भारत महान संस्कृति की थाति

भारत महान संस्कृति का देश है । यहाँ विभिन्न प्रकार के रिति-रिवाज मनाए जाते है। हमारी संस्कृति मे जन्म लेने के साथ ही संस्कार शुरु हो जाते है । 16 सोलह संस्कार हमारी संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग है । जब किसी बालक का जन्म होने वाला होता है यानि जब बालक माता के गर्भ मे पल रहाँ होता है तभी से उसके लिए संस्कार चालु होते है और मृत्यु पर्यंत इंसान संस्कार निभाते है ।जब बालक गर्ण मे होता है तब उसकी सुरक्षा के लिए गर्भिनी माता को गोद भराई नामक संस्कार को उत्सव के तौर पर मनाते है।

गोदभराई संस्कार—-इस रिति मे गर्भिनी माता को उसके पीहर पक्ष और ससुराल पक्ष की महिलाए गर्भिनी माता को श्रृंगार कर के सजा धजा कर पिढी या पाटे मे बैथा कर उसकी गोद मे सगुन के तौर पर फल,फूल, हार श्रृंगार का सामान, नए वस्त्र आदि रखती है उपहार भी भेट किए जाते है ।महिलाए गीत गा कर मंगल शगुन करती है । वहाँ आई सभी महिलाए उस गर्भिनी माता कोसगुन और आशिर्वाद देती है और सब अपनी कुल देवी- देवता के आगे प्रणाम करके माता व संतान दोनो की कुशलता के लिए प्रार्थना करते है। यह संस्कार हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुरुप मनाते है ।इस संस्कार के समय सामर्थ्य हो तो लोग अपनी सभी रिस्ते-नातेदारो के संग सभी जान पहचान के लोगो को आंत्रित करते है और वहाँ उपस्थित सभी लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार उपाहार भेंट करके आशिर्वाद प्रदान करते है ।

नामकरण संस्कार—-जब बालक का जन्म होता है तो उसके जन्म के कुछ दिन बाद उस बालक और उसकी माता दोनो की शुद्धि के लिए नामकरण संस्कार करते है । नामकरण संस्कार मे बालक और उसकी माता को ( जच्चा व बच्चा) स्नान करवा कर पवित्र कर के नए व शुद्ध वस्त्र पहना कर अपनी इष्ट देव, कुल देवी-देवता के आगे माथा टेंक कर आशिर्वाद लेते है फिर ब्राहम्ण उस बालक का हवन करके शुद्धिकरण करते है और यज्ञ करके उस बालक को उसका नाम जो उसकी जन्म तिथी तारीख व समय से जीस नक्षत्र मे जन्म होता है उसके अनुसार नाम निकालते है । इस संस्कार को कुछ लोग साधारण बनाते है कुछ बहुत धुम-धाम से सभी परिचितो को बुला कर मनाते है।

अन्न प्रासन्न संस्कार—- जब बालक 5-6 महिने से ज्यादा का हो जाता है तो उसको अन्न खिलाने से पहले अन्न प्रासन्न संस्कार करते है इस मे किसी शुभ दिन व शुभ मुहुर्त को निकवा कर देवी- देवताओ को भोग अर्पण करके बालक को पहली बार अन्न खिलाया ( मुंह लगा ) जाता है। फिर उसके बाद बालक को अन्न खाने को दिया जाता है। इसके लिए बहुत बडा प्रोग्राम नही किया जाता घर परिवार के लोग ही सामिल होते है ।

चूडाकरण संस्कार (मूंडन )— जब बालक के दुध के दांत निकल जाते है यानि लगभग 9-10 का हो जाता है उसके बाद बालक के चूडाकरण संस्कार मूंडन किया जाता है इसके लिए लोग अपनी कुलदेवी,देवता के स्थान पर जा कर बालक के बालो को उतार (कटिंग) देते पुरी तरह से रोड-मोड करके उन बालो को कुल परम्परानुसार देवी-देवताओ को समर्पित कर देते है।

अक्षरारम्भ संस्कार ( पाटीपूजन )—जब बालक थोडा बडा हो जाता है यानि अपने आप चलने फिरने लगे पुरी तरह से बात को समझ सके और बोलकर अपनी जरुरत बता सके लगभग 3 से 5 साल तक के बालक यह वो आयुबर्ष होते है जब माता पिता बालक को ज्ञानार्जन के लिए उसका विध्दयारम्भ करते है । पढाई करने भेजते है। जब बालक को पहली बार विद्यालय पढने भेजते है तो उसकी पढाई की शुरुआत करते समय बालक को नहला धोलाकर नए या शुद्ध वस्त्र पहना कर घर मे उसके हाथ से माता-पिता पूजा करवाते है। सबसे पहले गणेशवंदन करवाया जाता है फिर विद्या की देवी सरस्वती की वंदना करके बालक के हाथ को माता- पिता पकड कर ऊँ शब्द लिखवा कर उसकी पढाई शुरु करते है सभी देवी देवताओ की पूजा करके, कही कही यज्ञ भी किया जाता है फिर बालक को पढने के लिए स्कूल भेजा जाता है।

