भारतीय कला- जगत

भारत मे कला का क्षेत्र बहुत व्यापक है। भारतीय कला को देश-विदेश सब जगह प्रसिद्ध हासिल हुई है । भारत के लोक संगीत , नृत्य , नाटक ,चित्रकारी , शिल्पकला सब से भारतीयो ने दुनिया मे नाम कमाया है। भारत के प्रांतो मे सबके अपने अलग नृत्य शैली है , अलग लोकगायन शैली है। विभिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्र है जो की पुरी दुनिया मे अपनी अनुठी पहचान रखते है । कला से लोग अपना मनोरंजन करते है तो कलाकार को मान- सम्मान मिलता है और धनार्जन भी हो जाता है ।

कला का सम्बंध आज के युग से नही है ये पुरानी विधा है प्राचीन काल से चली आ रही है। माना जाता है की कला की उत्पति देवी-देवताओ ने की थी । सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण ने बांसुरी बजा कर, शिव जी ने डमरु बजाकर और तांडव नृत्य करके , माँ सरस्वती ने वीणा बजा कर , गंधर्वो ने गीत गा कर , अपस्राओ ने नृत्य और अपनी भाव भंगिमा से नाटय कर के भगवान विष्णु ने शंख बजा कर और नारद मुनि ने तुम्बरु बजा कर और काव्य गा कर , ऋषि मुनियो ने वेद मंत्रो का वाचन करके , ब्रहम्मा ने वेद को रच कर कला की उत्पति की थी । इस तरह से देखा जाए तो कला का सम्बंध प्राचीन काल से ही चला आ रहाँ है ।

भारत के विभिन्न लोकगीत—-

लोकगीत का तात्पर्य लोगो द्वारा लोकभाषा मे गाये जाने वाले गीत लोकगीत कहलाते है । लोकगीत विभिन्न प्रकार के होते है जीन्हे अलग-अलग अवसरो मे लोगो द्वारा गाया जाता है । कुछ लोकगीत किसी मांगलिक कार्यो के समय गाये जाते है मसलन जन्म के समय, विवाह-सगाई का रस्मो के समय आदि शुभ अवसरो पर गाए जाने वाले लोकगीत इन्हे मंगल गान कहते है । कुछ गीत किसी पर्व विषेश पर गाए जाते है जैसे होली , दिपावली, तीज , जन्माष्टमी आदि अवसरो पर गाये जाने वाले लोकगीत पर्व गीत कहलाते है।

कुछ लोकगीत गाथाओ पर आधारित होते है जीसमे किसी राजा या किसी व्यक्ति विषेश के गुणो का उसकी बहादुरी का या किसी की प्रसन्नसा मे गाये जाते है इन्हे वीर गाथा रस प्रधान लोकगीत कहाँ जाता है । कुछ लोकगीत सामुहिक तौर पर एकत्रित होकर गाए जाते है मसलन जब खेतो से फसलो की कटाई बुआई आदि कार्यो के समय समुंह द्वारा कार्य करते समय गाए जाते है । कुछ लोकगीत जातिगत होते है इस प्रकार के गीतो को किसी एक जातीवर्ग द्वारा गाया जाता है इन्हे पैसेवर लोकगीत कहते है ।

भारत के लोकनृत्य—–

भारत मे हर प्रांत के अपने अलग प्रकार के लोकनृत्य है । भारत के लोकनृत्य कुछ तो संसार भरमे अपनी धुम मचा चुके है । कथकली,लावनी,कालबेलिया नृत्य , कथक, मोहिनी अट्टम, गरवा ये ऐसे नृत्य है जीनहोने अपनी पहचान पुरी दुनिया मे बनाई है । भारत के लोकपरम्परानुसार लोकनृत्य राजस्थान के लोकनृत्य घुमर नृत्य ,चरी नृत्य ,तेरहा -ताली नृत्य , कालबेलिया नृत्य , चक्री नृत्य ,गवरी नृत्य बहुत प्रसिद्ध नृत्यकला है ।ऐसे नृत्य देखते ही बनता है । लोग मंत्रमुग्ध होकर देखते है ।

केरल का लोकनृत्य है कथकली । कथकली नृत्य मे नृतक अपने आँखो मुंह की भावभंगिमा के माध्यम से कथा कहानी का वर्नण करते है कथकली कथाओ कहानियो को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करना होता है ज्यादातर इस नृत्य की कथा रामायण , महाभारत पर आधारित होती है ।

कथक नृत्य उतर भारत का लोक नृत्य है कथक का शाब्दिक अर्थ होता है कहानी कहना इस लिए इस लोकनृत्य के माध्यम से नृतक कहानी कथा काी प्रस्तुति नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते है । कथक के घराने है विषेश घराना है लखनऊ घराना और जयपुर घराना । यह नृत्य प्राचीनकाल मे ब्राहमणो द्वारा मंदिरो मे प्रस्तुत किया जाता था पर मुगलो के आने के बाद इस नृत्य को दरबार मे भी प्रस्तुत किया जाने लगा ।

