपाल और कृषि भी होते थे । सिंधुघाटी के भग्नावशेषो से उस समय की कला की जानकारी मिलती है ।

भारत की स्थापत्यकला के उदाहरण—–

भारत की स्थापत्यकला विश्व भर मे प्रसिद्ध है । भारत मे प्राचीनकाल से ही स्थापत्य कला का विशेष प्रभाव देखने को मिलता है । जीतनी भी प्राचीन इमारते है प्राचीन धरोहर है सब अनूठी कला-कृतियाँ का अपने मे समाए हुए प्रतित होती है ।प्राचान काल मे दो प्रकार की स्तापत्य कला देखने को मिलती है ।1–आर्य शैली , 2-द्रविड शैली दोनो ही शैली भारत मे भव्य स्थापत्यकला को समेटे हुए है आर्य काल के प्राचीन काल मे ग्रामीन जीवन था ।मध्य आर्यकाल मे स्थापत्य का प्रचलन हुआ । जीसमे भव्य मंदिरो , भव्य इमारतो ष महलो , सामूहिक स्थलो को कलाकृतियो से सुन्दर बनाबट से सजाया जाने लगा।मंदिरो मे सुन्दर कलाकृतियो को दिवारो पर उकेरा जाने लगा सुन्दर मुर्तियाँ स्थापित होने लगी । मंदिरो की भी स्थापत्यकला खुबसुरती लिए हुए थी । सुन्दर भाव-भंगिमाओ को प्रदर्शित किया जाने लगा। दिवारो , पीलरो पर सुन्दर कलाकृतियो को उकेरा जाने लगा इन्हे देख कर उस समय के समाज के बारे मे इन कलाकृतियो से हमे जानकारी प्राप्त हो जाती है।

द्रविड स्थापत्य कला शैली मे भव्य और विशालकाय मंदिरो का निर्माण होने लगा मंदिरो के भाहरी प्रकोटो पर देवी – देवताओ के सुन्दर भाव भंगिमाओ को लिए कलाकृतियो को उकेरा जाने लगा जो देखते ही बनती है इनकी सुन्दरता की जीतनी प्रसंसा की जाए उतनी कम लगती है। पत्थरो को काट-काट कर उस पर मानव आकृतियाँ उकेरी जाती थी जीसकी भाव-भंगिमा इतनी सुन्दर होती थी की सबका ध्यान अपनी और खिंच लेती है ।

जब बाहर से आकर लोग भारत मे बसने लगे तो धिरे-धिरे उनकी कला की छाप भारत की स्थापत्य पर भी पडने लगी दो कलचर का मेल होने से स्थापत्य को नयी संरचना मिली ।जब गुप्तकाल मे ईरानी आए तो उनके आने से संस्कृति संगम के कारण दोनो प्रकार भारतीय स्थापत्य और ईरानी स्थापत्य के मेल से नई स्थापत्य कला का संचरण होने लगा अब स्थापत्य मे पहले से भी अधिक सुन्दर स्थापत्य पनपने लगा । ऐसे ही मुगलो के आने से मुगल शैली का भारतीय स्थापत्य शैली पर प्रभाव पडा और भारतीय स्थापत्य मे बदलाब आए और ऩई स्थापत्य कला का विकाश हुआ ।

भारत के बहुत से स्थापत्य धरोहर ऐसी है जीसने दुनिया भर मे अपनी पहचान बनाई है । भारत के प्राचीन एतिहासिक मंदिर जीनकी अनूठी स्थापत्यकला है दुनिया भर मे मशहुर है ।

बहुत से महल , किले , मंदिर , स्मारक , भवन , बहुत ही सुन्दर इमारते , मिनाक्षी मंदिर , लाल किला , खजुराहो , सथापत्य के लिए जाने जाते है जैसे– ताजमहल , किले , मंदिर, एजन्ता-अलोरा की गुफाए , अपनी सुन्दरता से प्रसिद्ध है दक्षिण का तंजौर टैम्ंपल , अमृतसर का स्वर्ण-मंदिर , सांची का स्तूप , सारनाथ का अशोक पिलर जीस पर लौहे का पिलर उसके ऊपरी हिस्से पर चार शेर बने हुए है सभी शेर एक दुसरे की तरफ पीठ करके खडे दर्शाए गए है इसके नीचे सत्मेव जयते लिखा हुआ है । इस स्तम्भ मे बैल, घोडा , हाथा और शेर के चित्र अंकित है । इस स्तम्भ मे चक्र का चिंह भी अंकित है इस चक्र मे 32 तिलिया है यह चक्र अशोक के साहस वीरता और सोर्य का प्रतिक है ।अशोक स्तम्भ से चक्र का चिंह भारतीय स्मृति चिंह के रुप मे अपनाया गया है भारत के तिरंगे ( झण्डे ) के बिच मे इस चक्र को अंकित किया गया है ।