उपनयन संस्कार (जनेऊ)—जब बालक 8 वर्ष की आयु का हो जाता था तब उसका उपनयन संस्कार करते थे। उपनयन (जनेऊ) के लिए ब्राहम्ण बालक 8 से16 तक की आयु मे , क्षत्रिय मे 8 से 22 वर्ष तक की आयु मे और वेंश्य ( बनिया ) मे 8 से 24 तक की आयु मे कभी भी ुपनयन संस्कार कर सकते है। आजकल ये संस्कार केवल ब्राहम्ण जाति मे ही होता है पर कही दुसरी जातिवर्ग के लोग शादी के समय भी जनेऊ धारण करते है केवल शादी तक उसके बाद जनेऊ नही पहनते।

विवाह संस्कार—जब बालक युवावस्था मे पहुच जाता है तब उसका विवाह संस्कार किया जाता है । इस संस्कार मे लडकी के लिए लडका देखना और लडके के लिए लडकी देखना। रिस्ता तय करना , सगाई करना, विवाह की सभी रस्मे करना आदि सामिल है। लडकी और लडके के परिवार का एक-दुसरे को विवाह के लिए आमंत्रित करना, शादी के लिए निमंत्रण पत्र ( शादी कार्ड ) भेजना ,मेंहन्दी रस्म, गीत संगीत , उबटन , बान बैठाना ,चाकभात भरना , मिलनी ,बारात स्वागत ,प्रिती भोज सभी रस्मे निभाई जाती है ।

विवाह संस्कार मे ही फिर पाणिग्रहण संस्कार होता है । पाणिग्रहण संस्कार मे दुल्हा दुल्हण के दाहिने हाथ को मंत्रोचारण के संग थामता है और जन्म भर साथ रहने का वायदा करता है ।इस पाणिग्रहण संस्कार मे मंत्रो से दुल्हा- दुल्हन एक दुसरे से वायदे करते है और इस तरह मंत्रो द्वारा किये गए वायदे सप्तपदी कहलाते है यानि सात फैरो का बंधन और दुल्हा और दुल्ह दोनो सदा के लिए एक दुसरे के सुख,दुख के साथी बन जाते है और साआन्नद अपना गृहस्थ जीवन यापन करते है ।

अन्त्येष्टि संस्कार— यह संस्कार अंतिम संस्कार है इसे मृत्यु के समय किया जाता है । जब इंसान मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो उसकी आत्मा शुद्धि के लिए इस संस्कार को करते है इसमे मृतको स्नान करवा कर नए वस्त्रो मे लपेट कर लकडियो की चिता मे रख कर अग्नि को समर्पित करते है और मंत्रो द्वारा उसकी शुद्धिकरऩ कर के उसके निमित जौ से या चावल, उडद आदि से पिंड बना कर छह पिंडो का दान उस प्राणी के पुत्रो द्वारा किया जाता है । जब शव आधा जल जाता है तो उसके पुत्र द्वारा कपाल क्रिया की जाती है । जब तीन दिन हो जाते है शवदाह को तो असके अंगों को चुन कर गंगा मे विसर्जीत कर दिया जाता है इसकी मान्यता है कि जीव के पाप-ताप सब धुल जाए और नए जीवन को प्राप्त कर सके ,या मोक्ष मिल सके। इसके बाद पुत्रो द्वारा श्राद्ध करना आदि कर्म होते है ।

इस तरह से इंसान के जन्म लेने से पहले ही शुरु हुए संस्कार उसकी मृत्यु पर्यन्त चलते है । ये संस्कार ही हमारी संस्कृति को महान बनाते है। इन संस्कारो के बहुत लाभ है जीनमे से एक यह है की इंसान एक दुसरे के लिए सहयोग की भावना रखता है एक दुसरे के दुख-सुख मे सहयोग करना सिखते है और इसके साथ-साथ जब संस्कार होते है तो हर्षोलास का माहौल बनता है जीससे सब मे नई चेतना जागृत होती है और यही नही इंसान मे नेतृत्व करने की भावना जागृत होती है नए-नए प्रयोग करने की भावना बनती है

आजकल कई संस्कार नही मनाए जाते जो पहले मनाते थे कुछ संस्कार ही हम मनाते है कुछ समय का अभाव कुछ फिजुल की खर्जी इन सब के कारण लोग भुलते जा रहे है अपने उन संस्कारो को शायद ऐसा ही चलता रहाँ तो आने वाले समय मे इन संस्कारो मे से भी लोग ना बनाए। हमे अपनी संस्कृति को सहेज कर रखना होगा और आने वाली नई पिंढी को उपहार स्वरुप इन संस्कारो को देना होगा तभी हमारे महान आदर्श बच सकेगे अन्यथा संस्कृति का हांस निश्चित ही है।

पहले पुरे 16 ( सोलह ) संस्कार होते थे अब तो कम होते है । गर्भाधारण संस्कार, कर्णभेदन संस्कार,पुंसवन संस्कार,सीमान्तोन्नयन संस्कारजातकर्म संस्कार,निष्क्रमण संस्कार,समावर्तन संस्कार इन सभी संस्कार को आज प्राय लोग भुलचुके है।

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