भरतनाटयम दक्षिण भारत के तमीलनाडू प्रांत से सम्बंधित नृत्य है ।इस नृत्य मे हाथ,पैर,मुंङ, आँख सबके संचालन के 64 नियम है इस नृत्य का मंचन नृतक अपने पुरे शरीर के संचालन के संग गीत की प्रस्तुति करते हुए प्रस्तुत करते है ।

ओडिसी नृत्य उडिसा मे देवदासियो द्वारा किया जानेवाला नृत्य है इसे अपनी भावभंगिमा के माध्यम से गा कर नृत्य करते हुए प्रस्तुत किया जाता है। मोहिनीअट्टम नृत्य ,कुचिपुडी नृत्य भी केरल के प्रसिद्ध नृत्य है कुचिपुडी नृत्य आंध्रप्रदेश का प्रसिध्द नृत्य है यह नृत्य केवल ब्राहमण परिवार के पुरुषो द्वारा धार्मिक पर्वो के समय मंदिरो मे प्रस्तुत किया है इन ब्राहणन परिवारो के भगवतथालु के नाम से पहचाना जाता है ।

गुजरात का गरवा नृत्य,मणिपुर का मणिपुरी नृत्य प्रसिद्ध है,असम का विहु नृत्य

भारतीय वाद्य -यन्त्र —–

                                                   भारतीय संस्कृति मे वादय- यन्त्र भी लोक परम्रागत है प्राचीन काल से ही भारतीय समाज मे किसी भी शुभ अवसर पर वादय-यन्त्रो का प्रयोग होता आ रहाँ है कुछ वादय-यन्त्र तो जातिगत परम्परानुसार होते है ।भारतीय लोकवाद्य-यन्त्र मे विषेश यन्त्र है---शहनाई इस यन्त्र का प्रयोग हर मांलिक अवसर पर होता है। ढोलक ऐसा वादय-यन्त्र जीसे हर मांगलिक प्रोग्राम और धार्मिक अवसर पर बजाया जाता है । वीणा भी प्राचीन वादय-यन्त्रो मे से एक है । नगाडा इसे प्राचीन काल मे राजा लोग अपनी जनता को सूचित करने के लिए बजवाते थे। आजकल तो धार्मिक उत्सव पर ही इसे बजाया जाता है। बांसुरी यह बांस से बनी होती है इसमे कई छेद होते है जीससे मधुर ध्वनि निकलती है ।ढोल ऐसा वादय-यन्त्र है जीसे शादी मे नडत्य करने के लिए विषेश तौर पर उपयोग लिया जाता है इसकी थाप पर लोग नृत्य करते है ।डमरु इस वादय-यन्त्र का प्रयोग प्राचीन काल मे विषेश किया जाता था आजकल इसका प्रयोग नही के बराबर ही होता है ।एकतारा ,वीणा , तानपुरा ,आदि मे तार बंधे होते है इन तारो से स्वर लहरी उत्पन होती है । ढोलक ,नगाडा , ड्रम , ढोल चंग , डफ आदि को लकडी के ऊपर चमडा लगा कर बनाया जाता है । इन वादय-यन्त्रो को बजाने के लिए लकडी का उपयोग किया जाता है या हाथ से थाप देकर बजाया जाता है । इन के अलावा और भी बहुत से वादय-यन्त्र है जो परम्परागत बजाने के लिए उपयोग लिये जाते है जैसे शंख , जो की मंदिरो मे या पुजा करते वक्त बजाया ता है। हारमोनियम , पेटी बाजा , कांगो,तबला ,शरोद , एकतारा ष अलगोजा ष तुरही ,  तुमम्बा , प्यानो , छैने , खडताल , जल तरंग लहरी ,आदि अनैक वादय-यन्त्र है जीन्हे भारतीय समाज मे परम्परागत तरीके से प्रयोक मे लाते रहे है ।

इस तरह से देखा जाए तो भारत का समाज कला के बिना अधुरा सा है । कला भारतीयता की जीवन शैली का आधार है।भारत की कला केवल भारत तक ही सीमित नही रही है । भारतीय कला और कलाकारो ने पुरी दुनिया मे अपनी अनूठी पहचान बनाई है भारतीय कला को भारतीय ही नही वल्कि दुसरे देशो के लोगो द्वारा भी बेहद पसंद किया जाता है ।भारत के बहुत से कलाकार अपनी कला के माध्यम से पुरी दुनिया मे नाम कमा रहे है सब जगह ख्याति प्राप्त कर रहे है ।अगर हमारे जीवन मे कला का समावेश नही हो तो हमे अपने जीवन मे उत्साह पूर्ण जीवन जीने मे परेशानी आने लगेगी। बिना कला के जीवन निर्सतापूर्ण हो जाएंगा ।

भारतीय सिल्पकला स्थापत्य कला—

भारत की शिल्पकला और स्थापत्यकला ने देश दुनिया मे अपनी अनूठी पहचान बनाई है भारतीय प्राचीन शिल्पकला और स्थापत्यकला के बेजोड नमूने देखने दुर-दुर के दुसरे देश से लोग आते है भारत के किले , महल , हवेलिया , मंदिर, बहुत सी इमारते जीन को शिल्पकारो ने बनाया फैंमस है ।

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