मुगल स्थापत्य शैली और भारतीय स्थापत्य शैली के मेल से भवनो पर सुन्दर गुम्बद बनने लगे । मुगर और भारतीय शैली के मिश्रण से बनने वाले स्थलो मे से एक है लाल किला । ताजमहल , आगरा किला , तख्त-ए-ताऊस इसका उदाहरण है । तख्तःए-ताऊस शाँहजहाँ ने अपने बैठने के लिए तख्त (सिंहासन ) बनवाया उस सिंहासन पर दो मोर बने हुए थे जो पंख फैला हुए थे । फारसी मे ताऊस का मतलब मोर होता है इस लिए इस तख्त ( सिंहासन ) का नाम तख्-ए-ताऊस रखा गया यानि मयूर सिंहासन मोर की आकृति लिए हुए सिंहासन इस पर बेशकिमती हीरे-जबहारात जडे हुए थे ।

भारतीय स्थापत्य के कई उदहारण प्रस्तुत किये गए जीसमे से हैदराबाद की चारमिनार , दिल्ली की कुतुब मिनार , रंकपुर का जैन मंदिर , माऊंट-आबू का आदिलशाह दव्रा बनवाया मंदिर ,चितौडगढ का विजय स्तम्भ , राजस्थान के भव्य दुर्ग , गोलकुण्डा का किला आदि भारतीय स्थापत्य कला के बेजोड नमूने है

भारतीय मूर्ती कला ——

भारत मे प्राचीनकाल से ही मूर्तीकला विकसित थी हडप्पाकाल से मिली मूर्तियाँ इसका उदहारण प्रस्तुत करती है । गुप्तकाल तो कला के क्षेत्र मे स्वर्निम युग के नाम से जाना जाता है । गुप्त काल मे बहुत ही सुन्दर शिल्पकला विकसित हुई थी उस समय की मिली शिल्पकलाकृतियो से इस बात की पुष्टि होती है ।गुप्त काल मे सुन्दर भवन ,महल,अटारियाँ , दुर्ग , तोरण आदि बनाए जाते थे जीसमे सुन्दर हावभाव युक्त कलाकृतियो को उकेरा जाता था । महलो , मंदिरो ,भवनो ,दुर्गो की दिवारो पर छतो पर हिन्दु देवी-देवताओ और धर्म और महात्मा बुद्धा की मुर्तियाँ बनाई जाती थी । गुप्त काल मे दंशावतार ( विष्णु के दश अवतार ) की मुर्तियाँ दिवारो पर उकेरी जाती थी आज उस समय की बहुत सी मुर्तियाँ भगनावशेष बन गई है इन्हे सम्भाल कर संग्रहालयो मे सुरक्षित रखा गया है । उस समय देवताओ मे विशेष तौर पर भगवान नारायण और लक्ष्मी की मूर्तियाँ दंशावतार की मूर्तियाँ नो ग्रहो की मूर्तियाँ नागकन्या की मुर्तियाँ भी बनाई जाती थी जो हमे आज के समय संग्रहालयो मे बखुबी देखने को मिल जाती है इन इतिहासिक धरोहरो को सहेज कर रखा गया है ताकि हमारी आने वाली पिढियो को इसका ज्ञान मिल सके ।

गुप्त काल के प्राचीन मंदिर फिलहाल हमे 2018 मे वाराणसी मे हुई खुदाई से जमीन की खुदाई करने पर मिले है जीनमे से कुछ मंदिर खुदाई करते समय भग्न हो गए और बहुत से मंदिर जीवित अवस्था मे प्राप्त हुए है जीसे साफ सफाई करके सहेजा जा रहाँ है ये हमारी एतिहासिक धरोहर है । गुप्तकालिन राजाओ चंद्रगुप्त , संमुन्द्रगुप्त , सम्राट्र अशोक कला के संरक्षक थे जीन्होने कला को प्रोत्साहन दिया । सम्राट्र संमुन्द्रगुप्त तो खुद बहुत बडे कलाकार थे उनको संगीत, चित्रकला, शिल्प कला, वास्तुकला और साहित्य इन सबका ज्ञान था वे प्रकाण्ड विद्वान थे इस लिए उस समय कला विज्ञान चरम सीमा पर थे

गुप्तकालीन शिल्प मे सुन्द भाव-भंगिमा लिए हुए मानवकृतियाँ कला का विशेष विषय होता था सुन्दर नाक नकश, पैनी आँखे, सुन्दर मुखाकृतियाँ लिए हुई सम्पूर्ण व्यक्तित्व की झलक लिए हुई ये कलाकृतिया सबको अपनी और आकृष्ट करती है लोग मंत्रमुग्ध होकर इन्हे निहारते है । नृत्क, नृत्कियो की भावपूर्ण झलक इन कलाकृति मे हमे देखने को मिलती है । कही पर इन कलाकृतियो मे भगवान विष्णु को शेष स्ईया पर सोए दर्शाया गया है कही पर लक्ष्मी के संग निवास करते हुए । कही पर विभिन्न देवी देवताओ की कलाकृतियां कही पर नो ग्रहो को प्रदर्शित किया गया है । कही अमृत-मंथन करते देवताओ-दानवो को नागफन पकडे हुए मंदराचंल को समुंद्र मे मथते हुए । बहुत ही सुन्दर कलाकृतियाँ बिलकुल सजीव सी प्रतित होती है ।

भारतीय शिल्प कला शैली—–

भारत मे गुप्तकालिन शिल्प के अलावा और भी बहुत सी शिल्पकला शैली पनपी और अपना योगदान दिया । आर्य शैली और द्रविड शैली तो प्राचीनकाल से चली आ रही थी इनके अलावा भी कई छोटी बडी शिल्प शैलिया विकसित हुई जीनमे से दो शिल्प शैली ने तो अपनू अनूठी पहचान बनाई है । वो है एक गांधार शैली , दुसरी मथुरा शैली

भारत मे गुप्त काल मे जब सिकन्दर भारत आया वो यूनानी थी तो उसके संग उसकी कला शैली भी भारत पहुची जीसे यूनानी शैली कहते है । यूनानी शैली अनूठी भावात्मक शैली थी इस लिए भारत और यूनानी शैली दोनो साथ-साथ ही भारत मे पनपने लगी और धिरे-धिरे दोनो शैलियो मे सम्नव्य होने लगा यानि दोनो शैली मे एक दुसरे की मिलावट होने लगी और इसी मिलावट के कारण एक नई शैली पनपी जीसका नाम पडा गांधार शैली

गांधार शैली की विषय वस्तु तो भारतीय ( जीसकी प्रतिमा बनाई जाती वो चरित्र भारतीय होता ) और उसका चित्रण भाव यूनानी होता था इस लिए इस शैली को गांधार शैली के नाम से जाना जाने लगा ।गांधार शैली मे प्रतिमा मे माँसपैशियो को भी दर्या जाता था और प्रतिमा के वस्त्रो मे चुनट ( सिलवटे ) डाल कर उसमे प्राण डाल दिया जाता था ।इस शैली मे बालो को सिर के पिछे लेजाकर बांध दिया जाता और जुडा बनाया जाता था इस शैली मे बालो को घुंघराले बना कर प्रतिमा को सुन्दरता प्रदान की जाती थी यह शैली बहुत सुन्दर प्रतिमा को तैयार करने मे सहायक होती थी । इन प्रतिमाओ को पासान ( पत्थरो, चट्टानो ) से बनाया जाता ये पत्थर काले और सफेद रंग के होते थे ।

मथुरा शैली —-

भारत के 16 गणराज्य थे मथुरा भी उनमे से एक गणराज्य था । मथुरा वैभवशाली राज्य था इसका क्षेत्रफल बहुत व्यापक था । यानि राजस्थान,पेशावर ,सौराष्ट्र तक फैला हुआ था । यहा पर यूनानी शैली फैली विकसित हुई थी और इस के साथ मथुरा मे भी खुद की शिल्प शैली पनपी

मथुरा शैली मे बुद्ध प्रतिमा को विषयवस्तु बनाया जाता और संग और भी देवी-देवताओ को भी शिल्प मे ढाला जाता था इस शैली मे लाल बलुआ पत्थरो पर शिल्प किया जाता था और मृतिका ( विषेश प्रकार की मिट्टी ) का उपयोग शिल्पकला मे किया जाता था । मथुरा शैली मे प्रतिमा मे गहनो को भी अलंकृत किया जाता था ये गहने प्रतिमा से चिपके से होते थे । इस शैली मे पशु-पक्षियो को भी उकेरा जाता था । पकृति का चित्रण इसकी पहचान है । मथुरा शैली और गांधार शैली आज भी शिल्पकारो को सिखाने के लिए आर्ट स्कूल होते है ।

इन के अलावा बहुत से शासक हुए जीन्होने स्थापत्य शिल्प कला का विकास किया । दक्षिण के राजा चेल-चोला, राषट्रकूट शासक, चालुक्य वंश आदि शासको ने इस क्षेत्र मे अपना योगदान दिया और सुन्दर-सुन्दर मंदिरो भवनो आदि का निर्माण करवाया । जीसमे से एक है तंजौर का शिव मंदिर इसकी भव्यता देखते ही बनती है ।

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